ब्रिक्स समिट 2026: जयशंकर बोले — वैश्विक सुधार पसंद नहीं, अनिवार्यता है; यूएन सुरक्षा परिषद विस्तार पर दिया जोर

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ब्रिक्स समिट 2026: जयशंकर बोले — वैश्विक सुधार पसंद नहीं, अनिवार्यता है; यूएन सुरक्षा परिषद विस्तार पर दिया जोर

सारांश

ब्रिक्स मंच पर जयशंकर का संदेश सीधा था — वैश्विक संस्थाओं में सुधार अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता है। यूएन सुरक्षा परिषद विस्तार, वित्तीय प्रणाली पुनर्गठन और WTO सुधार — चार सूत्री एजेंडे के साथ भारत ने वैश्विक दक्षिण की आवाज़ को नई धार दी।

मुख्य बातें

जयशंकर ने 15 मई 2026 को भारत मंडपम, नई दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन 2026 के तीसरे सत्र को संबोधित किया।
उन्होंने कहा कि वैश्विक सुधार पसंद का नहीं, बल्कि ज़रूरत का मामला है — बहुपक्षीय ढाँचे आज की बहुध्रुवीय दुनिया के साथ कदम नहीं मिला पाए हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में विस्तार की माँग; एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के प्रतिनिधित्व पर बल।
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली में सुधार की तत्काल आवश्यकता — बहुपक्षीय विकास बैंकों को अधिक सक्षम और संसाधन-सक्षम बनाने की अपील।
WTO को आधार मानकर नियम-आधारित, निष्पक्ष और समावेशी व्यापार प्रणाली की वकालत; गैर-बाज़ार प्रथाओं पर चिंता जताई।
भारत ने 'सुधरे हुए और असरदार बहुपक्षवाद' के लक्ष्य के लिए सभी ब्रिक्स साझेदारों के साथ काम करने की प्रतिबद्धता दोहराई।

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने 15 मई 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन 2026 के दूसरे दिन तीसरे सत्र को संबोधित करते हुए वैश्विक शासन सुधार को समय की माँग बताया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बहुपक्षीय ढाँचों में सुधार अब किसी की इच्छा पर नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था की जीवंतता के लिए अनिवार्य है। अपने समकक्षों और प्रतिनिधिमंडलों को संबोधित करते हुए जयशंकर ने चार सूत्री एजेंडा रखा जिसमें संयुक्त राष्ट्र सुधार से लेकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रणाली तक के पुनर्गठन की बात कही।

मुख्य वक्तव्य: बदलाव की अनिवार्यता

जयशंकर ने अपने उद्घाटन वक्तव्य में कहा, 'हम ऐसे समय में मिल रहे हैं जब ग्लोबल गवर्नेंस कितना असरदार है और बहुपक्षवाद कितना भरोसेमंद है, इस पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।' उन्होंने रेखांकित किया कि आज की दुनिया उस दौर की तुलना में कहीं अधिक परस्पर जुड़ी, जटिल और बहुध्रुवीय हो चुकी है, जब मौजूदा वैश्विक संस्थान स्थापित किए गए थे — फिर भी उन संस्थानों की संरचनाएँ इस बदलाव के साथ कदम नहीं मिला पाई हैं।

उन्होंने कहा कि 'रिफॉर्म पसंद का मामला नहीं है, बल्कि जरूरत है' — और यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि बहुपक्षवाद आज की चुनौतियों से निपटने में कारगर बना रहे। भारत की ओर से उन्होंने 'सुधरे हुए बहुपक्षवाद' की वकालत दोहराई — जो उभरते बाज़ारों और विकासशील देशों की आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करे।

चार सूत्री सुधार एजेंडा

पहला: जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र और उसकी सहायक संस्थाओं में सुधार की तत्काल आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद की संरचना अभी भी पुराने युग को दर्शाती है और स्थायी व अस्थायी — दोनों श्रेणियों में विस्तार के बिना संयुक्त राष्ट्र का प्रभाव और विश्वसनीयता सीमित रहेगी। उन्होंने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के उचित प्रतिनिधित्व पर विशेष बल दिया।

दूसरा: अंतर-सरकारी वार्ता प्रक्रिया (Inter-Governmental Negotiation Process) में हुई प्रगति को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि अब पाठ-आधारित वार्ता की दिशा में आगे बढ़ने का समय आ गया है। उन्होंने जोहान्सबर्ग समिट में ब्रिक्स की आम सहमति का उल्लेख करते हुए कहा कि सुधार को वास्तविकता में बदलने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

तीसरा: अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली में तत्काल सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने आपूर्ति श्रृंखला की कमज़ोरियों, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा पर बढ़ते दबाव और संसाधनों तक असमान पहुँच को प्रमुख चुनौतियाँ बताया। उनके अनुसार बहुपक्षीय विकास बैंकों को अधिक सक्षम, प्रतिक्रियाशील और बड़े पैमाने पर संसाधन जुटाने में सक्षम होना चाहिए; विकास और जलवायु वित्त राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप और सुलभ होना चाहिए।

