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क्या पालीगंज की जनता हर बार नई पटकथा लिखती है? इस बार समीकरण कैसे हैं?

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क्या पालीगंज की जनता हर बार नई पटकथा लिखती है? इस बार समीकरण कैसे हैं?

सारांश

पालीगंज, बिहार की राजनीति का गढ़, जहां हर चुनाव नए समीकरण बनते हैं। जानें कैसे 2020 के चुनाव में नए चेहरे ने पुरानी परंपराओं को तोड़ा और किस तरह के मुद्दे यहां के मतदाताओं को प्रभावित करते हैं।

मुख्य बातें

पालीगंज का सियासी इतिहास लंबा और विविधतापूर्ण है।
यहां चुनावी समीकरण अक्सर बदलते रहते हैं।
स्थानीय मुद्दे मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण हैं।
जातिगत समीकरण चुनाव परिणामों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिस्पर्धा ने इसे दिलचस्प बना दिया है।

पटना, 27 अक्टूबर (राष्ट्र प्रेस)। बिहार की राजधानी पटना से लगभग दक्षिण-पश्चिम में सोन नदी के किनारे स्थित पालीगंज, सिर्फ एक अनुमंडल स्तर का कस्बा नहीं है, बल्कि बिहार की ग्रामीण राजनीति का एक ऐसा अखाड़ा है, जहाँ मतदाता किसी भी दल या व्यक्ति के प्रति लंबे समय तक स्थायी नहीं रहते। यहां की राजनीतिक बुनियाद हर चुनाव में एक नया रंग दिखाती है, जिसका स्पष्ट प्रमाण 2020 के विधानसभा चुनाव में देखा गया।

2020 के चुनाव में पालीगंज ने एक बड़ा सियासी उलटफेर किया, जब कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) (लिबरेशन) के युवा उम्मीदवार संदीप सौरभ ने शानदार जीत हासिल की।

महागठबंधन की ओर से लड़ते हुए सौरभ ने जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के जय वर्धन यादव को बड़े अंतर से हराया। यह भारी अंतर यह दर्शाता है कि यहां की जनता किसी भी पार्टी को लंबे समय तक सत्तारूढ़ नहीं रहने देती।

पालीगंज का राजनीतिक इतिहास दो दिग्गज नेताओं के वर्चस्व की कहानी है: कांग्रेस के राम लखन सिंह यादव और सोशलिस्ट पार्टी के चंद्रदेव प्रसाद वर्मा। इन दोनों ने बारी-बारी से इस सीट पर पांच-पांच बार विजय प्राप्त की, और एक-दूसरे को हराने का यह सिलसिला कई वर्षों तक जारी रहा।

इस राजनीतिक प्रतियोगिता की शुरुआत आजादी के बाद 1951 के पहले आम चुनाव से हुई, जब राम लखन सिंह यादव ने कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की। फिर, 1957 में, वर्मा ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर वापसी की। यह क्रम जारी रहा। 1980, 1985 और 1990 में राम लखन सिंह यादव ने हैट्रिक बनाई, वहीं वर्मा ने 1991 के उपचुनाव और 1995 में जनता दल के टिकट पर लगातार दो बार जीत हासिल की।

कांग्रेस ने पालीगंज सीट पर कुल छह बार जीत दर्ज की है (जिनमें से पांच जीत राम लखन सिंह यादव की थीं)। वहीं, समाजवादी पार्टियों ने चंद्रदेव प्रसाद वर्मा के नेतृत्व में तीन बार और भाकपा (माले) ने भी तीन बार इस सीट पर कब्जा किया है।

1990 के दशक के बाद से पालीगंज में चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल गए। इस समय कांग्रेस का पुराना दबदबा समाप्त हो गया और यह सीट भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और भाकपा (माले) (लिबरेशन) के हाथों में आती-जाती रही। भाजपा, राजद और जनता दल ने दो-दो बार यह सीट जीती, जबकि 1977 में एक बार निर्दलीय उम्मीदवार ने भी जीत हासिल की थी। यह अस्थिर चुनावी मनोदशा ही पालीगंज की सबसे बड़ी पहचान है।

2020 का चुनाव कई दलबदलुओं की मौजूदगी के कारण खास रहा। राजद के मौजूदा विधायक जय वर्धन यादव (जो राम लखन सिंह यादव के पोते हैं) ने तब जदयू का दामन थाम लिया, जब राजद ने यह सीट अपने गठबंधन के तहत भाकपा (माले) को दे दी। इस उठापटक में, भाजपा की ओर से 2010 की विधायक उषा विद्यार्थी लोक जनशक्ति पार्टी से चुनावी मैदान में उतरीं।

इस उलझन भरे मुकाबले में, सीपीआई (माले) के उम्मीदवार संदीप सौरभ ने सभी को चौंकाते हुए जय वर्धन यादव को बड़े अंतर से हराया और यह सीट महागठबंधन के खाते में चली गई। यह जीत इस बात की पुष्टि करती है कि पालीगंज के मतदाताओं के लिए उम्मीदवार की पृष्ठभूमि और राजनीतिक निष्ठा से ज्यादा, स्थानीय मुद्दे मायने रखते हैं।

पालीगंज विधानसभा क्षेत्र में जातिगत समीकरण हमेशा से चुनावी नतीजों में एक निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। यहां के चुनावी नतीजों में मुख्य रूप से यादव, मुस्लिम और भूमिहार मतदाता महत्वपूर्ण प्रभाव डालते रहे हैं। एमवाई (मुस्लिम-यादव) फैक्टर के साथ-साथ, वामपंथी दलों का मजबूत और पुराना आधार भी यहां की राजनीति को प्रभावित करता है।

पालीगंज का नाम भी इतिहास से जुड़ा है। माना जाता है कि इसका नाम प्राचीन पाली भाषा से लिया गया है, जो बौद्ध ग्रंथों से संबंधित है। भारतपुरा गांव (भरतपुरा) में गुलाम वंश, तुगलक, बाबर और अकबर काल के 1,300 से अधिक प्राचीन सिक्कों की खोज इसके समृद्ध ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती है।

पालीगंज का मिजाज देखकर लगता है कि महज कुछ ही दिनों में शुरू होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में भी यह सीट कांटे की टक्कर का केंद्र बनी रहेगी। पालीगंज की लड़ाई केवल दो पार्टियों की नहीं, बल्कि इतिहास और बदलते जनमत के बीच वर्चस्व की लड़ाई होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो एक ओर जहां स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता देता है, वहीं दूसरी ओर, ऐतिहासिक राजनीतिक संघर्षों को भी दर्शाता है।
RashtraPress
28 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पालीगंज का राजनीतिक इतिहास क्या है?
पालीगंज का राजनीतिक इतिहास कांग्रेस और सोशलिस्ट पार्टी के दिग्गज नेताओं के वर्चस्व की कहानी है।
2020 के चुनाव में क्या हुआ?
2020 में सीपीआई (माले) के संदीप सौरभ ने चौंकाने वाली जीत दर्ज की।
पालीगंज के मतदाता किन मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं?
स्थानीय मुद्दे, जातिगत समीकरण और उम्मीदवार की पृष्ठभूमि यहां के मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण हैं।
राष्ट्र प्रेस
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