युद्ध की नई परिभाषा: मल्टी-डोमेन संघर्ष में भारतीय सेना की तैयारी
सारांश
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नई दिल्ली, 9 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। युद्ध अब पहले जैसे नहीं रहे हैं। पूर्व में, युद्ध केवल भूमि पर सैनिकों के आमने-सामने लड़ने तक सीमित थे, लेकिन आज का युद्ध कई क्षेत्रों में एक साथ लड़ा जाता है जैसे कि भूमि, हवा, समुद्र, साइबर, अंतरिक्ष और मानसिक, अर्थात् सूचना और विचार पर प्रभाव डालने वाला क्षेत्र। इन सभी को मिलाकर “मल्टी-डोमेन” कहा जाता है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने युद्ध के इस नए स्वरूप और मल्टी-डोमेन युद्ध पर गुरुवार को जानकारी दी। उन्होंने ‘रण संवाद’ कार्यक्रम में यह बात कही।
सेना प्रमुख ने स्पष्ट किया कि आज की दुनिया एक लगातार संघर्ष के दौर में है। उन्होंने कहा कि यह आवश्यक नहीं है कि हर बार युद्ध आधिकारिक रूप से घोषित हो, लेकिन विभिन्न स्थानों पर और विभिन्न तरीकों से टकराव लगातार जारी रहता है। ऐसे माहौल में, सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इन सभी क्षेत्रों के बीच तालमेल कैसे बनाया जाए। सेना प्रमुख ने बताया कि अब युद्ध केवल सीमा पर नहीं होता, बल्कि यह विभिन्न स्तरों पर एक साथ चलता है। जमीन पर गोलीबारी हो रही होती है, और उसी समय साइबर हमले भी किए जा सकते हैं, दुश्मन की संचार प्रणाली को बाधित किया जा सकता है, और अंतरिक्ष से उसकी गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। इसलिए आज के सैन्य कमांडर को केवल अपने क्षेत्र तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि हर क्षेत्र का ज्ञान होना आवश्यक है। तभी वह संपूर्ण स्थिति को सही से समझ पाएगा।
उन्होंने कहा कि आज के समय में, एक छोटे स्तर के अधिकारी के पास भी पहले से कहीं अधिक साधन हैं, जैसे कि ड्रोन, निगरानी उपकरण, साइबर नेटवर्क और सटीक जानकारी देने वाली तकनीक। इससे उसकी ताकत और निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि हुई है। सेना प्रमुख ने यहां ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख किया।
सेना प्रमुख ने बताया कि इस ऑपरेशन में सेना, वायुसेना और नौसेना ने मिलकर काम किया। जमीन से प्राप्त जानकारी, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक इनपुट, वायुसेना की सटीक कार्रवाई और नौसेना की रणनीतिक तैनाती, इन सबके तालमेल से ही सफलता प्राप्त हुई। उन्होंने कहा कि अब कोई एक हिस्सा अकेले जीत नहीं दिला सकता, बल्कि सभी को मिलकर काम करना होगा।
उन्होंने कहा कि भारतीय सेना भी नए तरीके के युद्ध के लिए खुद को तैयार कर रही है। इसके लिए नए-नए अभ्यास किए जा रहे हैं, नई संरचनाएं बनाई जा रही हैं और आधुनिक तकनीक को शामिल किया जा रहा है। सेना में ड्रोन यूनिट, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से जुड़ी इकाइयों को मजबूत किया जा रहा है, ताकि हर क्षेत्र में एक साथ काम किया जा सके। हालाँकि, उन्होंने स्वीकार किया कि यह बदलाव आसान नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि विभिन्न क्षेत्रों और स्तरों पर काम करने वाली इकाइयों के बीच सही तालमेल कैसे बनाया जाए। इसके अलावा, आजकल ‘हाइब्रिड युद्ध’ भी एक बड़ी चुनौती है, जिसमें दुश्मन सीधे हमला नहीं करता, बल्कि साइबर, सूचना और अन्य तरीकों से नुकसान पहुँचाने का प्रयास करता है।
आगे की दिशा बताते हुए, उन्होंने कहा कि सेना को अपनी रणनीति में बदलाव लाना आवश्यक है। संसाधनों को अलग-अलग स्थानों पर फैलाना होगा, कमांड को नीचे तक मजबूत बनाना होगा, और हर स्थिति में तेज और प्रभावी प्रतिक्रिया देने की क्षमता विकसित करनी होगी। इसके साथ ही, तकनीक का सही उपयोग बहुत आवश्यक है, लेकिन अंतिम निर्णय हमेशा इंसान के हाथ में रहना चाहिए।
सेना प्रमुख ने कहा कि आने वाले समय में वही सेना मजबूत होगी, जो तकनीक को समझेगी, उसे अपनाएगी और विभिन्न क्षेत्रों को मिलाकर एक साथ काम करेगी। इसलिए अब सैन्य कमांडरों को केवल पारंपरिक सैन्य ज्ञान ही नहीं, बल्कि तकनीकी समझ भी विकसित करनी होगी। यही भविष्य के युद्ध की सबसे बड़ी आवश्यकता है।