सीलमपुर में दिल्ली का पहला कांवड़ शिविर: 42 साल पुरानी परंपरा, 24 घंटे भोजन-सुरक्षा-इलाज
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली के सीलमपुर स्थित धर्मपुरा रेड लाइट पर इस सावन सीजन का सबसे चर्चित कांवड़ शिविर सज चुका है। कांवड़ सेवा समिति, सीलमपुर द्वारा संचालित यह लाला मुरलीधर कांवड़ कैंप — जिसे दिल्ली का पहला कांवड़ शिविर माना जाता है — इस वर्ष अपनी 42वीं वर्षगांठ मना रहा है। 6 अगस्त 2026 को यह शिविर हज़ारों कांवड़ियों की सेवा में पूरी तरह सक्रिय है।
शिविर का इतिहास और महत्व
समिति के सदस्य तीर्थ राम के अनुसार, इस शिविर की नींव स्वयं लाला मुरलीधर ने रखी थी और तभी से हर सावन में यहाँ हज़ारों शिव भक्तों की सेवा की जाती है। यह शिविर न केवल दिल्ली में सबसे पुराना है, बल्कि इसे कांवड़ सेवा की एक जीवंत परंपरा का प्रतीक भी माना जाता है। गौरतलब है कि चार दशकों से अधिक समय में इस शिविर ने लाखों श्रद्धालुओं को सेवाएं प्रदान की हैं।
सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था
शिविर में दिल्ली पुलिस के जवानों के साथ-साथ केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) के जवान भी तैनात हैं। तीर्थ राम ने बताया कि आवश्यकता पड़ने पर SHO स्वयं आकर स्थिति का जायज़ा लेते हैं, जिससे सुरक्षा का पुख्ता इंतज़ाम सुनिश्चित होता है।
स्वास्थ्य और भोजन सेवाएं
कांवड़ियों के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखते हुए शिविर में डॉक्टरों की टीम, प्राथमिक उपचार सुविधा और दवाइयों का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है। 24 घंटे भोजन, चाय-नाश्ते और स्वच्छता का प्रबंध किया गया है, क्योंकि अधिकांश कांवड़िए रात भर पैदल चलते हैं। तीर्थ राम ने कहा कि श्रद्धालुओं की सेवा में कोई कमी नहीं रखी जा रही।
श्रद्धालुओं की प्रतिक्रिया
हरिद्वार से 31 जुलाई को यात्रा शुरू करने वाले एक शिव भक्त ने कहा, 'रास्ते में मैंने कई कांवड़ शिविर देखे, लेकिन यहाँ जैसी मेडिकल सुविधा और इलाज मुझे कहीं नहीं मिला।' एक अन्य कांवड़िए ने बताया, 'यात्रा में मुझे कोई परेशानी नहीं हुई — सभी ज़रूरी सुविधाएं मिल रही हैं।'
कांवड़ यात्रा 2026: कार्यक्रम और महत्व
इस वर्ष कांवड़ यात्रा 2026 की शुरुआत 30 जुलाई को हुई थी — हिंदू पंचांग के अनुसार पवित्र सावन माह के पहले दिन से। यात्रा का चरम सावन शिवरात्रि पर होगा, जो इस वर्ष 11 अगस्त को है; उसी दिन लाखों भक्त शिवलिंग पर गंगाजल से जलाभिषेक करेंगे। लाखों शिव भक्त नंगे पाँव हरिद्वार, गौमुख या सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर बाँस की कांवड़ में भरकर अपने क्षेत्र के शिव मंदिरों तक पैदल यात्रा करते हैं। यह पवित्र यात्रा 28 अगस्त को सावन माह की समाप्ति के साथ पूर्ण होगी।