पीएम मोदी ने कोलकाता के ऐतिहासिक थंथानिया कालीबाड़ी में की पूजा, रोड शो के बीच लिया मां काली का आशीर्वाद

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पीएम मोदी ने कोलकाता के ऐतिहासिक थंथानिया कालीबाड़ी में की पूजा, रोड शो के बीच लिया मां काली का आशीर्वाद

सारांश

पीएम नरेंद्र मोदी ने कोलकाता में रोड शो के दौरान 1703 में स्थापित ऐतिहासिक थंथानिया कालीबाड़ी में मां सिद्धेश्वरी की पूजा-अर्चना की। इस मंदिर का रामकृष्ण परमहंस से गहरा नाता है और यहां मांसाहारी प्रसाद की अनूठी परंपरा है।

Key Takeaways

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 अप्रैल 2026 को कोलकाता रोड शो के बीच थंथानिया कालीबाड़ी में पूजा-अर्चना की।
  • थंथानिया कालीबाड़ी की स्थापना वर्ष 1703 में हुई थी और यह कोलकाता के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है।
  • इस मंदिर में मां काली को 'मां सिद्धेश्वरी' के रूप में पूजा जाता है और उन्हें 'जागृत देवी' माना जाता है।
  • रामकृष्ण परमहंस इस मंदिर में नियमित रूप से आते थे; उनकी पंक्ति 'शंकरेर हृदय माझे, काली बिराजे' दीवारों पर अंकित है।
  • यह उन विरले मंदिरों में से एक है जहां मांसाहारी प्रसाद (डाब-चिंगड़ी) चढ़ाने की परंपरा रामकृष्ण परमहंस के समय से चली आ रही है।
  • पीएम मोदी ने एक्स पर वीडियो साझा कर भारतवासियों की समृद्धि और खुशहाली के लिए प्रार्थना करने की बात कही।

कोलकाता, 26 अप्रैल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के प्रचार अभियान के तहत कोलकाता पहुंचे और रोड शो के दौरान शहर के सबसे प्राचीन धार्मिक स्थलों में से एक थंथानिया कालीबाड़ी मंदिर में मां सिद्धेश्वरी की पूजा-अर्चना की। इस मंदिर का संबंध रामकृष्ण परमहंस से भी रहा है, जो यहां नियमित रूप से भजन-कीर्तन के लिए आते थे।

रोड शो के बीच मंदिर में पूजा का कार्यक्रम

प्रधानमंत्री मोदी का थंथानिया कालीबाड़ी में दर्शन का कार्यक्रम पहले से ही निर्धारित था। वे रोड शो करते हुए मंदिर तक पहुंचे और फूल-माला लेकर अंदर प्रवेश किया। दर्शन-पूजन के बाद वे पुनः रोड शो में शामिल हो गए।

पूजा के बाद पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर एक वीडियो साझा करते हुए लिखा, "कोलकाता में मैंने थंथानिया कालीबाड़ी में प्रार्थना की। इस प्राचीन मंदिर का बंगाली संस्कृति और विशेष रूप से कोलकाता से गहरा संबंध है।" उन्होंने यह भी लिखा कि उन्होंने भारत के लोगों की समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाली के लिए प्रार्थना की।

थंथानिया कालीबाड़ी का ऐतिहासिक महत्व

थंथानिया कालीबाड़ी मंदिर की स्थापना वर्ष 1703 में हुई थी। इसका 300 वर्षों से भी अधिक पुराना इतिहास कोलकाता शहर के औपचारिक विकास से भी पहले का माना जाता है। यह मंदिर कोलकाता के सबसे पुराने और जाग्रत काली मंदिरों में गिना जाता है।

इस मंदिर में मां काली की पूजा 'मां सिद्धेश्वरी' के रूप में होती है। यहां विराजमान देवी को 'जागृत देवी' माना जाता है और हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन दर्शन के लिए आते हैं।

रामकृष्ण परमहंस और इस मंदिर का अटूट नाता

मान्यता है कि रामकृष्ण परमहंस इस मंदिर में अक्सर आते थे और मां सिद्धेश्वरी की भक्ति में भजन गाते थे। मंदिर की दीवारों पर उनकी एक प्रसिद्ध पंक्ति आज भी अंकित है — 'शंकरेर हृदय माझे, काली बिराजे' — जिसका अर्थ है 'मां काली, शंकर के हृदय में विराजमान हैं।'

