जयशंकर का G20 में संदेश: युद्ध नहीं, कूटनीति से होगा समाधान; ग्लोबल साउथ को सबसे ज़्यादा नुकसान
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 1 नवंबर 2026 को अटलांटा में आयोजित जी-20 विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद स्पष्ट किया कि भारत का मानना है कि दुनिया के मौजूदा संघर्षों का स्थायी समाधान सैन्य कार्रवाई से नहीं, बल्कि कूटनीति और बातचीत से ही निकलेगा। उन्होंने जी-20 देशों से आग्रह किया कि खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधाओं से बचाने के लिए ठोस सामूहिक प्रयास किए जाएँ।
बैठक का स्वरूप और मुख्य चर्चाएँ
अटलांटा में आयोजित इस बैठक में तीन सत्र हुए — भू-राजनीतिक हालात, ऊर्जा एवं खाद्य सुरक्षा, और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला। पहले दो सत्र शुक्रवार को और आपूर्ति श्रृंखला पर चर्चा शनिवार को संपन्न हुई। जयशंकर ने इसे 'उपयोगी और खुली चर्चा का मंच' बताया।
भू-राजनीतिक सत्र में दुनिया के दो बड़े सक्रिय संघर्षों के वैश्विक दुष्प्रभावों पर विचार-विमर्श हुआ। भारत ने अपना पक्ष स्पष्ट रखा कि इन संघर्षों की कीमत केवल प्रत्यक्ष रूप से शामिल देशों को नहीं, बल्कि 'ग्लोबल साउथ' यानी विकासशील देशों को भी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।
रूस-यूक्रेन संघर्ष पर भारत की सक्रिय भूमिका
जयशंकर ने बताया कि भारत रूस, यूक्रेन और यूरोपीय देशों के साथ निरंतर संपर्क में है। इस संवाद में तीन मुख्य बिंदु शामिल हैं — काला सागर से अनाज की आवाजाही बहाल करना, नागरिक जहाजों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, तथा ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले रोकने के रास्ते तलाशना।
उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ इन मुद्दों पर बातचीत की है। जयशंकर स्वयं मॉस्को और कीव की यात्रा कर चुके हैं। अटलांटा में भी उन्होंने रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ इस विषय पर चर्चा की।
ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले रोकने के सवाल को जयशंकर ने वार्ता का सबसे जटिल पहलू बताया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग देशों के लिए 'ऊर्जा ढाँचे' की परिभाषा अलग होती है — किसी के लिए तेल रिफाइनरी, किसी के लिए बिजली ग्रिड और ईंधन-वाहक जहाज भी इसी श्रेणी में आते हैं।
खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा की चिंता
काला सागर से अनाज की आवाजाही में भारी गिरावट पर चिंता जताते हुए जयशंकर ने कहा कि रूस और यूक्रेन दोनों वैश्विक अनाज बाज़ार में प्रमुख निर्यातक हैं। इनके निर्यात पर असर पड़ने से उन देशों पर सीधा दबाव बनता है जो खाद्य आवश्यकताओं के लिए आयात पर निर्भर हैं।
खाद्य सुरक्षा पर चर्चा में उर्वरकों की उपलब्धता का मुद्दा भी उठा। जयशंकर ने बताया कि उर्वरक आपूर्ति में व्यवधान का संबंध काला सागर के साथ-साथ खाड़ी और लाल सागर क्षेत्र से भी जुड़ा है। ऊर्जा प्रवाह के राजनीतिकरण पर भारत ने गहरी चिंता व्यक्त की, कहा कि इसका सर्वाधिक नुकसान ग्लोबल साउथ को उठाना पड़ता है।
आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण पर भारत का ज़ोर
भारत ने जी-20 मंच पर वैश्विक उत्पादन और विनिर्माण केंद्रों को भौगोलिक रूप से विविध बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। जयशंकर ने कोविड महामारी का उदाहरण देते हुए कहा कि जब सीमित उत्पादन केंद्र बाधित होते हैं, तो उसकी मार पूरी दुनिया झेलती है।
भारत ने आगाह किया कि आपूर्ति श्रृंखलाओं को राजनीतिक दबाव या दूसरे देशों को नुकसान पहुँचाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति से बचना ज़रूरी है। उन्होंने कहा, 'युद्ध को खत्म करने के लिए, अंतहीन युद्धों का सिलसिला रुकना चाहिए।'
क्वाड बैठक और आगे की राह
जी-20 बैठक से इतर भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्रियों ने शनिवार सुबह क्वाड की बैठक की। इस वर्ष यह चारों देशों के विदेश मंत्रियों की तीसरी मुलाकात थी — इससे पहले नई दिल्ली और मनीला में भी बैठकें हो चुकी हैं।
जी-20 में सर्वसम्मत साझा बयान न आने के सवाल पर जयशंकर ने कहा कि नेताओं का शिखर सम्मेलन अभी दिसंबर में होना है और उससे पहले सदस्य देशों के बीच सहमति बनाने के प्रयास तेज होंगे। उन्होंने ब्रिक्स का उदाहरण देते हुए कहा कि विविध सदस्यता के बावजूद वहाँ साझा बयान संभव हुआ था — जी-20 में भी यह संभव है।
ध्रुवीकृत वैश्विक परिवेश में भारत की यह विशिष्ट क्षमता — कि वह परस्पर विरोधी पक्षों के साथ एक साथ संवाद बनाए रख सकता है — को अटलांटा में उपस्थित कई देशों के विदेश मंत्रियों ने स्वीकार किया। दिसंबर शिखर सम्मेलन से पहले भारत की यह कूटनीतिक सक्रियता और अधिक निर्णायक भूमिका निभाएगी।