PM मोदी का 'विकसित भारत संकल्प सभा' में संबोधन: कर्म ही धर्म, 2047 तक टॉप-3 अर्थव्यवस्था का संकल्प
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 'विकसित भारत संकल्प सभा' को संबोधित करते हुए 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प को नई ऊर्जा के साथ दोहराया। उन्होंने कहा कि देश की धमनियों में दौड़ता आत्मविश्वास किसी भी लक्ष्य को असाध्य नहीं रहने देगा। यह आयोजन उनकी सरकार के नेतृत्व में 25 वर्षों की निरंतर प्रशासनिक यात्रा के संदर्भ में हुआ।
मुख्य संकल्प और राष्ट्रीय लक्ष्य
मोदी ने एक के बाद एक कई राष्ट्रीय लक्ष्य गिनाए। उन्होंने कहा, '2047 तक विकसित भारत बनाना है, हम करके दिखाएंगे। दुनिया की टॉप 3 अर्थव्यवस्था बनना है, हम करके दिखाएंगे। आत्मनिर्भर भारत बनाना है, हम करके दिखाएंगे। दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब बनना है, हम करके दिखाएंगे।' उन्होंने ओलंपिक आयोजन और अंतरिक्ष में बड़े कदम को भी भारत के आगामी संकल्पों में शामिल किया।
गौरतलब है कि यह भाषण ऐसे समय में आया है जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी आर्थिक और तकनीकी उपस्थिति को लगातार मज़बूत कर रहा है। मोदी ने सोलर पावर और कृषि क्षेत्र में हुई प्रगति का विशेष उल्लेख किया — उनके अनुसार 2015 से 2025 के दशक में आज़ादी के बाद से खेती में सबसे अधिक और निरंतर बढ़ोतरी दर्ज की गई।
कर्म-दर्शन और व्यक्तिगत यात्रा
मोदी ने अपने राजनीतिक जीवन को स्मरण करते हुए कहा कि वे कभी पद की चाहत से नहीं जिए। उन्होंने कहा, 'मेरा राजनीतिक रिपोर्ट कार्ड सिर्फ संगठन का काम करने वाले का ही था। मैंने चुनाव लड़ाए थे, लेकिन एक भी चुनाव नहीं लड़ा था। बाल्यकाल से मुझे जो शिक्षा-दीक्षा मिली, वो यही थी कि मैं एम्बिशन के लिए नहीं, मिशन के लिए जीने वाला इंसान रहा हूं।'
उन्होंने वडनगर के अपने स्कूली दिनों को याद किया और कहा कि सीखने की ललक आज भी उनमें उसी तरह जीवित है — वे खुद को अब भी एक विद्यार्थी मानते हैं। उन्होंने गीता के संदेश को उद्धृत करते हुए कहा, 'मेरे लिए कर्म ही सब कुछ है, कर्म ही मेरा धर्म है। मा फलेषु कदाचन! फल की चिंता नहीं, श्रेय की भी चिंता नहीं।'
RSS स्वयंसेवकों को सम्मान और 'सबका प्रयास' का आह्वान
प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के स्वयंसेवकों का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें कभी अकेलापन महसूस नहीं हुआ। उनके अनुसार, ये स्वयंसेवक भारत की सांस्कृतिक आत्मा के संरक्षक हैं और उनका एकमात्र उद्देश्य भारत की सेवा है। उन्होंने कहा, 'मैं उन सभी स्वयंसेवकों और कार्यकर्ताओं को सम्मानपूर्वक नमन करता हूं।'
उन्होंने लाल किले से दिए गए 'सबका प्रयास' के मंत्र को पुनः रेखांकित किया और कहा कि भारत को नई बुलंदियों पर पहुंचाने का यही एकमात्र मार्ग है।
समाज को बांटने की राजनीति पर चेतावनी
मोदी ने समाज को वोट बैंक के आधार पर विभाजित करने की प्रवृत्ति को देश की बड़ी चुनौतियों में से एक बताया। उन्होंने तर्क दिया कि जब बिजली नहीं होती तो अंधेरा किसी एक समुदाय पर नहीं छाता, और जब किसान के खेत में पानी नहीं होता तो यह समस्या किसी एक जाति तक सीमित नहीं रहती। उन्होंने कहा, 'अगर समस्या सबकी है, तो समाधान भी सबके लिए होना चाहिए।'
पद से बड़ी है भारत-सेवा
भाषण के समापन में मोदी ने कहा कि जब देश की बात आती है, तो पद, प्रतिष्ठा और अधिकार निरर्थक हो जाते हैं। उन्होंने भारत को 'पुण्य भूमि' कहते हुए कहा कि उस राष्ट्र की सेवा का अवसर मिलना ही अमूल्य है, जिसने 'अंधकार के युग में भी मानवता को ज्ञान दिया।' यह भाषण राष्ट्र-निर्माण के प्रति उनकी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति के रूप में सामने आया, और आने वाले समय में इन संकल्पों के क्रियान्वयन की दिशा पर सभी की नज़रें टिकी रहेंगी।