एसआईआर के बाद ऐतिहासिक बंपर वोटिंग: बंगाल में 93%25, तमिलनाडु में 85%25 — टूट रहे सियासत के पुराने मिथक
सारांश
Key Takeaways
- पश्चिम बंगाल 2026 के पहले चरण में 92.88 प्रतिशत मतदान — 2021 के 81.5 प्रतिशत से करीब 11 अंक की ऐतिहासिक छलांग।
- तमिलनाडु 2026 में 85.15 प्रतिशत मतदान — राज्य के इतिहास का सर्वाधिक मतदान, 2021 के 73.63 प्रतिशत से 11.52 अंक अधिक।
- एसआईआर के तहत बंगाल में 91 लाख और तमिलनाडु में 57 लाख फर्जी या अवैध मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए।
- बंगाल में महिला मतदाताओं का प्रतिशत 92.69%25 रहा, जो पुरुषों के 90.92%25 से अधिक — महिलाएं बनीं निर्णायक साइलेंट वोटर।
- हरियाणा और महाराष्ट्र के बाद बिहार 2025 में भी बंपर वोटिंग के बावजूद सत्तारूढ़ गठबंधन की जीत — पुराना एंटी-इनकंबेंसी मिथक टूटा।
- उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव एसआईआर और नए मतदान ट्रेंड की अगली बड़ी परीक्षा होंगे।
नई दिल्ली, 24 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के बाद 2026 के विधानसभा चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र में एक नया इतिहास रच दिया है। पश्चिम बंगाल में पहले चरण में 92.88 प्रतिशत और तमिलनाडु में 85.15 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ — ये आंकड़े आजादी के बाद से अब तक के सर्वोच्च हैं। इस असाधारण मतदान ने राजनीतिक विश्लेषकों को अपने पुराने सियासी फॉर्मूले और मिथक नए सिरे से परखने पर मजबूर कर दिया है।
एसआईआर अभियान: मतदाता सूची की सफाई का बड़ा असर
चुनाव आयोग ने 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले देशभर में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) अभियान चलाया। इसका मुख्य उद्देश्य मृत, डुप्लीकेट, स्थायी रूप से पलायन कर चुके और गैर-नागरिक मतदाताओं के नाम सूची से हटाना था।
पश्चिम बंगाल में करीब 91 लाख और तमिलनाडु में 57 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए। जब कुल मतदाताओं की संख्या घटी और वास्तविक मतदाताओं ने अपना मताधिकार प्रयोग किया, तो मतदान प्रतिशत गणितीय रूप से ऊपर उछला। असम, केरल और पुडुचेरी में भी यही प्रवृत्ति देखी गई।
एसआईआर के दौरान हुए वेरिफिकेशन ने आम नागरिकों — विशेषकर प्रवासी मजदूरों — में यह आशंका पैदा की कि मतदान न करने पर उनका नाम सूची से काटा जा सकता है। इस मनोवैज्ञानिक दबाव ने भी बड़े पैमाने पर मतदान को प्रोत्साहित किया।
राज्यवार मतदान के ऐतिहासिक आंकड़े
पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव में कुल मतदान 81.5 प्रतिशत था, जो 2026 के पहले चरण में बढ़कर 92.88 प्रतिशत हो गया। इस चरण में कुल 3.6 करोड़ मतदाताओं में से 1.76 करोड़ महिलाएं, 1.84 करोड़ पुरुष और 465 थर्ड जेंडर मतदाता शामिल थे।
महिलाओं का मतदान प्रतिशत 92.69 प्रतिशत रहा, जबकि पुरुषों का 90.92 प्रतिशत और थर्ड जेंडर का 56.79 प्रतिशत। यह पहली बार है जब महिला मतदाताओं ने पुरुषों को इस कदर पीछे छोड़ा।