यह भारत के उन विरले काली मंदिरों में से एक है जहां मां काली को मांसाहारी प्रसाद चढ़ाया जाता है। कहा जाता है कि यह परंपरा स्वयं रामकृष्ण परमहंस ने शुरू की थी। उन्होंने 'डाब-चिंगड़ी' (नारियल और झींगा) का भोग मां सिद्धेश्वरी को अर्पित कर ब्रह्मानंद केशव चंद्र सेन के शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना की थी। तभी से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है।

राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से महत्व

पश्चिम बंगाल में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर के बीच पीएम मोदी का इस मंदिर में दर्शन करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बंगाल में शाक्त परंपरा और काली उपासना का गहरा सांस्कृतिक महत्व है, और इस दर्शन को राजनीतिक विश्लेषक बंगाली मतदाताओं से भावनात्मक जुड़ाव की कोशिश के रूप में भी देख रहे हैं।

गौरतलब है कि 2021 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने बंगाल में जोरदार प्रचार किया था, लेकिन ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने भारी बहुमत से जीत हासिल की थी। इस बार 2026 के चुनाव में पार्टी अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीकों का उपयोग कर रही है।

आने वाले दिनों में पीएम मोदी के बंगाल में और भी रोड शो और चुनावी सभाओं की संभावना है, जो यह तय करेगी कि भाजपा इस बार राज्य में अपनी पिछली स्थिति से कितना आगे जा पाती है।

Point of View

बल्कि बंगाल की शाक्त परंपरा और रामकृष्ण विरासत से जुड़ने की सुविचारित राजनीतिक रणनीति भी है। 2021 के विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद भाजपा इस बार सांस्कृतिक और भावनात्मक प्रतीकों के जरिए बंगाली मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। विडंबना यह है कि जिस रामकृष्ण परमहंस की विरासत को आज राजनीतिक मंचों पर भुनाया जा रहा है, उन्होंने जीवनभर राजनीति से दूरी बनाए रखी। असली सवाल यह है कि क्या यह धार्मिक जुड़ाव बंगाल के मतदाताओं को भाजपा की ओर मोड़ पाएगा, या ममता बनर्जी की जमीनी पकड़ एक बार फिर हावी रहेगी।
NationPress
26/04/2026

Frequently Asked Questions

पीएम मोदी ने थंथानिया कालीबाड़ी में कब पूजा की?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 अप्रैल 2026 को कोलकाता में रोड शो के दौरान थंथानिया कालीबाड़ी में पूजा-अर्चना की। यह दर्शन कार्यक्रम पहले से ही उनके कोलकाता दौरे में शामिल था।
थंथानिया कालीबाड़ी मंदिर का इतिहास क्या है?
थंथानिया कालीबाड़ी की स्थापना वर्ष 1703 में हुई थी, जो कोलकाता शहर के औपचारिक विकास से भी पहले का है। यह कोलकाता के सबसे प्राचीन और जाग्रत काली मंदिरों में से एक माना जाता है।
थंथानिया कालीबाड़ी का रामकृष्ण परमहंस से क्या संबंध है?
रामकृष्ण परमहंस इस मंदिर में अक्सर आते थे और मां सिद्धेश्वरी की भक्ति में भजन गाते थे। मंदिर की दीवारों पर उनकी पंक्ति 'शंकरेर हृदय माझे, काली बिराजे' आज भी अंकित है।
थंथानिया कालीबाड़ी में मांसाहारी प्रसाद की परंपरा कैसे शुरू हुई?
कहा जाता है कि रामकृष्ण परमहंस ने 'डाब-चिंगड़ी' (नारियल और झींगा) का भोग मां सिद्धेश्वरी को अर्पित किया था। तभी से इस मंदिर में मांसाहारी प्रसाद चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है।
पीएम मोदी ने मंदिर में किसके लिए प्रार्थना की?
पीएम मोदी ने एक्स (X) पर साझा किए वीडियो में बताया कि उन्होंने भारत के लोगों की समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाली के लिए प्रार्थना की। उन्होंने मंदिर के बंगाली संस्कृति से गहरे जुड़ाव का भी उल्लेख किया।
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