जयशंकर ने जेजू फोरम में 'वसुधैव कुटुम्बकम' का आह्वान किया, भारत-दक्षिण कोरिया सहयोग पर दिया जोर
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने 26 जून 2026 को दक्षिण कोरिया के जेजू फोरम फॉर पीस एंड प्रॉस्पेरिटी 2026 को संबोधित करते हुए वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए बहुपक्षीय सहयोग की अनिवार्यता पर बल दिया और भारत की सदियों पुरानी अवधारणा 'वसुधैव कुटुम्बकम' — अर्थात 'समूचा विश्व एक परिवार है' — को आज की खंडित दुनिया के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया। यह संबोधन मंगोलिया और दक्षिण कोरिया के उनके चार दिवसीय दौरे के अंतिम चरण में दिया गया।
मुख्य संबोधन: एकजुटता की अनिवार्यता
जयशंकर ने फोरम में कहा, 'विडंबना यह है कि जिन चुनौतियों का हम सामना कर रहे हैं, उन्होंने एकजुटता की आवश्यकता को और अधिक मजबूत किया है। चाहे कोविड जैसी महामारी हो, आतंकवाद की घटनाएं हों या फिर चरम जलवायु घटनाओं का प्रभाव — इन समस्याओं को राजनीतिक सीमाओं के भीतर सीमित नहीं किया जा सकता। अंतरराष्ट्रीय सहयोग अनिवार्य है।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि राष्ट्रीय पहचान और निर्णय-प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से देशकेंद्रित होती है, इसलिए वैश्विक खुलेपन को सचेत प्रयास से अपनाना होगा।
पाँच सूत्री सहयोग का खाका
विदेश मंत्री ने तेजी से बंटती दुनिया में सहयोग को पुनर्जीवित करने के लिए पाँच सूत्री रूपरेखा प्रस्तुत की। पहला, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को जोखिम से मुक्त करने और उत्पादन व आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने की अपील की। दूसरा, प्रभावशाली देशों के बीच नई समझ और घनिष्ठ संबंध बनाने की वकालत की, जो वैश्विक व्यवस्था को स्थिर करे।
तीसरा, उन्होंने 'संकीर्ण सोच और टकराव की कीमत' के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया और यूएनसीएलओएस (समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन) को अंतरराष्ट्रीय कानून की रक्षा के एक सफल उदाहरण के रूप में उद्धृत किया। चौथा, ग्लोबल साउथ को अधिक क्षमता और अवसर देकर 'आकांक्षाओं की शक्ति' को बढ़ावा देने की बात कही। पाँचवाँ, साझा वैश्विक प्रयासों से सार्वजनिक भलाई सुनिश्चित करने का आग्रह किया।
बहुध्रुवीयता और वैश्विक व्यवस्था पर चिंता
जयशंकर ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के समक्ष उभरते खतरों को रेखांकित करते हुए कहा कि दुनिया में हथियारों का उपयोग बढ़ रहा है, जोखिम लेने की प्रवृत्ति तेज हो रही है और सैन्य क्षमताओं का इस्तेमाल तेजी से हो रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया, 'हम नियमों को बनाए रखने के लिए कुछ गिने-चुने देशों पर निर्भर नहीं रह सकते। दुनिया को अपने भविष्य पर अधिक नियंत्रण रखना होगा — और यह बेहतर बहुपक्षवाद में प्रतिबिंबित होना चाहिए।' गौरतलब है कि यह वक्तव्य ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर एकपक्षीय कार्रवाइयों और भू-राजनीतिक तनावों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है।
भारत-दक्षिण कोरिया द्विपक्षीय संभावनाएं
विदेश मंत्री ने इन पाँचों सिद्धांतों को भारत और दक्षिण कोरिया के बीच गहरे सहयोग की नींव बताया। उन्होंने कहा कि जहाज निर्माण (शिपबिल्डिंग), डिजिटल प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, बुनियादी ढाँचा और रक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच पूरकता की अपार संभावनाएं हैं, जिनका अभी पूरा लाभ नहीं उठाया गया है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इन क्षेत्रों में आर्थिक-तकनीकी साझेदारी, राजनीतिक-रणनीतिक सहयोग और लोगों के बीच संबंध उनकी पिछले दिन की द्विपक्षीय बैठकों के केंद्र में रहे।
आगे की राह
यह दौरा भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति के तहत पूर्वी एशिया के साथ रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। जयशंकर के इस संबोधन से स्पष्ट होता है कि भारत वैश्विक मंचों पर अपनी सांस्कृतिक विरासत को कूटनीतिक औजार के रूप में प्रस्तुत करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है।