तमिलनाडु में 2021 में 73.63 प्रतिशत मतदान हुआ था, जो 2026 में उछलकर 85.15 प्रतिशत पर पहुंच गया — राज्य के इतिहास में यह सर्वाधिक मतदान है।
बंपर वोटिंग के तीन प्रमुख कारण
पहला कारण — महिला मतदाताओं की निर्णायक भूमिका: इस चुनाव में महिला वोटरों की संख्या पुरुषों के मुकाबले औसतन 2 से 5 प्रतिशत अधिक रही। केंद्र सरकार की उज्ज्वला, आवास और मुद्रा योजना के साथ-साथ राज्यों की लाडली बहना (मध्यप्रदेश), महतारी वंदन (छत्तीसगढ़), लक्ष्मीर भंडार (बंगाल), मंईयां सम्मान (झारखंड) और लाडकी बहिण (महाराष्ट्र) जैसी योजनाओं ने महिलाओं को एक स्वतंत्र और साइलेंट वोटर वर्ग में बदल दिया है।
दूसरा कारण — फर्जी मतदाताओं की छंटाई: एसआईआर के बाद मतदाता सूची से लाखों अवैध नाम हटने से वास्तविक मतदाताओं का अनुपात बढ़ा, जिससे प्रतिशत स्वाभाविक रूप से ऊपर गया।
तीसरा कारण — नाम कटने का भय: वेरिफिकेशन प्रक्रिया के कारण प्रवासी मजदूरों और सीमांत मतदाताओं में अपना नाम बचाने की चिंता ने उन्हें मतदान केंद्र तक खींचा।
पुराना मिथक बनाम नया प्रो-इनकंबेंसी ट्रेंड
भारतीय राजनीति का एक पुराना मिथक रहा है — जब भी मतदान प्रतिशत अचानक उछलता है, सत्तारूढ़ दल की विदाई तय मानी जाती है। 2011 में पश्चिम बंगाल में 84.3 प्रतिशत की रिकॉर्ड वोटिंग के बाद 34 साल पुरानी वामपंथी सरकार सत्ता से बाहर हुई थी।
लेकिन हाल के चुनावों ने इस मिथक को तोड़ा है। हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में बंपर वोटिंग के बावजूद सत्तारूढ़ गठबंधनों ने प्रचंड बहुमत से वापसी की। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में भी एसआईआर के बाद प्रो-इनकंबेंसी का रुझान स्पष्ट रूप से दिखा, जहां सत्तारूढ़ गठबंधन की सीटों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई।
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सुवाशीष मैत्रा के अनुसार, पहले चरण की 152 सीटों में से 2021 में भाजपा ने 59 सीटें जीती थीं। अगर इस बार वह 80 सीटें भी जीतती है, तो उसे दूसरे चरण की 142 सीटों में से 68 और सीटें जीतनी होंगी — जबकि 2021 में इन क्षेत्रों में उसका स्ट्राइक रेट महज 13 प्रतिशत था।
2026 चुनावों का सियासी समीकरण: आगे क्या
अगर पुराना सियासी फॉर्मूला लागू होता है, तो पश्चिम बंगाल में 93 प्रतिशत के करीब मतदान ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ असंतोष का संकेत है, जिसका फायदा भाजपा को मिल सकता है। उसी तरह, तमिलनाडु में यह डीएमके सरकार के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर का परिचायक हो सकता है।
वहीं अगर नया प्रो-इनकंबेंसी ट्रेंड हावी रहा, तो लक्ष्मीर भंडार की लाभार्थी महिलाएं और अल्पसंख्यक मतदाता ममता बनर्जी को सत्ता में वापस ला सकते हैं। तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी भी उन्हें दोबारा सत्ता दिला सकते हैं।
उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव भी एसआईआर की छाया में होंगे, जो इस नए राजनीतिक ट्रेंड की अगली बड़ी परीक्षा होगी। 2026 के विधानसभा चुनावों के नतीजे यह तय करेंगे कि भारतीय लोकतंत्र में बंपर वोटिंग का अर्थ सत्ता विरोध है या सत्ता समर्थन।