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वाराणसी में 2-4 नवंबर: 200 वैश्विक विशेषज्ञ 'वसुधैव कुटुम्बकम' से आधुनिक चुनौतियों का समाधान खोजेंगे

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वाराणसी में 2-4 नवंबर: 200 वैश्विक विशेषज्ञ 'वसुधैव कुटुम्बकम' से आधुनिक चुनौतियों का समाधान खोजेंगे

सारांश

वाराणसी में 2 नवंबर से शुरू हो रहे 'वर्ल्ड सिम्पोजियम ऑन एंशिएंट विजडम' में 200 अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ यह तलाशने आए हैं कि क्या हिंदू, बौद्ध और जैन दर्शन की जड़ें आज के संघर्ष, जलवायु संकट और असमानता का उत्तर दे सकती हैं। SDSN प्रमुख जेफ्री सैक्स सहित चार महाद्वीपों के विचारक 'वसुधैव कुटुम्बकम' को नीति की भाषा में ढालने का प्रयास करेंगे।

मुख्य बातें

वाराणसी में 2 से 4 नवंबर 2026 तक 'वर्ल्ड सिम्पोजियम ऑन एंशिएंट विजडम फॉर मॉडर्न चैलेंजेज' आयोजित होगा।
सम्मेलन में दुनिया भर के लगभग 200 विद्वान, दार्शनिक, नीति विशेषज्ञ और शिक्षाविद भाग लेंगे।
SDSN अध्यक्ष जेफ्री सैक्स ने समृद्धि, सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय स्थिरता और विश्व शांति के लिए वैश्विक एकजुटता की अपील की।
यूट्रेक्ट यूनिवर्सिटी की प्रो.
कियारा रोब्बियानो ने कहा — प्राचीन ज्ञान जटिल आधुनिक प्रश्नों के लिए नए दृष्टिकोण देता है।
अदीस अबाबा विश्वविद्यालय के प्रो.
वर्किनेह केलबेसा ने पारंपरिक पर्यावरणीय ज्ञान को आधुनिक चुनौतियों के समाधान में उपयोगी बताया।
प्रतिभागी वाराणसी और सारनाथ के ऐतिहासिक स्थलों का भी भ्रमण करेंगे।

वाराणसी में 2 से 4 नवंबर 2026 तक आयोजित होने वाले 'वर्ल्ड सिम्पोजियम ऑन एंशिएंट विजडम फॉर मॉडर्न चैलेंजेज' में दुनिया भर के लगभग 200 विद्वान, दार्शनिक, शिक्षाविद, नीति विशेषज्ञ और विचारक एकत्रित होंगे। इस त्रिदिवसीय सम्मेलन का केंद्रीय विषय 'वसुधैव कुटुम्बकम' की भावना के आलोक में शांति, सतत विकास, सुशासन और मानव कल्याण को बढ़ावा देना है — जिसमें हिंदू, बौद्ध और जैन दर्शन की प्राचीन परंपराओं को आज की वैश्विक समस्याओं से जोड़ा जाएगा।

सम्मेलन की पृष्ठभूमि और महत्त्व

यह सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब विश्व स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, पर्यावरणीय संकट और सामाजिक विभाजन गहराता जा रहा है। गौरतलब है कि इससे पहले एथेंस, बीजिंग और रोम में भी विश्व दार्शनिक सम्मेलन आयोजित हो चुके हैं, जिनमें विभिन्न सभ्यताओं की विचार परंपराओं के बीच संवाद को मज़बूत किया गया था। वाराणसी का यह आयोजन उसी शृंखला को आगे बढ़ाता है — और भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को वैश्विक नीति-विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास करता है।

जेफ्री सैक्स का आह्वान: एकता और सहयोग

संयुक्त राष्ट्र सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क (SDSN) के अध्यक्ष जेफ्री सैक्स ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वैश्विक स्तर पर संघर्ष, अस्थिरता और विभाजन बढ़ने के बजाय समाज के सभी वर्गों को शांति, सहयोग और साझा भविष्य की दिशा में काम करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, 'समृद्धि, सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय स्थिरता और विश्व शांति जैसे साझा लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए देशों और समाजों को एकजुट होकर आगे बढ़ना होगा।'

सैक्स ने यह भी कहा कि ऐसे सम्मेलन केवल अकादमिक चर्चा का मंच नहीं होते — बल्कि दार्शनिकों, उद्योग जगत, नीति निर्माताओं, राजनीतिक नेताओं और संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधियों के बीच संवाद स्थापित कर व्यावहारिक समाधानों की दिशा भी तय करते हैं।

प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान: विशेषज्ञों के विचार

नीदरलैंड की यूट्रेक्ट यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफेसर कियारा रोब्बियानो ने कहा कि सम्मेलन का सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य विभिन्न संस्कृतियों और विचारधाराओं के बीच संवाद को सशक्त बनाना है। उनके अनुसार, 'प्राचीन ज्ञान परंपराएँ आज के जटिल सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रश्नों को देखने के लिए नए दृष्टिकोण प्रदान करती हैं।' उन्होंने जोर दिया कि आधुनिक चुनौतियों के समाधान के लिए केवल तकनीकी उपायों पर नहीं, बल्कि दार्शनिक सोच और सांस्कृतिक मूल्यों पर भी ध्यान देना होगा।

