26 अगस्त 2026
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बस्तर में 'मिशन रीयूनाइट': 48 घंटे की निगरानी के बाद दो तेंदुआ शावक मां से मिले

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बस्तर में 'मिशन रीयूनाइट': 48 घंटे की निगरानी के बाद दो तेंदुआ शावक मां से मिले

सारांश

बस्तर के दुर्गम जंगलों में वन विभाग ने 48 घंटे की अथक निगरानी और ग्रामीणों के सहयोग से दो नवजात तेंदुआ शावकों को उनकी मां से मिलाया। ट्रैप कैमरों में कैद वह पल — जब मादा तेंदुआ अपने बच्चों को लेकर जंगल में लौटी — मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व की एक दुर्लभ और प्रेरणादायक मिसाल बन गया।

मुख्य बातें

22 अगस्त 2026 को चित्रकोट रेंज, बस्तर में ग्रामीण बच्चों द्वारा तेंदुए का एक नवजात शावक उठाए जाने की सूचना वन विभाग को मिली।
वनमंडलाधिकारी दीपेश कपिल के मार्गदर्शन में उसी रात रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर शावक को सुरक्षित लिया गया।
पहले पुनर्मिलन प्रयास की विफलता के बाद वन अमले ने दूसरे शावक की तलाश की और दोनों को एक साथ सुरक्षित स्थान पर रखा।
निगरानी के लिए हाई-रेजोल्यूशन ट्रैप कैमरे लगाए गए; 48 घंटे बाद मादा तेंदुआ दोनों शावकों को लेकर जंगल में लौटी।
स्थानीय ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी ने अभियान को सफल बनाया — मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व की उल्लेखनीय नज़ीर।

बस्तर वनमंडल के चित्रकोट रेंज के दुर्गम पहाड़ी जंगलों में वन विभाग ने 22 से 24 अगस्त 2026 के बीच एक संवेदनशील वन्यजीव बचाव अभियान — 'मिशन रीयूनाइट' — को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। लगातार 48 घंटे की सतर्क निगरानी और स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से तेंदुए के दो नवजात शावकों को उनकी मां से सुरक्षित मिलाया गया।

मुख्य घटनाक्रम

22 अगस्त को सूचना मिली कि चित्रकोट रेंज के पहाड़ी वन क्षेत्र में ग्रामीण बच्चों ने तेंदुए के एक नवजात शावक को उठा लिया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए वनमंडलाधिकारी दीपेश कपिल के मार्गदर्शन में वन अमले ने तत्काल रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया और उसी रात शावक को सुरक्षित अपने संरक्षण में ले लिया।

इसके बाद तड़के करीब 4 बजे शावक को जंगल के एक चिन्हित स्थान पर छोड़ा गया, ताकि मादा तेंदुआ उसे वापस ले जा सके। लेकिन अगले दिन निगरानी में पाया गया कि मां अपने बच्चे तक नहीं पहुंची — पहला प्रयास सफल नहीं हुआ।

दूसरे शावक की खोज और ट्रैप कैमरे

पहले प्रयास की विफलता के बाद वन अमले ने ग्रामीणों के सहयोग से पूरे इलाके में दूसरे शावक की तलाश शुरू की। कुछ समय बाद दूसरा शावक भी मिल गया। दोनों शावकों को एक सुरक्षित स्थान पर रखा गया और उनकी निगरानी के लिए आसपास हाई-रेजोल्यूशन ट्रैप कैमरे लगाए गए।

गौरतलब है कि ऐसे अभियानों में मानवीय उपस्थिति को न्यूनतम रखना अनिवार्य होता है, क्योंकि अत्यधिक मानवीय गंध मादा तेंदुए को शावकों के पास आने से रोक सकती है।

सफलता का वह क्षण

लगातार 48 घंटे की सतर्क निगरानी के बाद मंगलवार तड़के ट्रैप कैमरों में वह दृश्य कैद हुआ जिसका सभी को इंतजार था — मादा तेंदुआ अपने दोनों शावकों के पास पहुंची और कुछ ही देर में उन्हें सुरक्षित अपने साथ लेकर घने जंगल की ओर चली गई। वन विभाग के अधिकारियों ने पुष्टि की कि दोनों शावक अब अपनी मां के साथ सुरक्षित हैं।

