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प्रादेशिक सेना दिवस 9 अक्टूबर: 50 हजार पार्ट-टाइम सैनिक, 1962 से 1999 तक हर युद्ध में भागीदारी

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प्रादेशिक सेना दिवस 9 अक्टूबर: 50 हजार पार्ट-टाइम सैनिक, 1962 से 1999 तक हर युद्ध में भागीदारी

सारांश

हर वर्ष 9 अक्टूबर को मनाया जाने वाला प्रादेशिक सेना दिवस उन 50 हजार नागरिक-सैनिकों को समर्पित है, जो अपने पेशे के साथ-साथ देश की रक्षा की दूसरी पंक्ति में खड़े रहते हैं। 1948 में स्थापित यह संस्था 1962 से 1999 तक हर प्रमुख युद्ध में नियमित सेना के साथ कंधे से कंधा मिला चुकी है।

मुख्य बातें

प्रादेशिक सेना दिवस हर वर्ष 9 अक्टूबर को मनाया जाता है।
प्रादेशिक सेना अधिनियम 18 अगस्त 1948 को पारित हुआ; प्रथम गवर्नर जनरल सी.
राजगोपालाचारी ने औपचारिक उद्घाटन किया।
वर्तमान में संस्था में लगभग 50 हजार पार्ट-टाइम सदस्य हैं।
जवानों ने 1962, 1965, 1971 और 1999 के युद्धों में सक्रिय भागीदारी निभाई।
भर्ती के लिए आयु सीमा 18 से 42 वर्ष ; अधिकारी पद हेतु स्नातक डिग्री अनिवार्य।
नेतृत्व तीन सितारा रैंक के महानिदेशक (प्रतिनियुक्त लेफ्टिनेंट जनरल) के हाथ में; चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के अधीन।

भारतीय प्रादेशिक सेना दिवस हर वर्ष 9 अक्टूबर को मनाया जाता है, जो देश की रक्षा व्यवस्था की उस अनूठी कड़ी को सम्मानित करता है जिसमें नागरिक अपने नियमित पेशे के साथ-साथ पार्ट-टाइम सैन्य सेवाएं देते हैं। 18 अगस्त 1948 को प्रादेशिक सेना अधिनियम पारित हुआ था और देश के प्रथम गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी ने इसका औपचारिक उद्घाटन किया था। भारतीय सेना के बाद यह संस्था देश की रक्षा की दूसरी पंक्ति मानी जाती है।

प्रादेशिक सेना की नींव और इतिहास

प्रादेशिक सेना का इतिहास पहले स्वतंत्रता संग्राम तक फैला हुआ है। स्वतंत्र भारत में इसे संस्थागत रूप देने के बाद 'नागरिक सेना' की अवधारणा को जन-जन तक पहुँचाने के लिए पहला प्रादेशिक सेना सप्ताह 8 से 15 नवंबर 1952 के बीच मनाया गया था। यह आयोजन जागरूकता और भर्ती दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण था।

गौरतलब है कि सात दशकों से अधिक समय में इस संस्था ने न केवल युद्धकालीन बल्कि शांतिकालीन अभियानों में भी सक्रिय भूमिका निभाई है।

युद्धों और अभियानों में भागीदारी

प्रादेशिक सेना के जवानों ने 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों तथा 1999 के कारगिल संघर्ष में नियमित सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भाग लिया। इसके अलावा विभिन्न आंतरिक सुरक्षा एवं राहत अभियानों में भी इनकी उपस्थिति दर्ज की गई है। ये जवान आपातकाल या सशस्त्र संघर्ष के समय अपना मूल कार्य स्थगित कर सैन्य तैनाती पर चले जाते हैं।

संरचना और नेतृत्व

वर्तमान में प्रादेशिक सेना में लगभग 50 हजार सदस्य हैं। इसका नेतृत्व तीन सितारा रैंक के प्रादेशिक सेना महानिदेशक करते हैं, जो सामान्यतः भारतीय सेना से प्रतिनियुक्त लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के अधिकारी होते हैं। यह संस्था रक्षा मंत्रालय के सैन्य मामलों के विभाग के अधीन चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के नेतृत्व में कार्य करती है।

