बनभूलपुरा हिंसा: सुप्रीम कोर्ट ने जावेद सिद्दीकी की जमानत रद्द की, दो हफ्ते में सरेंडर का आदेश
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड के बनभूलपुरा में फरवरी 2024 में हुई हिंसा के मुख्य आरोपी जावेद सिद्दीकी और अरशद अयूब की जमानत रद्द करते हुए उन्हें दो हफ्ते के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया है। उत्तराखंड सरकार ने नैनीताल हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें आरोपियों को डिफॉल्ट बेल दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
फरवरी 2024 में बनभूलपुरा क्षेत्र में रेलवे की भूमि पर चल रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान बड़े पैमाने पर आगजनी और हिंसा हुई थी। पुलिस स्टेशन सहित सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचाया गया था। पुलिस के अनुसार, इस घटना में पेट्रोल बम और अन्य हथियारों का इस्तेमाल किया गया था।
पुलिस ने इस मामले में मुख्य आरोपी जावेद सिद्दीकी समेत अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। यह घटना उत्तराखंड में कानून-व्यवस्था के लिहाज से एक गंभीर मामला बनी, जिसने राज्य सरकार और न्यायपालिका दोनों का ध्यान खींचा।
हाईकोर्ट का फैसला और सरकार की चुनौती
पिछले महीने नैनीताल हाईकोर्ट ने आरोपियों को डिफॉल्ट बेल दे दी थी। इसके बाद उत्तराखंड सरकार ने इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। सरकार का तर्क था कि जाँच एजेंसी ने जाँच के लिए अदालत से जो अतिरिक्त समय माँगा था, वह प्रक्रियागत रूप से उचित था।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड सरकार की अपील स्वीकार करते हुए आरोपियों की जमानत खारिज कर दी। न्यायालय ने माना कि जाँच एजेंसी द्वारा जाँच के लिए अदालत से अतिरिक्त समय लेना गलत नहीं था। इस आधार पर डिफॉल्ट बेल को अनुचित ठहराया गया।
हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी नियमित जमानत की अर्जी संबंधित निचली अदालत में दाखिल करने के लिए स्वतंत्र हैं। दोनों आरोपियों को दो हफ्ते के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया गया है।
आगे क्या होगा
अब आरोपी जावेद सिद्दीकी और अरशद अयूब के पास दो विकल्प हैं — या तो निर्धारित समय-सीमा में सरेंडर करें, या नियमित जमानत के लिए निचली अदालत का दरवाजा खटखटाएँ। यह मामला उत्तराखंड में सांप्रदायिक हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति विनाश से जुड़े मुकदमों में न्यायिक सक्रियता की एक महत्त्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।