रोम टोर वर्गाटा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रिकार्डो पॉज्जो ने कहा कि अरस्तू, कन्फ्यूशियस, बुद्ध और इस्लामी चिंतन जैसी परंपराओं को जोड़ने का प्रयास वैश्विक दार्शनिक मंचों पर पहले भी हुआ है। उन्होंने बताया कि दर्शनशास्त्र से शुरू हुआ यह संवाद अब नागरिक समाज, राजनीति और भू-राजनीति तक पहुँच चुका है — और भविष्य में इसकी भूमिका और भी अहम होगी।

अफ्रीकी पारंपरिक ज्ञान की प्रासंगिकता

इथियोपिया के अदीस अबाबा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर वर्किनेह केलबेसा ने कहा कि लंबे समय तक अफ्रीकी और अन्य पारंपरिक समाजों के स्थानीय ज्ञान को कमतर आँका गया। उन्होंने बताया कि शोध से स्पष्ट हुआ है कि अफ्रीका के कई समुदायों और इथियोपिया के जातीय समूहों का पारंपरिक ज्ञान पर्यावरण संरक्षण और सतत जीवनशैली के संदर्भ में अत्यंत मूल्यवान है। केलबेसा के अनुसार, स्थानीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच संतुलन स्थापित करना भविष्य की एक अनिवार्य आवश्यकता होगी।

आगे का कार्यक्रम

सम्मेलन के दौरान प्रतिभागी वाराणसी और सारनाथ के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्थलों का भी भ्रमण करेंगे। आयोजकों का मानना है कि यह वैश्विक मंच शांति, सांस्कृतिक संवाद और सतत विकास के लिए नए विचारों और अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों को प्रोत्साहन देगा। यह सम्मेलन भारत की 'वसुधैव कुटुम्बकम' की अवधारणा को वैश्विक नीति-निर्माण की भाषा में अनुवादित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी यह होगी कि तीन दिन की अकादमिक चर्चा से निकलने वाले विचार किसी बाध्यकारी वैश्विक कार्ययोजना में तब्दील होते हैं या नहीं। एथेंस, बीजिंग और रोम के पिछले दार्शनिक सम्मेलनों के बावजूद भू-राजनीतिक तनाव और जलवायु विफलताएँ जारी हैं — जो यह सवाल उठाती हैं कि दर्शन और नीति के बीच की खाई को पाटने के लिए केवल संवाद पर्याप्त है या संस्थागत तंत्र भी चाहिए। भारत के लिए यह सम्मेलन सॉफ्ट पावर का एक सुनहरा अवसर है, बशर्ते इसके निष्कर्षों को संयुक्त राष्ट्र के मंचों पर ठोस प्रस्तावों के रूप में प्रस्तुत किया जाए।
RashtraPress
1 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'वर्ल्ड सिम्पोजियम ऑन एंशिएंट विजडम फॉर मॉडर्न चैलेंजेज' क्या है?
यह एक अंतर्राष्ट्रीय त्रिदिवसीय सम्मेलन है जो 2 से 4 नवंबर 2026 को वाराणसी में आयोजित हो रहा है, जिसमें लगभग 200 वैश्विक विद्वान, दार्शनिक और नीति विशेषज्ञ भाग लेंगे। इसका उद्देश्य हिंदू, बौद्ध और जैन दर्शन जैसी प्राचीन परंपराओं की मदद से आधुनिक वैश्विक चुनौतियों के समाधान खोजना है।
सम्मेलन में 'वसुधैव कुटुम्बकम' की क्या भूमिका है?
'वसुधैव कुटुम्बकम' — अर्थात 'सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है' — इस सम्मेलन का केंद्रीय विषय है। शांति, सतत विकास, सुशासन और मानव कल्याण को इसी भावना के अनुरूप आगे बढ़ाने पर सभी चर्चाएँ केंद्रित होंगी।
जेफ्री सैक्स ने सम्मेलन के संदर्भ में क्या कहा?
SDSN अध्यक्ष जेफ्री सैक्स ने कहा कि वैश्विक स्तर पर बढ़ते संघर्ष और विभाजन के बीच देशों को शांति, सहयोग और साझे भविष्य की दिशा में एकजुट होकर काम करना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे सम्मेलन दार्शनिकों, नीति निर्माताओं और संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधियों के बीच व्यावहारिक संवाद का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
सम्मेलन में अफ्रीकी पारंपरिक ज्ञान को क्यों शामिल किया गया है?
अदीस अबाबा विश्वविद्यालय के प्रो. वर्किनेह केलबेसा के अनुसार, शोध ने साबित किया है कि अफ्रीकी और अन्य पारंपरिक समाजों के स्थानीय ज्ञान में पर्यावरण संरक्षण और सतत जीवनशैली से जुड़ी महत्त्वपूर्ण सीख है। इस सम्मेलन का एक लक्ष्य इस स्थानीय ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ संतुलित करना भी है।
सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रतिभागी और क्या करेंगे?
अकादमिक सत्रों के अलावा प्रतिभागी वाराणसी और सारनाथ के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्थलों का भ्रमण करेंगे। आयोजकों का मानना है कि इससे प्राचीन ज्ञान परंपराओं की जीवंत अनुभूति विचार-विमर्श को और गहरा बनाएगी।
राष्ट्र प्रेस
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