प्रादेशिक सेना की दो प्रमुख इकाइयाँ हैं: पहली, विभागीय इकाई — जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) और भारतीय रेलवे के कर्मचारी तथा पूर्व सैनिक शामिल होते हैं; और दूसरी, गैर-विभागीय इकाई — जिसमें निजी क्षेत्र में कार्यरत नागरिक भर्ती किए जाते हैं।

भर्ती की पात्रता

प्रादेशिक सेना में भर्ती के लिए आवेदक की आयु 18 से 42 वर्ष के बीच होनी चाहिए। अधिकारी पद के लिए किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक (ग्रेजुएशन) की डिग्री अनिवार्य है। चुने गए नागरिकों को सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि जरूरत पड़ने पर उन्हें तत्काल तैनात किया जा सके।

आम जनता पर असर और आगे की राह

प्रादेशिक सेना की अवधारणा नागरिकों को देश की रक्षा में सीधे भागीदार बनाती है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा ढाँचे को पेशेवर सेना पर निर्भरता कम करते हुए मजबूत किया जा सकता है। प्रादेशिक सेना दिवस 2026 ऐसे समय में मनाया जा रहा है जब देश की सुरक्षा चुनौतियाँ बहुआयामी हो चुकी हैं और इस 'नागरिक सेना' की भूमिका पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक मानी जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस नागरिक-सैनिक परंपरा की है जो लोकतांत्रिक भारत की रक्षा संस्कृति का आधार है। फिर भी सवाल यह है कि क्या 50 हजार की यह संख्या आज की बहुआयामी सुरक्षा चुनौतियों के लिए पर्याप्त है। भर्ती की ऊपरी आयु सीमा 42 वर्ष रखना एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इस बात को नजरअंदाज कर देती है कि विभागीय और गैर-विभागीय दोनों इकाइयों में भर्ती की रफ्तार और प्रशिक्षण की गुणवत्ता पर पारदर्शी डेटा सार्वजनिक डोमेन में नहीं है। नागरिक सहभागिता को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ने की यह अवधारणा जितनी प्रेरक है, उतनी ही जवाबदेही की माँग भी करती है।
RashtraPress
8 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रादेशिक सेना दिवस कब और क्यों मनाया जाता है?
प्रादेशिक सेना दिवस हर वर्ष 9 अक्टूबर को मनाया जाता है। यह दिवस 18 अगस्त 1948 को प्रादेशिक सेना अधिनियम के पारित होने और देश के प्रथम गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी द्वारा इसके औपचारिक उद्घाटन की स्मृति में आयोजित किया जाता है।
भारतीय प्रादेशिक सेना में कितने सदस्य हैं और इसमें कौन शामिल हो सकता है?
प्रादेशिक सेना में वर्तमान में लगभग 50 हजार सदस्य हैं। इसमें 18 से 42 वर्ष की आयु के नागरिक भर्ती हो सकते हैं; अधिकारी पद के लिए किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक डिग्री अनिवार्य है।
प्रादेशिक सेना ने किन युद्धों में भाग लिया है?
प्रादेशिक सेना के जवान 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों तथा 1999 के कारगिल संघर्ष में नियमित सेना के साथ शामिल हुए थे। इसके अलावा, विभिन्न आंतरिक सुरक्षा एवं राहत अभियानों में भी इनकी भागीदारी रही है।
प्रादेशिक सेना की दो इकाइयाँ कौन-सी हैं?
पहली विभागीय इकाई है, जिसमें PSU और भारतीय रेलवे के कर्मचारी तथा पूर्व सैनिक शामिल होते हैं। दूसरी गैर-विभागीय इकाई है, जिसमें निजी क्षेत्र में कार्यरत नागरिकों को भर्ती किया जाता है।
प्रादेशिक सेना का नेतृत्व कौन करता है?
प्रादेशिक सेना का नेतृत्व तीन सितारा रैंक के महानिदेशक करते हैं, जो आमतौर पर भारतीय सेना से प्रतिनियुक्त लेफ्टिनेंट जनरल होते हैं। यह संस्था रक्षा मंत्रालय के सैन्य मामलों के विभाग के अधीन चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के नेतृत्व में कार्य करती है।
राष्ट्र प्रेस
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