यूएन महासभा में जयशंकर की चेतावनी: युद्ध के आर्थिक झटके खाने ऊर्जा कीमतों से ग्लोबल साउथ तक पहुँच रहे
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 27 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा की जनरल डिबेट में स्पष्ट किया कि दुनिया के किसी कोने में छिड़े युद्धों की आर्थिक मार सिर्फ संघर्ष क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहती — बल्कि भोजन, ऊर्जा, खाद, वित्त और व्यापार की सप्लाई चेन के जरिए हजारों किलोमीटर दूर बैठे आम परिवारों की जेब तक पहुँचती है। भारत के साथ साथ कैरेबियन, अफ्रीका और हिंद महासागर क्षेत्र के कई देशों ने भी इसी चिंता को सामूहिक रूप से उठाया।
जयशंकर का केंद्रीय संदेश
जयशंकर ने महासभा में कहा, "जो देश इन हालात से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, अक्सर उनकी बात सबसे कम सुनी जाती है।" उन्होंने रेखांकित किया कि लड़ाई से काफी दूर मौजूद देशों को भी खाने, ईंधन, खाद, फाइनेंस और व्यापार की आपूर्ति में रुकावट की कीमत चुकानी पड़ रही है।
उनके अनुसार, शांति बनाए रखने में नाकामी से न केवल सुरक्षा कमजोर हो रही है, बल्कि विकास की रफ्तार भी प्रभावित हो रही है और अब तक हासिल प्रगति पर खतरा मंडरा रहा है — इसका बोझ सबसे अधिक ग्लोबल साउथ के देशों पर पड़ रहा है।
भारत ने यूक्रेन युद्ध और खाड़ी क्षेत्र में जारी संघर्ष पर चिंता जताते हुए सभी पक्षों से संयम बरतने, तनाव कम करने और ऊर्जा व व्यापार की आवाजाही बिना रुकावट जारी रखने की अपील की। साथ ही जहाजों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया।
वैश्विक नेताओं की सामूहिक आवाज़
डोमिनिकन रिपब्लिक के राष्ट्रपति लुइस अबिनादर ने कहा कि यूरोप और मध्य पूर्व के युद्ध भले ही 'हमारे समुद्री तटों से बहुत दूर' हों, लेकिन इनका सीधा असर उनके देश में भोजन और ऊर्जा की कीमतों पर पड़ रहा है। एक विकासशील द्वीपीय देश होने के नाते डोमिनिकन रिपब्लिक ने दूर के आर्थिक झटकों के तेजी से घरेलू अर्थव्यवस्था और आम परिवारों को नुकसान पहुँचाने की क्षमता को बखूबी महसूस किया है।
कोमोरोस के राष्ट्रपति अजाली असौमानी ने कहा कि मध्य पूर्व के युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट में आवाजाही बाधित होने से पूरी दुनिया को झटका लगा है। उनके अनुसार, इस संघर्ष से कोमोरोस जैसे कमजोर और आयात निर्भर देशों की खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा खतरे में है, जिससे सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को हासिल करना और कठिन हो गया है।
पुर्तगाल के प्रधानमंत्री लुइस मोंटेनेग्रो ने कहा कि युद्ध अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कमजोर कर रहे हैं और आर्थिक खुशहाली की संभावनाओं को घटा रहे हैं। उन्होंने कहा, "इससे पैदा हुए ऊर्जा और ईंधन संकट से हर किसी को नुकसान हो रहा है। हमें खुद को मिलकर नुकसान पहुँचाने के इस सिलसिले को खत्म करना होगा।" उन्होंने पड़ोसी देशों, व्यापारिक जहाजों और आम नागरिकों से जुड़े बुनियादी ढाँचे पर हमले रोकने की भी अपील की।
मालदीव और लातविया की चेतावनी
मालदीव के उपराष्ट्रपति हुसैन मोहम्मद लतीफ ने कहा कि आज असुरक्षा सिर्फ युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं रहती — उसका असर समुद्री रास्तों, सप्लाई चेन, वित्तीय बाजारों और डिजिटल नेटवर्क के जरिए दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुँचता है। होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही में रुकावट के कारण ईंधन की कीमतें बढ़ी हैं और खाने की सप्लाई तथा हवाई यात्रा भी प्रभावित हुई है।
मालदीव की अर्थव्यवस्था काफी हद तक आयात और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन पर निर्भर होने के कारण इसका सीधा असर टूरिज्म और सरकारी वित्तीय स्थिरता पर भी पड़ता है। लतीफ ने आगाह किया कि हिंद महासागर में बड़ी शक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा की वजह से छोटे देशों के विकल्प सीमित नहीं होने चाहिए।
लातविया के राष्ट्रपति एडगर्स रिंकेविच ने इस मुद्दे को तत्काल आर्थिक नुकसान से आगे ले जाते हुए कहा, "यूक्रेन में जो होता है, वह सिर्फ यूक्रेन तक सीमित नहीं रहता। मध्य पूर्व, लाल सागर और सूडान में जो होता है, उसका असर भी वहीं तक नहीं रुकता।"
भारत पर सीधा असर
गौरतलब है कि भारत अपनी जरूरत का अधिकतर कच्चा तेल आयात करता है और ऊर्जा, खाद तथा जरूरी वस्तुओं के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक रास्तों पर निर्भर है। इसलिए वैश्विक ईंधन और माल ढुलाई की कीमतों में बदलाव का असर भारत में परिवहन, कृषि और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत पर भी परिलक्षित होता है।
यह ऐसे समय में आया है जब कई विकासशील देश पहले से ही महामारी के बाद की आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं और बढ़ते कर्ज़ के बोझ तले दबे हैं। कई नेताओं ने रेखांकित किया कि परिवहन, ऊर्जा और बीमा की बढ़ती लागत सप्लाई चेन के जरिए आखिरकार आम परिवारों की रसोई और बजट तक पहुँचती है।
आगे क्या होगा
संयुक्त राष्ट्र महासभा की इस जनरल डिबेट में उठाई गई चिंताओं के बाद यह देखना होगा कि क्या वैश्विक समुदाय युद्धों के आर्थिक दुष्प्रभावों को कम करने के लिए किसी ठोस बहुपक्षीय ढाँचे पर आम सहमति बना पाता है। मोंटेनेग्रो ने तेल की कीमतों को प्रभावित करने वाली व्यवस्थाओं पर अंतरराष्ट्रीय चर्चा की माँग भी रखी है, जो आने वाले महीनों में कूटनीतिक एजेंडे पर छाई रह सकती है।