जयशंकर का संयुक्त राष्ट्र में आह्वान: ग्लोबल साउथ की एकजुटता अब पहले से कहीं अधिक जरूरी
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 23 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र में भारत की ओर से बुलाई गई ग्लोबल साउथ के समान सोच वाले देशों की उच्च-स्तरीय बैठक की अध्यक्षता करते हुए कहा कि 'ग्लोबल साउथ के लिए एकजुटता दिखाने का इससे अहम समय पहले कभी नहीं रहा।' जयशंकर ने विकासशील देशों को प्रभावित करने वाले बहु-आयामी वैश्विक संकटों — आपूर्ति श्रृंखला अवरोध, खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और तकनीकी निर्भरता — के मद्देनजर आपसी सहयोग को नई दिशा देने का आग्रह किया।
निर्णय-प्रक्रिया में भागीदारी की माँग
जयशंकर ने रेखांकित किया कि ग्लोबल साउथ के देश वैश्विक संकटों का सामना करने में सबसे आगे खड़े हैं, लेकिन नीति-निर्माण और फैसला लेने की प्रक्रियाओं में वे अब भी हाशिये पर हैं। उन्होंने कहा, 'ग्लोबल साउथ को उन फैसला लेने वाले ढाँचों का हिस्सा बनने की जरूरत है जो हमारे भविष्य से सीधे जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श करते हैं।'
यह बयान ऐसे समय में आया है जब संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक उच्च-स्तरीय सत्र में वैश्विक शासन सुधार और बहुपक्षीय संस्थाओं में विकासशील देशों की भूमिका पर गहन चर्चा जारी है। गौरतलब है कि भारत ने G20 की अपनी अध्यक्षता के दौरान भी ग्लोबल साउथ को केंद्र में रखने की पहल की थी।
आर्थिक सहयोग और सप्लाई चेन पर ज़ोर
जयशंकर ने कहा कि 'एक साथ कई वैश्विक संकटों के असर से बचने के लिए ग्लोबल साउथ के देशों के बीच बेहतर आर्थिक सहयोग जरूरी है।' उन्होंने आपूर्ति श्रृंखला, वित्त और कनेक्टिविटी में 'अवरोध पैदा करने वाले बिंदुओं' को अनुचित ठहराया और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत वाणिज्यिक शिपिंग एवं समुद्री कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता दोहराई।
उन्होंने खाद्य सुरक्षा — विशेषकर अनाज और उर्वरक आपूर्ति — की चुनौतियों का 'तेजी से समाधान' करने का आग्रह किया। साथ ही उन्होंने 'निष्पक्ष आर्थिक और व्यापारिक तौर-तरीकों' की वकालत की जो ग्लोबल साउथ की उत्पादन क्षमताओं को बढ़ाएँ और इन देशों को 'सिर्फ उपभोक्ता' बनकर न रहने दें।
औद्योगीकरण के अधिकार की पैरवी
जयशंकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विकासशील देशों को 'औद्योगीकरण के उनके अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।' यह टिप्पणी उस व्यापक बहस के संदर्भ में महत्वपूर्ण है जिसमें विकसित देशों द्वारा जलवायु नीतियों और व्यापार नियमों के जरिये विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की औद्योगिक महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश लगाने के आरोप लगाए जाते रहे हैं।
प्रौद्योगिकी और जलवायु कार्रवाई में स्वावलंबन
विदेश मंत्री ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को 'इंसान-केंद्रित' रखने पर जोर दिया और कहा कि ग्लोबल साउथ के देशों को अपने भीतर विकसित तकनीकी उपकरण और ढाँचे आपस में साझा करने चाहिए। उन्होंने 'ग्लोबल नॉर्थ' पर निर्भरता कम करने का सुझाव देते हुए इंटरनेशनल सोलर अलायंस और कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे वैकल्पिक बहुपक्षीय ढाँचों को जलवायु कार्रवाई में प्रगति का प्रभावी माध्यम बताया।
आगे का रास्ता
इस उच्च-स्तरीय बैठक को भारत के उस कूटनीतिक प्रयास की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है जिसमें वह ग्लोबल साउथ की सामूहिक आवाज़ को वैश्विक मंचों पर प्रभावशाली बनाने की दिशा में काम कर रहा है। आलोचकों का कहना है कि इस एकजुटता को ठोस संस्थागत रूप देने की प्रक्रिया अभी बाकी है, और आने वाले महीनों में इस दिशा में हुई प्रगति की असली परीक्षा होगी।