कच्छ के काला डूंगर में दो दुर्लभ सांपों की प्रजातियाँ एक साथ दिखीं, 'एफ्रो-एशियन सैंड स्नेक' गुजरात में दूसरा-तीसरा दर्ज मामला
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के कच्छ जिले के काला डूंगर क्षेत्र में सितंबर 2026 में वन विभाग की शाम की गश्त के दौरान सांपों की दो अत्यंत दुर्लभ प्रजातियाँ एक साथ देखी गईं। वन विभाग के अनुसार, इनमें से एक — 'एफ्रो-एशियन सैंड स्नेक' (Psammophis schokari) — का यह दर्शन गुजरात में इस प्रजाति का संभवतः दूसरा या तीसरा दर्ज मामला हो सकता है।
क्या दिखा काला डूंगर में
खावड़ा राउंड के रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर और स्थानीय वन कर्मचारियों ने गश्त के दौरान दोनों सांप देखे। पहला सांप 'ब्लैक-हेडेड रॉयल स्नेक' (Spalerosophis atriceps) था, जो जहरीला नहीं होता। दूसरा 'एफ्रो-एशियन सैंड स्नेक' (Psammophis schokari) था, जिसे विभाग ने हल्का जहरीला बताया है — हालाँकि इसका जहर इंसानों के लिए जानलेवा नहीं होता। यह सैंड स्नेक लगभग 70 सेंटीमीटर लंबा था।
गुजरात में कितना दुर्लभ है यह दर्शन
वन विभाग ने बताया कि ये दोनों प्रजातियाँ कच्छ में बहुत कम देखी गई हैं और कई वर्षों के बाद एक ही स्थान पर एक साथ दिखाई दी हैं। विभाग ने सर्पविशेषज्ञ अजय देसाई की पुस्तक 'सर्प संदर्भ' का हवाला दिया, जिसमें कच्छ के लोदाई में एफ्रो-एशियन सैंड स्नेक के पहले फोटोग्राफिक रिकॉर्ड का उल्लेख है। हालाँकि विभाग ने पक्के रिकॉर्ड की कुल संख्या स्पष्ट नहीं की।
काला डूंगर का अनोखा इकोसिस्टम
462 मीटर की ऊँचाई पर स्थित काला डूंगर कच्छ की सबसे ऊँची चोटी है। विभाग के अनुसार, इस क्षेत्र की शुष्क जलवायु और विशिष्ट इकोसिस्टम दुर्लभ वन्यजीवों के यहाँ पाए जाने का प्रमुख कारण हैं। गौरतलब है कि यह खोज ऐसे समय में हुई है जब कच्छ ईस्ट फॉरेस्ट डिवीजन सांपों के संरक्षण और जागरूकता के लिए विशेष अभियान चला रहा है।
संरक्षण प्रयास और जागरूकता अभियान
विभाग हर वर्ष 19 सितंबर को 'विश्व सर्पदंश जागरूकता दिवस' के रूप में मनाता है। इन गतिविधियों में जागरूकता साइनबोर्ड, वन्यजीव जागरूकता कार्यक्रम, प्रकृति शिक्षा शिविर और स्थानीय निवासियों के लिए विशेष पहल शामिल हैं। विभाग ने इस क्षेत्र में आने वाले निवासियों और पर्यटकों से दुर्लभ वन्यजीवों को नुकसान न पहुँचाने और उनके प्राकृतिक आवास को अक्षुण्ण रखने की अपील की है।
आगे क्या
वन विभाग ने कहा है कि इलाके की जैव-विविधता संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है। यह दुर्लभ दर्शन कच्छ के वन्यजीव अनुसंधान और दस्तावेज़ीकरण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है, और विशेषज्ञ इस क्षेत्र में आगे की सर्वेक्षण गतिविधियों की उम्मीद जता रहे हैं।