काशी संस्कृत संसद 2026: एकनाथ शिंदे को 'सनातन मार्तंड' सम्मान, आनंद दुबे बोले — धर्म सबसे बड़ा
सारांश
मुख्य बातें
वाराणसी की पावन काशी नगरी में आयोजित संस्कृत संसद 2026 के दौरान 4 नवंबर 2026 को महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को 'धर्मध्वज धारक' और 'सनातन मार्तंड' की उपाधियों से सम्मानित किया गया। इस सम्मान पर शिवसेना नेता आनंद दुबे ने कहा कि यह केवल शिंदे का नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की 13 करोड़ जनता और विश्वभर के सनातनियों का सम्मान है।
संस्कृत संसद 2026 का आयोजन
संस्कृत संसद 2026 का आयोजन 3, 4 और 5 नवंबर को काशी (वाराणसी) में हुआ। आनंद दुबे ने इसे सनातनियों के गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को उजागर करने वाला धार्मिक समागम बताया। उन्होंने कहा, काशी विश्वनाथ की पावन धरती पर दिया गया यह सम्मान भारत के करोड़ों हिंदुओं के लिए भी गर्व का क्षण है।
आनंद दुबे की प्रतिक्रिया
दुबे ने कहा कि सनातन धर्म की विरासत इतनी गहरी और प्राचीन है कि इसे हर कोई नहीं समझ सकता — केवल वही नेता इसे सही मायनों में समझ सकता है जो सनातन धर्म का सम्मान करता हो। उन्होंने कहा, 'सत्ता आएगी, जाएगी; राजनीतिक पार्टियां बनेंगी और बिगड़ेंगी, लेकिन अगर मेरा धर्म नहीं बचा, तो मैं छत्रपति शिवाजी महाराज को क्या मुंह दिखाऊंगा?'
सनातन विरोधियों पर निशाना
दुबे ने बिना किसी का नाम लिए कहा कि जो लोग सनातन को 'डेंगू' कहते हैं, उन्हें ईश्वर दंड देंगे। उन्होंने तमिलनाडु का उदाहरण देते हुए कहा कि द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) के बाद विजय थलपति की सरकार का आना यह प्रमाण है कि धर्म सबसे बड़ा है। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब सनातन धर्म पर बयानबाज़ी राष्ट्रीय राजनीति में एक संवेदनशील मुद्दा बनी हुई है।
इरफान अंसारी के बयान पर पलटवार
झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी के कथित बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए दुबे ने कहा, 'कसाई के चाहने से गाय नहीं मरती।' उन्होंने स्पष्ट किया कि देश अपने लोकतंत्र और संविधान के अनुसार ही चलेगा और कोई भी अराजक तत्व अपने इरादों में सफल नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि जो कोई पड़ोसी देशों की भाषा बोलेगा, उसे किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
आगे का संदर्भ
गौरतलब है कि संस्कृत संसद जैसे आयोजन धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान की राजनीति में अहम भूमिका निभा रहे हैं, विशेष रूप से महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जहाँ शिवसेना की राजनीतिक जड़ें हिंदुत्व और मराठा अस्मिता में गहरी हैं। एकनाथ शिंदे को इस तरह के धार्मिक मंच पर सम्मान मिलना उनकी राजनीतिक छवि को मज़बूत करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।