जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने सैनिक स्कूल रीवा का दौरा किया, कैडेट्स संग साझा किए भावनात्मक पल
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने मंगलवार, 29 अप्रैल 2025 को सैनिक स्कूल रीवा का दौरा किया — वही संस्थान जहाँ से उन्होंने अपनी शिक्षा ग्रहण की थी और जहाँ से उनके सैन्य जीवन की नींव पड़ी थी। यह दौरा उनके लिए गर्व, कृतज्ञता और स्मृतियों से भरा रहा।
अल्मा मेटर में भावनात्मक वापसी
सेना प्रमुख ने स्कूल परिसर में स्थित मेमोरियल पर श्रद्धांजलि अर्पित की और कैडेट्स द्वारा दिए गए गार्ड ऑफ ऑनर का निरीक्षण किया। स्कूल के गलियारों में एक बार फिर कदम रखते हुए जनरल द्विवेदी ने अपने पुराने अनुभव साझा किए। यह वही स्थान है जहाँ उनके अनुशासन, साहस और नेतृत्व की यात्रा की शुरुआत हुई थी।
कैडेट्स और शिक्षकों को प्रेरणा
इस अवसर पर जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने स्कूल के शिक्षकों और कैडेट्स की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे इस महत्वपूर्ण संस्थान की श्रेष्ठ परंपराओं को आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने युवा कैडेट्स को प्रेरित किया कि वे ईमानदारी, समर्पण और राष्ट्र के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ें। गौरतलब है कि सैनिक स्कूल जैसे संस्थान देश के सैन्य नेतृत्व को तैयार करने की आधारशिला रखते हैं।
CDS जनरल अनिल चौहान की आर्मेनिया के साथ रक्षा वार्ता
इसी बीच, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने भारत यात्रा पर आए आर्मेनिया के जनरल स्टाफ प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल एडवर्ड अस्रयान से मुलाकात की। इस दौरान लेफ्टिनेंट जनरल एडवर्ड को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया और दोनों अधिकारियों के बीच रक्षा सहयोग पर विस्तृत चर्चा हुई। बैठक में भारत और आर्मेनिया के बीच रक्षा संबंधों को और मज़बूत बनाने पर विशेष जोर दिया गया।
सैन्य उपकरणों में सहयोग की संभावनाएँ
दोनों पक्षों ने सैन्य उपकरणों के संयुक्त विकास के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर भी विचार-विमर्श किया। उल्लेखनीय है कि आर्मेनिया भारतीय रक्षा उपकरणों में विशेष रुचि दिखाता रहा है। यह वार्ता भविष्य में एक मज़बूत, आधुनिक और परस्पर लाभकारी रणनीतिक साझेदारी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
संस्थान की विरासत को सम्मान
सेना प्रमुख का सैनिक स्कूल रीवा दौरा गुरु-शिष्य परंपरा और संस्थागत विरासत के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक रहा। यह दौरा न केवल उनकी व्यक्तिगत यात्रा को दर्शाता है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि देश के शीर्ष सैन्य नेतृत्व की जड़ें इन्हीं संस्थानों में हैं — और आगे भी रहेंगी।