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राहुल सांकृत्यायन: यात्रा के माध्यम से जीवन की नई परिभाषा

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राहुल सांकृत्यायन: यात्रा के माध्यम से जीवन की नई परिभाषा

सारांश

राहुल सांकृत्यायन, जिन्होंने यात्रा को जीवन का हिस्सा बना लिया, एक अद्वितीय लेखक थे। उनकी लेखनी और अनुभवों के जरिए उन्होंने दुनिया को देखने का नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। जानिए उनके जीवन के अनकहे किस्से।

मुख्य बातें

राहुल सांकृत्यायन ने यात्रा को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाया।
उन्होंने 150 से अधिक किताबें लिखीं।
उनकी भाषा सरल और आम बोलचाल की थी।
उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान कई संस्कृतियों को समझा।
वे एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता थे।

नई दिल्ली, 8 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। 9 अप्रैल... यह केवल एक तारीख नहीं है। इसी दिन 1893 में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के एक छोटे से गांव में एक ऐसे अद्वितीय लेखक का जन्म हुआ, जिसने लोगों के दृष्टिकोण को पूरी तरह से बदल दिया। हम राहुल सांकृत्यायन की बात कर रहे हैं, जिन्होंने यात्रा को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लिया और अपनी लेखनी से नई दुनिया की रचना की। वे केवल एक लेखक नहीं, बल्कि एक चलते-फिरते विश्वविद्यालय थे, जिनके लिए अनुभव ही ज्ञान था और पूरी दुनिया उनकी किताब।

राहुल सांकृत्यायन का जन्म उनके ननिहाल पंदहा गांव में हुआ और वहीं उनकी बचपन की यादें बसीं। तब लोग उन्हें केदारनाथ पांडे के नाम से जानते थे। बचपन से ही उनमें कुछ नया करने की चाह थी। उनके नाना से सुनी कहानियां, जो दूर देशों, पहाड़ों और नदियों के बारे में थीं, उनके मन में एक बीज की तरह अंकुरित हुईं। एक दिन एक साधारण घटना (घी की मटकी गिरना) ने उन्हें घर की चौखट पार करने का हौसला दिया।

उन्होंने बनारस, फिर कलकत्ता, फिर हिमालय तक की यात्रा की। यह यात्रा इतनी विस्तारित हो गई कि देश की सीमाएं छोटी लगने लगीं। वे तिब्बत, लंका, रूस और यूरोप तक पहुंचे। लेकिन उनकी ये यात्राएं महज घूमने तक सीमित नहीं थीं। उनके लिए हर गंतव्य एक नई किताब थी। हर स्थान की भाषा सीखी, वहां के लोगों के साथ समय बिताया और उनके जीवन के अनुभवों को समझा। यही कारण है कि उनकी किताबें केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि अनुभवों से भी समृद्ध हैं।

उनकी एक विशेषता यह थी कि वे कभी भी एक ही सोच में नहीं बंधे। जन्म से एक ब्राह्मण परिवार में पले-बढ़े, लेकिन उन्होंने हर चीज को सवाल के नजरिए से देखा। वे सनातन धर्म, आर्य समाज, बौद्ध धर्म और साम्यवाद जैसे विचारों को समझते गए और जो सही लगा, उसे अपनाया। उनका मानना था कि ज्ञान को केवल स्वीकार नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे परखना भी चाहिए।

राहुल सांकृत्यायन की लेखनी भी उनके सफर की तरह ही रोचक थी। उन्होंने 150 से अधिक किताबें लिखीं। वे जहाँ भी जाते, जो कुछ भी देखते, उसे शब्दों में ढाल देते।

उनकी प्रसिद्ध किताब 'वोल्गा से गंगा' पढ़ते समय ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम हजारों वर्षों की यात्रा कर रहे हों। वहीं 'मेरी जीवन यात्रा' में उनका जीवन इतनी सरलता और सच्चाई से लिखा गया है कि पाठक उनसे सहजता से जुड़ जाता है।

उनकी भाषा बहुत सरल और स्पष्ट थी। वे कठिन शब्दों का प्रयोग नहीं करते थे, बल्कि आम बोलचाल की भाषा में लिखते थे, ताकि हर कोई उन्हें समझ सके। यही कारण है कि उनकी किताबें केवल विद्वानों के लिए नहीं, बल्कि आम पाठकों के लिए भी अत्यंत उपयोगी हैं।

राहुल सांकृत्यायन सिर्फ एक लेखक या यात्री नहीं थे, बल्कि एक कर्मठ इंसान भी थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया, जेल गए और किसानों तथा मजदूरों के हक के लिए आवाज उठाई। उनका मानना था कि ज्ञान का उपयोग समाज के उत्थान के लिए होना चाहिए।

14 अप्रैल 1963 को राहुल सांकृत्यायन ने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी सोच, उनकी किताबें और उनकी यात्रा आज भी पाठकों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह अनुभवों और ज्ञान के माध्यम से आत्मिक विकास का भी माध्यम है।
RashtraPress
25 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राहुल सांकृत्यायन ने कितनी किताबें लिखीं?
राहुल सांकृत्यायन ने 150 से अधिक किताबें लिखीं।
उनकी सबसे प्रसिद्ध किताब कौन सी है?
'वोल्गा से गंगा' उनकी एक प्रसिद्ध किताब है।
राहुल सांकृत्यायन का जन्म कब हुआ?
उनका जन्म 9 अप्रैल 1893 को हुआ।
राहुल सांकृत्यायन का योगदान क्या था?
उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया और किसानों व मजदूरों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई।
क्या राहुल सांकृत्यायन केवल लेखक थे?
वे केवल लेखक नहीं थे, बल्कि एक यात्री और सामाजिक कार्यकर्ता भी थे।
राष्ट्र प्रेस
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