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संस्कृति संसद 2026: काशी में 3 5 नवंबर को जुटेंगे 3,000 संत, जेन जी को मिलेगा स्वतंत्र बोलने का मंच

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संस्कृति संसद 2026: काशी में 3 5 नवंबर को जुटेंगे 3,000 संत, जेन जी को मिलेगा स्वतंत्र बोलने का मंच

सारांश

काशी में पहली बार जेन जी को सिर्फ श्रोता नहीं, वक्ता बनाया जाएगा। गंगा महासभा की संस्कृति संसद 2026 में 3,000 संत, मनुस्मृति पर अखिल भारतीय शोध समिति का खाका और युवा पीढ़ी के लिए स्वतंत्र सत्र — यह आयोजन परंपरा और आधुनिकता के बीच की खाई पाटने का प्रयास है।

मुख्य बातें

गंगा महासभा ने 3 से 5 नवंबर 2026 को वाराणसी के रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में संस्कृति संसद 2026 के आयोजन की घोषणा की है।
देशभर से लगभग 3,000 संत, विद्वान और कलाकार भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय पहचान पर विमर्श करेंगे।
पहली बार जेन जी के लिए तीन दिन का स्वतंत्र मंच — जहाँ युवा खुद बोलेंगे, केवल सुनेंगे नहीं।
31 अक्टूबर से 2 नवंबर तक अंतरराष्ट्रीय चित्रकला और फोटोग्राफी कार्यशाला होगी।
मनुस्मृति की मूल पांडुलिपि के अन्वेषण के लिए एक अखिल भारतीय समिति के गठन पर विमर्श होगा।
सभागार की क्षमता सीमित होने के कारण जेन जी सत्र में 150 से अधिक प्रतिभागी नहीं बैठ सकते।

गंगा महासभा ने वाराणसी के रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में 3 से 5 नवंबर 2026 तक संस्कृति संसद 2026 के आयोजन की घोषणा की है, जिसमें देशभर से लगभग 3,000 संत, विद्वान और कलाकार भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय पहचान और युवाओं के मुद्दों पर विचार विमर्श करने के लिए एकत्रित होंगे। इस बार के आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जेन जी (Gen Z) के लिए पहली बार एक स्वतंत्र मंच तैयार किया गया है जहाँ युवा सिर्फ सुनेंगे नहीं, बल्कि अपनी बात कहेंगे।

मुख्य घटनाक्रम

काशी विद्वत परिषद के महासचिव रामनारायण द्विवेदी ने बताया कि इस संसद में मनुस्मृति पर चल रहे विमर्श को लेकर एक अखिल भारतीय समिति के गठन पर चर्चा होगी। उन्होंने कहा, "विलियम जोन्स द्वारा अनूदित मनुस्मृति के पूर्वापर ग्रंथों के अध्ययन के बाद कई प्रश्न खड़े हो रहे हैं। इन प्रश्नों के समाधान के लिए हमें मूल पांडुलिपि का अन्वेषण और शोध करना है।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि देश विदेश के विश्वविद्यालयों में मौजूद पांडुलिपियों को भारत लाकर वास्तविक ग्रंथ स्वरूप तैयार करने पर विचार होगा।

अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महासचिव स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने बताया कि संस्कृति संसद से पूर्व 31 अक्टूबर से 2 नवंबर तक एक अंतरराष्ट्रीय चित्रकला और फोटोग्राफी कार्यशाला का आयोजन होगा, जिसमें भारत — विशेषकर उत्तर प्रदेश — की धार्मिक धरोहरों को केंद्र में रखा जाएगा। उन्होंने इसे अपनी तरह का पहला प्रयोग बताया, जिसमें धर्माचार्यों से लेकर पद्म पुरस्कार विजेता विद्वान और चित्रकार सभी एक साथ भाग लेंगे।

जेन जी को बोलने का मंच

स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा, "अभी देश में जेन जी के नाम पर युवाओं को बिठाकर बड़े बड़े लोगों द्वारा संबोधित किया जा रहा है, लेकिन जेन जी सिर्फ सुनना नहीं, बोलना चाहता है।" उन्होंने बताया कि इस प्रयोग के तहत पहली बार काशी में तीन दिन लगातार जेन जी को ही बोलने के लिए अलग मंच दिया जाएगा। हालाँकि, उन्होंने स्वीकार किया कि सभागार की क्षमता सीमित होने के कारण — छोटे सभागार में 150 से अधिक प्रतिभागी नहीं बैठ सकते — केवल चिन्हित युवाओं को ही शामिल किया जाएगा।