आम जनता और वन्यजीव संरक्षण पर असर

यह अभियान मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व का एक उल्लेखनीय उदाहरण बनकर उभरा है। स्थानीय ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी ने न केवल शावकों की जान बचाई, बल्कि यह भी दर्शाया कि सामुदायिक जागरूकता और वन विभाग के समन्वय से संवेदनशील वन्यजीव मामलों को सफलतापूर्वक सुलझाया जा सकता है।

यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं चिंता का विषय बनी हुई हैं। बस्तर का यह अभियान उस दिशा में एक सकारात्मक नज़ीर पेश करता है।

क्या होगा आगे

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, चित्रकोट रेंज में तेंदुओं की आवाजाही पर निगरानी जारी रहेगी। ट्रैप कैमरों के ज़रिए मां और शावकों की स्थिति पर नज़र रखी जाएगी। यह सफल अभियान भविष्य में ऐसे बचाव कार्यों के लिए एक मानक प्रक्रिया के रूप में उपयोगी साबित हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन उन्हीं ग्रामीणों ने दूसरे शावक की खोज में वन विभाग का साथ भी दिया — यह विरोधाभास ही असली कहानी है। देशभर में मानव-वन्यजीव संघर्ष के बढ़ते मामलों के बीच, बस्तर का यह मॉडल दिखाता है कि त्वरित प्रतिक्रिया, तकनीक (ट्रैप कैमरे) और सामुदायिक भरोसे का संयोजन कारगर हो सकता है। असली परीक्षा यह है कि क्या वन विभाग इस एकबारगी सफलता को एक दोहराने योग्य प्रोटोकॉल में बदल पाएगा।
RashtraPress
26 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'मिशन रीयूनाइट' क्या था और यह कहाँ चलाया गया?
'मिशन रीयूनाइट' बस्तर वनमंडल के चित्रकोट रेंज में चलाया गया एक वन्यजीव बचाव अभियान था, जिसका उद्देश्य दो बिछड़े नवजात तेंदुआ शावकों को उनकी मां से मिलाना था। यह अभियान 22 से 24 अगस्त 2026 के बीच लगभग 48 घंटे तक चला।
तेंदुआ शावक पहली बार मां से क्यों नहीं मिल पाए?
वन विभाग ने पहले प्रयास में केवल एक शावक को जंगल के चिन्हित स्थान पर छोड़ा था, लेकिन निगरानी में पाया गया कि मादा तेंदुआ उस स्थान तक नहीं पहुंची। इसके बाद दूसरे शावक की तलाश की गई और दोनों को एक साथ रखने के बाद ट्रैप कैमरों से निगरानी की गई, जिससे अंततः मां अपने बच्चों तक पहुंची।
इस अभियान में स्थानीय ग्रामीणों की क्या भूमिका रही?
स्थानीय ग्रामीणों ने वन विभाग को शावक उठाए जाने की सूचना दी और दूसरे शावक की खोज में सक्रिय सहयोग किया। उनकी भागीदारी के बिना दोनों शावकों का पता लगाना और अभियान को सफल बनाना संभव नहीं होता।
इस बचाव अभियान में ट्रैप कैमरों का उपयोग क्यों किया गया?
मादा तेंदुआ मानवीय उपस्थिति में शावकों के पास नहीं आती, इसलिए वन विभाग ने दूरी बनाए रखते हुए हाई-रेजोल्यूशन ट्रैप कैमरों से निगरानी की। इन्हीं कैमरों में वह पल कैद हुआ जब मादा तेंदुआ दोनों शावकों को लेकर जंगल में लौटी।
यह अभियान मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
यह अभियान दर्शाता है कि सामुदायिक जागरूकता और वन विभाग के समन्वय से संवेदनशील वन्यजीव मामलों को सफलतापूर्वक सुलझाया जा सकता है। देशभर में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने के संदर्भ में बस्तर का यह मॉडल एक सकारात्मक नज़ीर पेश करता है।
राष्ट्र प्रेस
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