पितृपक्ष 2026: राजस्थान का पवित्र लोहार्गल तीर्थ, जहाँ सूर्यकुंड में होती है पितरों को मुक्ति
सारांश
मुख्य बातें
अरावली की सघन पहाड़ियों के आँचल में बसा लोहार्गल धाम राजस्थान के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पितृ तीर्थों में से एक माना जाता है। पितृपक्ष 2026 के दौरान देशभर से लाखों श्रद्धालु अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मिक शांति के लिए यहाँ तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करने पहुँचते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहाँ स्थित पवित्र सूर्यकुंड में अस्थि विसर्जन करने से अस्थियाँ जल में विलीन हो जाती हैं और मृतक को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पितृपक्ष का महत्व और लोहार्गल की भूमिका
पितृपक्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलता है। इस पखवाड़े में देशभर के प्रमुख तीर्थ स्थलों पर पितरों के निमित्त विशेष धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न किए जाते हैं। लोहार्गल में पितृपक्ष के आरंभ होते ही श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जाती है।
लोहार्गल की एक विशेषता यह भी बताई जाती है कि यहाँ तीन प्रमुख पर्वतों से निकलने वाली सात जलधाराएँ आपस में मिलती हैं, जिन्हें धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पावन माना जाता है। श्रद्धालु सूर्यकुंड में स्नान करने के उपरांत अपने पितरों का नाम-गोत्र लेकर तर्पण और पिंडदान करते हैं।
पौराणिक कथाएँ और धार्मिक मान्यताएँ
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान परशुराम ने लोहार्गल धाम में पितृ तर्पण के साथ-साथ प्रायश्चित यज्ञ भी किया था। मान्यता है कि यज्ञ की समाप्ति पर उन्होंने यज्ञ वेदी की अग्नि को तीर्थ के जल से शांत किया और अपने पिता महर्षि जमदग्नि की पितृ आत्मा का तर्पण किया। इसी पौराणिक प्रसंग के कारण लोहार्गल में पितृ तर्पण, पिंडदान और अस्थि विसर्जन की परंपरा को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है।
लोहार्गल के पीठाधीश्वर अवधेशाचार्य के अनुसार, यह वह पावन स्थल है जिसकी रक्षा स्वयं ब्रह्माजी करते हैं और यहाँ किए गए श्राद्ध कर्म से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पांडवों से जुड़ी कथा: 'जहाँ लोहा गल जाए'
लोहार्गल की धार्मिक परंपराओं में पांडवों से संबंधित कथा भी केंद्रीय स्थान रखती है। ग्रंथों के अनुसार, महाभारत युद्ध की समाप्ति के पश्चात पांडव अपने स्वजनों के वध के पाप से अत्यंत पीड़ित थे। भगवान श्रीकृष्ण की सलाह पर वे विभिन्न तीर्थों की परिक्रमा पर निकले। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया था कि जिस तीर्थ में उनके अस्त्र-शस्त्र जल में गल जाएँ, वहीं उनकी पाप-मुक्ति का मनोरथ सिद्ध होगा।
मान्यता है कि जब पांडव लोहार्गल पहुँचे और सूर्यकुंड में स्नान किया, तो अर्जुन का गांडीव धनुष और भीम की गदा सहित समस्त अस्त्र-शस्त्र जल में विलीन हो गए, और पांडवों को कौरव-वध के पाप से मुक्ति प्राप्त हुई। इसी कथा के कारण इस स्थान का नाम लोहार्गल — अर्थात 'जहाँ लोहा गल जाए' — पड़ा बताया जाता है।
अस्थि विसर्जन और मोक्ष की मान्यता
लोहार्गल को दिवंगत जनों की अस्थियों के विसर्जन के लिए भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सूर्यकुंड में अस्थियाँ विसर्जित करने पर वे जल में घुल जाती हैं और मृतक को मुक्ति मिलती है। पितृपक्ष के दौरान बड़ी संख्या में परिजन अपने दिवंगत प्रियजनों की अस्थियाँ लेकर यहाँ पहुँचते हैं।
यह ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब गया (बिहार) और प्रयागराज जैसे बड़े तीर्थों पर भीड़ अत्यधिक होती है — ऐसे में लोहार्गल राजस्थान एवं आसपास के राज्यों के श्रद्धालुओं के लिए एक सुलभ एवं पवित्र विकल्प के रूप में उभरता है।
धार्मिक स्थल और भौगोलिक परिवेश
लोहार्गल के आसपास कई प्राचीन मंदिर और धार्मिक स्थल स्थित हैं, जिनमें सूर्य मंदिर, वनखंडी जी मंदिर, प्राचीन शिव मंदिर, हनुमान मंदिर और पांडव गुफा प्रमुख हैं। सूर्यकुंड के समीप एक विशाल बावड़ी भी है, जिसे राजस्थान की बड़ी बावड़ियों में गिना जाता है। लगभग चार सौ सीढ़ियाँ चढ़ने के उपरांत मालकेतुजी के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है। पितृपक्ष के समाप्त होने के साथ ही यह तीर्थ फिर अगले वर्ष की प्रतीक्षा में आस्था और परंपरा का केंद्र बना रहता है।