मराठी अनिवार्यता विवाद: संजय निरुपम बोले- गरीब ड्राइवरों पर दबाव नहीं, कॉर्पोरेट पर क्यों नहीं नियम?
सारांश
Key Takeaways
- शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम ने 24 अप्रैल को कहा कि मराठी अनिवार्यता का नियम केवल गरीब ड्राइवरों पर नहीं, कॉर्पोरेट सेक्टर पर भी लागू होना चाहिए।
- वकील गुणरत्न सदावर्ते ने इस प्रस्ताव को भारतीय संविधान और मोटर वाहन अधिनियम का उल्लंघन बताते हुए कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी।
- परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक पर सवाल उठाए गए कि इस नीति के पीछे कोई छिपा एजेंडा तो नहीं।
- MNS नेता संदीप देशपांडे ने कहा कि मराठी न बोलने वाले मुंबई को बंधक नहीं बना सकते और उन्हें अपने गृह राज्य जाना चाहिए।
- शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने मराठी सम्मान का समर्थन करते हुए कहा कि राज्य में रहने वालों को स्थानीय भाषा का आदर करना चाहिए।
- यह मामला बॉम्बे हाईकोर्ट तक पहुंच सकता है और महाराष्ट्र के लाखों प्रवासी ऑटो-टैक्सी चालकों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।
मुंबई, 24 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। महाराष्ट्र में ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा को अनिवार्य किए जाने के प्रस्ताव ने राज्य की राजनीति में एक तीखी बहस को जन्म दे दिया है। शिवसेना के प्रवक्ता संजय निरुपम ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी मराठी भाषा के प्रचार-प्रसार की विरोधी नहीं है, लेकिन किसी भी नीति को लागू करते वक्त समाज के गरीब और कमजोर वर्गों पर अनावश्यक बोझ नहीं थोपा जाना चाहिए।
निरुपम का केंद्रीय सवाल: केवल ड्राइवरों पर ही क्यों?
संजय निरुपम ने राष्ट्र प्रेस से बातचीत में कहा कि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) और शिवसेना का इस मुद्दे पर मूल रुख काफी हद तक एक जैसा है। उन्होंने तीखा सवाल उठाया कि मराठी बोलने की शर्त केवल ऑटो-टैक्सी चालकों पर ही क्यों लादी जा रही है, जबकि कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। उनका कहना है कि बड़ी कंपनियों में बैठे लोगों पर यह नियम लागू क्यों नहीं होता?
निरुपम ने बालासाहेब ठाकरे की विचारधारा का संदर्भ देते हुए कहा कि बाला साहेब हमेशा आम और मेहनतकश लोगों के पक्षधर रहे। उनकी सोच थी कि किसी भी नीति का बोझ समाज के सबसे कमजोर तबके पर नहीं पड़ना चाहिए। इस संदर्भ में गरीब ड्राइवरों को निशाना बनाना उनकी विचारधारा के विपरीत है।
वकील गुणरत्न सदावर्ते की कानूनी चेतावनी
वरिष्ठ वकील गुणरत्न सदावर्ते ने इस प्रस्तावित नियम को भारत के संविधान, मोटर वाहन अधिनियम और महाराष्ट्र के अपने नियमों का उल्लंघन करार दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि इस फैसले का हर स्तर पर विरोध होगा और यदि किसी भी ऑटो चालक के साथ अन्याय हुआ तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
सदावर्ते ने परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक पर भी सवाल दागे और कहा कि उन्हें आत्मचिंतन करना चाहिए तथा यह स्पष्ट करना चाहिए कि इस नीति के पीछे कोई छिपा हुआ एजेंडा तो नहीं है।
संजय राउत बोले: मराठी का सम्मान जरूरी
शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने मराठी भाषा के उपयोग का समर्थन करते हुए कहा कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि जिस तरह तमिलनाडु में तमिल, पश्चिम बंगाल में बंगाली और उत्तर भारत के शहरों में हिंदी का प्रयोग स्वाभाविक है, उसी तरह महाराष्ट्र में मराठी का सम्मान होना चाहिए।
राउत ने आगे कहा कि यदि राज्य में इस संबंध में कोई कानून बनता है तो सभी को उसका अनुपालन करना होगा, विशेषकर वे लोग जो यहां रहकर आजीविका कमा रहे हैं।
MNS नेता संदीप देशपांडे का कड़ा रुख
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के नेता संदीप देशपांडे ने सबसे आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि कोई भी यूनियन यह कहकर मुंबई को बंधक नहीं बना सकती कि वे मराठी नहीं बोलेंगे। जो लोग ऐसा करते हैं, उन्हें अपने गृह राज्य जाकर काम करना चाहिए।
देशपांडे ने स्पष्ट किया कि चाहे कर्नाटक हो, तमिलनाडु हो या गुजरात — हर राज्य में स्थानीय भाषा का सम्मान करना अनिवार्य है। किसी भी राज्य में व्यवसाय करने वाले व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह वहां की भाषा और संस्कृति का आदर करे।
विवाद का व्यापक संदर्भ और आगे की राह
गौरतलब है कि मराठी भाषा को लेकर महाराष्ट्र में समय-समय पर राजनीतिक तनाव उभरता रहा है। MNS ने वर्षों पहले भी उत्तर भारतीय प्रवासियों के खिलाफ अभियान चलाया था, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर विवाद खड़ा किया था। इस बार का विवाद सीधे परिवहन नीति से जुड़ा है और इसका असर मुंबई समेत पूरे महाराष्ट्र के लाखों ऑटो-टैक्सी चालकों पर पड़ सकता है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक इस नीति को अंतिम रूप देते हैं या विरोध के मद्देनजर इसमें बदलाव करते हैं। कानूनी चुनौती की संभावना को देखते हुए यह मामला बॉम्बे हाईकोर्ट तक भी पहुंच सकता है।