29 सितंबर 2026
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संभल हिंसा: सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज का NSA रद्द किया, यूपी सरकार पर ₹10 लाख जुर्माना

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संभल हिंसा: सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज का NSA रद्द किया, यूपी सरकार पर ₹10 लाख जुर्माना

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने संभल हिंसा के मुख्य आरोपी मुल्ला अफरोज पर लगा NSA गैरकानूनी करार देकर रद्द किया और जमानत मंजूर की। यूपी सरकार पर ₹10 लाख का जुर्माना — इलाहाबाद हाईकोर्ट का NSA समर्थक फैसला भी पलटा। NSA के इस्तेमाल पर न्यायपालिका की यह तीखी टिप्पणी एक बड़ी मिसाल बन सकती है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 29 सितंबर 2026 को संभल हिंसा आरोपी मुल्ला अफरोज पर लगाया गया NSA रद्द किया।
न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाया और NSA लगाने की प्रक्रिया को गैरकानूनी माना।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का NSA के पक्ष में दिया गया फैसला भी सर्वोच्च न्यायालय ने पलट दिया।
यूपी सरकार ने अक्टूबर 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिलते ही मुल्ला अफरोज पर NSA लगाकर पुनः गिरफ्तार किया था।
संभल हिंसा नवंबर 2024 में शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान भड़की थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने 29 सितंबर 2026 को संभल हिंसा मामले के मुख्य आरोपी मुल्ला अफरोज पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) को गैरकानूनी करार देते हुए रद्द कर दिया और उनकी जमानत याचिका स्वीकार कर ली। न्यायालय ने साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख का जुर्माना भी ठोका, यह मानते हुए कि NSA का इस मामले में दुरुपयोग किया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

नवंबर 2024 में उत्तर प्रदेश के संभल जिले में शाही जामा मस्जिद के न्यायालय-निर्देशित सर्वे के दौरान भड़की हिंसा में कई लोगों की जानें गई थीं और व्यापक तोड़फोड़ हुई थी। पुलिस ने मुल्ला अफरोज को इस हिंसा का मुख्य साजिशकर्ता बताते हुए गिरफ्तार किया था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय से जमानत मिलने के तुरंत बाद अक्टूबर 2025 में यूपी सरकार ने उन पर NSA लगाकर पुनः गिरफ्तार कर लिया था।

गौरतलब है कि NSA के तहत किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है। इसी कार्रवाई को चुनौती देते हुए मुल्ला अफरोज ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियाँ

सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने यूपी सरकार की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए। न्यायालय ने पूछा कि क्या पुलिस हिरासत में दर्ज किए गए ऐसे बयान को NSA के तहत निवारक नजरबंदी का आधार बनाया जा सकता है, जो कानूनी रूप से न्यायालय में साक्ष्य के तौर पर मान्य नहीं होता। न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को भी पलट दिया जिसमें NSA को उचित ठहराया गया था।

यूपी सरकार का पक्ष और न्यायालय का निर्णय

उत्तर प्रदेश सरकार ने अपनी स्थिति का बचाव करते हुए दलील दी थी कि मुल्ला अफरोज की रिहाई से क्षेत्र में पुनः हिंसा भड़कने और सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की आशंका थी, इसलिए निवारक नजरबंदी अनिवार्य थी। हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार की इस दलील को अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना कि NSA लगाने की पूरी प्रक्रिया कानूनी मानकों पर खरी नहीं उतरती और इस कानून का इस्तेमाल गलत तरीके से किया गया।

NSA के दुरुपयोग पर व्यापक चिंता

यह ऐसे समय में आया है जब नागरिक अधिकार संगठन और विपक्षी दल लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के कथित दुरुपयोग पर आवाज़ उठाते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय से जमानत मिलते ही NSA लगाने की यह रणनीति न्यायिक आदेशों को प्रभावहीन बनाती है। सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला NSA के इस्तेमाल पर एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।

आगे की राह

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार मुल्ला अफरोज को अब जमानत पर रिहा किया जाएगा। संभल हिंसा से जुड़े अन्य आपराधिक मामलों में कार्यवाही यथावत जारी रहेगी। यूपी सरकार पर लगाया गया ₹10 लाख का जुर्माना इस मामले में न्यायपालिका की नाराज़गी का स्पष्ट संकेत है। न्यायिक विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला भविष्य में NSA की समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई की दिशा तय कर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह न्यायपालिका का स्पष्ट संदेश है कि NSA कोई आसान विकल्प नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या यह फैसला यूपी और अन्य राज्यों में NSA के इस्तेमाल के तरीके में वास्तविक बदलाव लाएगा, या अगली बार प्रक्रियागत खामियाँ सुधारकर वही रणनीति दोहराई जाएगी। संभल हिंसा के अन्य आपराधिक मुकदमे जारी हैं — जमानत मिलना दोषमुक्ति नहीं है, यह भेद सार्वजनिक विमर्श में अक्सर धुँधला हो जाता है।
RashtraPress
29 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज का NSA क्यों रद्द किया?
सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यूपी सरकार ने गैरकानूनी तरीके से NSA लगाया था — विशेष रूप से पुलिस हिरासत में दर्ज उस बयान के आधार पर, जो न्यायालय में साक्ष्य के रूप में मान्य नहीं होता। न्यायालय ने इसे NSA का दुरुपयोग करार देते हुए जमानत याचिका मंजूर कर ली।
संभल हिंसा मामला क्या है?
नवंबर 2024 में उत्तर प्रदेश के संभल जिले में शाही जामा मस्जिद के न्यायालय-निर्देशित सर्वे के दौरान व्यापक हिंसा भड़की थी। मुल्ला अफरोज पर इस हिंसा का मुख्य साजिशकर्ता होने का आरोप लगाया गया था और उन्हें गिरफ्तार किया गया था।
यूपी सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद NSA क्यों लगाया?
उत्तर प्रदेश सरकार का तर्क था कि मुल्ला अफरोज की रिहाई से क्षेत्र में दोबारा हिंसा और सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने का खतरा था, इसलिए अक्टूबर 2025 में उन पर NSA लगाकर निवारक नजरबंदी जरूरी बताई गई। सर्वोच्च न्यायालय ने इस दलील को अस्वीकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार पर ₹10 लाख जुर्माना क्यों लगाया?
न्यायालय ने NSA लगाने की प्रक्रिया को गैरकानूनी पाया और इसे कानून के दुरुपयोग की श्रेणी में रखा। ₹10 लाख का जुर्माना सरकार की इस कार्रवाई पर न्यायपालिका की कड़ी नाराज़गी का संकेत है।
क्या NSA रद्द होने के बाद मुल्ला अफरोज सभी मामलों से मुक्त हो गए?
नहीं। NSA रद्द होने और जमानत मिलने का अर्थ केवल निवारक नजरबंदी का समाप्त होना है। संभल हिंसा से जुड़े अन्य आपराधिक मामले यथावत न्यायालय में विचाराधीन रहेंगे।
राष्ट्र प्रेस
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