सरकार एफसीआर का बिल लाकर जनता का ध्यान वास्तविक मुद्दों से भटकाना चाहती है: बीजद सांसद सुलता देव
सारांश
Key Takeaways
- विदेशी योगदान (विनियमन) विधेयक पर केंद्र सरकार की आलोचना।
- एनजीओ पर पहले से ही कड़े प्रावधान हैं।
- सरकार को बेरोजगारी और महंगाई पर ध्यान देना चाहिए।
- चुनाव आयोग पर भी उठाए सवाल।
- लोकतंत्र की नींव को मजबूत रखने की आवश्यकता।
नई दिल्ली, 2 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। बीजद सांसद सुलता देव ने गुरुवार को विदेशी योगदान (विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 पर केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना की।
राष्ट्र प्रेस से एक विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि जिन एनजीओ को विदेशी अनुदान मिलता है, वे पहले से ही एफसीआरए का हिसाब-किताब रखते हैं और गृह मंत्रालय के अधीन आते हैं।
सुलता देव ने सवाल किया, "क्यों एफसीआर का बिल लाया जा रहा है? अगर किसी एनजीओ द्वारा फंड का गलत उपयोग हो रहा है तो इसके खिलाफ पहले से ही कार्रवाई की जा सकती है और उन्हें ब्लैकलिस्ट भी किया जा सकता है।" उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को उन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो लोगों के लिए फायदेमंद हों, न कि नए-नए विधेयक लाकर जनता का ध्यान भटकाने पर।
उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी राज्यों में गैस और तेल की कीमतें बढ़ाई जा रही हैं। उन्होंने कहा, "सरकार ने एक साल में दो करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था। 14 साल बीत गए, 28 करोड़ नौकरियां कहां गईं? सरकार केवल इधर-उधर के विधेयक लाकर जनता का ध्यान भटकाना चाहती है।"
एफसीआरए कानून की वर्तमान व्यवस्था पर सुलता देव ने कहा कि पहले से ही काफी कड़े प्रावधान हैं। अगर उनका सही तरीके से पालन किया जाए तो एक भी पैसा गलत जगह नहीं खर्च हो सकता। उन्होंने दावा किया कि नया संशोधन विधेयक एनजीओ क्षेत्र पर अनावश्यक नियंत्रण बढ़ाने का प्रयास है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर भी सुलता देव ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, "आजकल लोग चुनाव आयोग पर सवाल क्यों उठा रहे हैं? हाल ही में एक पत्र वायरल हुआ जिसमें भाजपा की मुहर लगी हुई थी। ऐसा कैसे संभव है?" उन्होंने चेतावनी दी कि अगर चुनाव आयोग ठीक से काम नहीं करेगा तो जनता उसका विश्वास नहीं करेगी। सुलता देव ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया में निष्पक्षता बनाए रखना बेहद आवश्यक है, वरना लोकतंत्र की नींव कमजोर हो जाएगी।
बीजद सांसद ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि वह एफसीआरए संशोधन के माध्यम से एनजीओ पर और सख्त नियंत्रण स्थापित करना चाहती है, जबकि मौजूदा कानून पर्याप्त हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को वास्तविक मुद्दों जैसे बेरोजगारी, महंगाई और विकास पर ध्यान देना चाहिए न कि एनजीओ को निशाना बनाने पर।