चौथा: बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को सुदृढ़ और सुधारित करने की बात करते हुए उन्होंने गैर-बाज़ार प्रथाओं, आपूर्ति श्रृंखलाओं की एकाग्रता और बाज़ार पहुँच की अनिश्चितता को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए नए जोखिम बताया। उन्होंने विश्व व्यापार संगठन (WTO) को आधार मानकर एक नियम-आधारित, निष्पक्ष, खुले और समावेशी व्यापार ढाँचे की पुरज़ोर वकालत की।

भारत की प्रतिबद्धता

अपने संबोधन के समापन में जयशंकर ने कहा, 'हमारे समय का संदेश स्पष्ट है — सहयोग ज़रूरी है, संवाद ज़रूरी है, और सुधार की अत्यंत आवश्यकता है।' उन्होंने रेखांकित किया कि भारत न केवल वैश्विक चुनौतियों के प्रबंधन के लिए, बल्कि एक अधिक लोकतांत्रिक, प्रतिनिधित्वपूर्ण और समतापूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के निर्माण के लिए सभी साझेदारों के साथ काम करने को प्रतिबद्ध है।

व्यापक संदर्भ

यह ऐसे समय में आया है जब ब्रिक्स समूह का विस्तार हो चुका है और वैश्विक दक्षिण की आवाज़ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहले से अधिक मुखर हो रही है। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का मुद्दा दशकों से लंबित है और भारत स्थायी सदस्यता का दावेदार रहा है। जयशंकर का यह संबोधन उस दीर्घकालिक भारतीय रुख को ब्रिक्स के साझा मंच पर दोहराता है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ब्रिक्स के आउटकम दस्तावेज़ में इन सुधार-प्रस्तावों को किस रूप में समाहित किया जाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भारत की उस दीर्घकालिक स्थिति की पुनरावृत्ति है जो दशकों से संयुक्त राष्ट्र सुधार और स्थायी सदस्यता के इर्द-गिर्द घूमती रही है — और जो अब तक ठोस परिणाम नहीं दे पाई। असली सवाल यह है कि ब्रिक्स, जो स्वयं अपनी आंतरिक विविधताओं और भू-राजनीतिक खिंचावों से जूझ रहा है, इन सुधार-प्रस्तावों को एकजुट होकर आगे बढ़ाने में कितना सक्षम है। जोहान्सबर्ग समिट में भी यही भाषा थी — आउटकम दस्तावेज़ में सहमति दिखी, लेकिन क्रियान्वयन की राह पर कोई बड़ी छलाँग नहीं लगी। बिना बाध्यकारी तंत्र के, ये संकल्प वैश्विक मंचों पर भारत की साख तो बढ़ाते हैं, पर संस्थागत बदलाव की गति उतनी ही धीमी रहती है।
RashtraPress
15 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रिक्स समिट 2026 में जयशंकर ने क्या कहा?
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने 15 मई 2026 को भारत मंडपम में ब्रिक्स सम्मेलन के तीसरे सत्र में कहा कि वैश्विक शासन में सुधार अब पसंद का नहीं, बल्कि ज़रूरत का मामला है। उन्होंने यूएन सुरक्षा परिषद विस्तार, वित्तीय प्रणाली सुधार और WTO पुनर्गठन सहित चार सूत्री एजेंडा प्रस्तुत किया।
जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधार पर क्या कहा?
जयशंकर ने कहा कि सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना पुराने युग को दर्शाती है और स्थायी व अस्थायी — दोनों श्रेणियों में विस्तार के बिना संयुक्त राष्ट्र का प्रभाव सीमित रहेगा। उन्होंने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के उचित प्रतिनिधित्व की विशेष माँग की।
ब्रिक्स में भारत की 'सुधरे हुए बहुपक्षवाद' की माँग क्या है?
भारत चाहता है कि बहुपक्षीय संस्थाएँ आज की बहुध्रुवीय वास्तविकता को प्रतिबिंबित करें और उभरते बाज़ारों व विकासशील देशों की आकांक्षाओं पर खरी उतरें। इसमें संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और WTO — तीनों में संरचनात्मक बदलाव शामिल हैं।
जयशंकर ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली पर क्या चिंताएँ जताईं?
उन्होंने आपूर्ति श्रृंखला की कमज़ोरियों, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा पर दबाव और संसाधनों तक असमान पहुँच को प्रमुख चुनौतियाँ बताया। उनके अनुसार बहुपक्षीय विकास बैंकों को अधिक सक्षम होना चाहिए और विकास व जलवायु वित्त राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप सुलभ होना चाहिए।
ब्रिक्स समिट 2026 कहाँ और कब हो रहा है?
ब्रिक्स सम्मेलन 2026 नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित हो रहा है। जयशंकर का यह संबोधन 15 मई 2026 को सम्मेलन के दूसरे दिन तीसरे सत्र में हुआ।
राष्ट्र प्रेस
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