संतों का दृष्टिकोण

पातालपुरी मठ के जगद्गुरु बालक देवाचार्य जी महाराज ने संस्कृति संसद को एक व्यापक मंच बताया। उन्होंने कहा, "संस्कृति संसद एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो सभी को मौका देता है।" उन्होंने यह भी कहा कि जेन जी के नाम पर भारतीय संस्कृति को नुकसान पहुँचाने के कथित प्रयासों को यह आयोजन बेनकाब करेगा। उनके वक्तव्य में राजनीतिक प्रतिक्रिया भी शामिल थी — उन्होंने विपक्ष पर अराजकता फैलाने का आरोप लगाया, जो एक विवादास्पद राजनीतिक टिप्पणी है।

आगे क्या होगा

आयोजकों के अनुसार तीन चार दिनों के इस महाआयोजन में सनातन हिंदू धर्म से जुड़े विषयों पर व्यापक विमर्श होगा। मनुस्मृति की मूल पांडुलिपि पर शोध के लिए गठित होने वाली अखिल भारतीय समिति की संरचना पर निर्णय सभी प्रतिभागियों के परामर्श के बाद सार्वजनिक किया जाएगा। यह आयोजन यह भी तय करेगा कि वैश्विक स्तर पर विदेशों में मौजूद पांडुलिपियों को काशी कैसे लाया जाए।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि संवाद की भागीदार है। लेकिन जब सभागार की क्षमता मात्र 150 है और 'चिन्हित युवाओं' की बात होती है, तो यह सवाल उठता है कि चयन की कसौटी क्या होगी — विविध विचार या सहमत स्वर। मनुस्मृति पर अखिल भारतीय शोध समिति का विचार अकादमिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, किंतु इसकी विश्वसनीयता तभी बनेगी जब इसमें विभिन्न विचारधाराओं के विद्वान शामिल हों। वक्तव्यों में राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप की मिलावट आयोजन की सांस्कृतिक पवित्रता पर सवालिया निशान लगाती है।
RashtraPress
11 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संस्कृति संसद 2026 क्या है और यह कब होगी?
संस्कृति संसद 2026 गंगा महासभा द्वारा आयोजित एक तीन दिवसीय सम्मेलन है, जो 3 से 5 नवंबर 2026 को वाराणसी के रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में होगा। इसमें भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय पहचान और युवाओं के मुद्दों पर करीब 3,000 संत, विद्वान और कलाकार विचार विमर्श करेंगे।
जेन जी के लिए संस्कृति संसद में क्या खास है?
पहली बार काशी में जेन जी के लिए तीन दिन का स्वतंत्र सत्र रखा गया है जहाँ युवा खुद बोलेंगे। अखिल भारतीय संत समिति के महासचिव स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि युवाओं को सिर्फ सुनाया नहीं जाएगा, बल्कि उन्हें अपनी बात रखने का मंच दिया जाएगा। हालाँकि सभागार की क्षमता सीमित होने के कारण केवल चिन्हित युवा ही इसमें भाग ले सकेंगे।
मनुस्मृति पर क्या विमर्श होगा?
काशी विद्वत परिषद के महासचिव रामनारायण द्विवेदी के अनुसार, विलियम जोन्स द्वारा अनूदित मनुस्मृति के अध्ययन से उठे प्रश्नों के समाधान के लिए मूल पांडुलिपि के अन्वेषण हेतु एक अखिल भारतीय समिति के गठन पर चर्चा होगी। देश विदेश के विश्वविद्यालयों में मौजूद पांडुलिपियों को काशी लाने की योजना भी इस विमर्श का हिस्सा होगी।
संस्कृति संसद से पहले क्या कार्यक्रम होंगे?
संस्कृति संसद से पहले 31 अक्टूबर से 2 नवंबर 2026 तक एक अंतरराष्ट्रीय चित्रकला और फोटोग्राफी कार्यशाला आयोजित होगी। इसमें भारत, विशेषकर उत्तर प्रदेश की धार्मिक धरोहरों को केंद्र में रखा जाएगा और धर्माचार्यों से लेकर पद्म पुरस्कार विजेता विद्वान तक सभी भाग लेंगे।
इस आयोजन में कौन कौन भाग लेगा?
आयोजकों के अनुसार देशभर से लगभग 3,000 संत काशी पधारेंगे और तीन चार दिनों तक रहेंगे। इसके अलावा देश विदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के शिक्षाविद, पद्म पुरस्कार विजेता विद्वान, चित्रकार और जेन जी के चिन्हित युवा प्रतिनिधि भी इसमें शामिल होंगे।
राष्ट्र प्रेस
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