परमवीर चक्र विजेता मेजर रामा राघोबा राणे के स्मृति दिवस पर गडकरी और बिहार CM ने दी श्रद्धांजलि
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली — परमवीर चक्र से सम्मानित मेजर रामा राघोबा राणे की पुण्यतिथि पर 11 जुलाई 2026 को देशभर के नेताओं ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अपनी जान की परवाह किए बिना दुश्मन की गोलाबारी के बीच भारतीय टैंकों के लिए रास्ता साफ करने वाले इस वीर सैनिक को भारत के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार से जीवित रहते हुए सम्मानित किया गया था।
नेताओं की श्रद्धांजलि
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, 'परमवीर चक्र से सम्मानित सेकेंड लेफ्टिनेंट मेजर रामा राघोबा राणे जी के स्मृति दिवस पर उन्हें विनम्र अभिवादन।'
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी सोशल मीडिया पर अपनी श्रद्धांजलि साझा करते हुए कहा, 'परमवीर चक्र से अलंकृत मां भारती के वीर सपूत मेजर रामा राघोबा राणे जी की पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। राष्ट्र की रक्षा के लिए उनका अदम्य साहस, पराक्रम और सर्वोच्च बलिदान सदैव देशवासियों को प्रेरित करता रहेगा।'
वीरता की अमर गाथा
26 जून 1918 को कर्नाटक के करवार जिले के चेंदिया गाँव में जन्मे राणे ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश भारतीय सेना में सेवा दी। स्वतंत्रता के बाद 15 दिसंबर 1947 को उन्होंने बॉम्बे सैपर्स (कोर ऑफ इंजीनियर्स) में सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त किया।
अप्रैल 1948 में राजौरी पर कब्जा करने के अभियान में उनकी 37 असॉल्ट फील्ड कंपनी को सड़क अवरोधों और खदान क्षेत्रों को साफ करने का दायित्व सौंपा गया। यह ऐसे समय में आया जब पाकिस्तानी सेना की भारी गोलाबारी लगातार जारी थी।
72 घंटे की अदम्य वीरता
8 अप्रैल 1948 को दुश्मन के भारी गोले बरसने के बावजूद राणे ने 72 घंटे तक निरंतर कार्य किया। इस दौरान उनके दो साथी शहीद हो गए और पाँच अन्य घायल हुए — जिनमें स्वयं राणे भी शामिल थे। घायल अवस्था में भी उन्होंने बारूदी सुरंगें हटाईं, सड़कें साफ कीं और भारतीय टैंकों को आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त किया। उनकी इस अदम्य वीरता ने राजौरी की मुक्ति में निर्णायक भूमिका निभाई।
परमवीर चक्र और सेवानिवृत्ति
उनकी असाधारण वीरता के लिए 8 अप्रैल 1948 को ही परमवीर चक्र घोषित किया गया। गौरतलब है कि वे उन विरले सैनिकों में से थे जिन्हें यह सम्मान जीवित रहते प्रदान किया गया। 28 वर्षों की सैन्य सेवा के बाद 1968 में मेजर के पद से सेवानिवृत्त होने वाले राणे को पाँच बार मेंशन इन डिस्पैचेस का सम्मान भी मिला। 11 जुलाई 1994 को पुणे के कमांड अस्पताल में 76 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।
उनकी पुण्यतिथि पर राष्ट्र उन्हें नमन करता है — उनकी वीरगाथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत बनी रहेगी।