18 अगस्त 2026
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सोशल मीडिया से किशोरों में हार्मोन-विघटनकारी प्रोडक्ट का उपयोग बढ़ा: रटगर्स विश्वविद्यालय की रिसर्च

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सोशल मीडिया से किशोरों में हार्मोन-विघटनकारी प्रोडक्ट का उपयोग बढ़ा: रटगर्स विश्वविद्यालय की रिसर्च

सारांश

अमेरिका में रटगर्स विश्वविद्यालय के एक नए अध्ययन ने खुलासा किया है कि सोशल मीडिया पर ब्यूटी और हेयर केयर कंटेंट देखने वाले किशोर 40% तक अधिक पर्सनल केयर प्रोडक्ट इस्तेमाल करते हैं — और इनमें से कुछ में हार्मोन सिस्टम को प्रभावित करने वाले रसायन हो सकते हैं। यह सोशल मीडिया के स्वास्थ्य पर एक अनदेखे आयाम की ओर इशारा करता है।

मुख्य बातें

रटगर्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का अध्ययन 'जर्नल ऑफ एक्सपोजर साइंस एंड एनवायर्नमेंटल एपिडेमियोलॉजी' में प्रकाशित हुआ।
अध्ययन में न्यू जर्सी के प्रिंसटन हाई स्कूल के 143 छात्रों को शामिल किया गया।
खुद की प्रोडक्ट लाइन वाले इन्फ्लुएंसर्स को फॉलो करने वाले छात्रों ने 30% अधिक और ब्यूटी ट्यूटोरियल देखने वालों ने 40% अधिक प्रोडक्ट इस्तेमाल किए।
लड़कियों ने प्रतिदिन औसतन 14 पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स उपयोग किए — लड़कों की तुलना में लगभग दोगुना।
केवल 19% छात्र नियमित रूप से प्रोडक्ट लेबल पढ़ते थे; मात्र 5% सुरक्षित विकल्प चुनने वाले ऐप या वेबसाइट का उपयोग करते थे।
शोधकर्ताओं के अनुसार, कुछ उत्पादों में पाए जाने वाले फ्थैलेट्स, पैराबेन्स और फेनॉल्स हार्मोन सिग्नलिंग को संभावित रूप से प्रभावित कर सकते हैं।

अमेरिका के रटगर्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नए अध्ययन के अनुसार, जो हाई स्कूल के छात्र सोशल मीडिया पर ब्यूटी, हेयर केयर और मेकअप से जुड़ा कंटेंट अधिक देखते हैं, वे पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स का उपयोग भी उतना ही अधिक करते हैं। चिंताजनक पहलू यह है कि इनमें से कुछ उत्पादों में फ्थैलेट्स, पैराबेन्स और फेनॉल्स जैसे रसायन हो सकते हैं, जो संभावित रूप से शरीर के हार्मोन सिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं। यह शोध 'जर्नल ऑफ एक्सपोजर साइंस एंड एनवायर्नमेंटल एपिडेमियोलॉजी' में प्रकाशित हुआ है।

अध्ययन की पद्धति और दायरा

इस अध्ययन में न्यू जर्सी के प्रिंसटन हाई स्कूल के 143 छात्रों को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने छात्रों से पूछा कि उन्होंने पिछले 24 घंटों में साबुन, शैंपू, डियोड्रेंट, परफ्यूम, सनस्क्रीन, स्किन केयर और मेकअप जैसे कितने पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स उपयोग किए। उम्र, लिंग, कक्षा, जातीयता और माता-पिता की शिक्षा जैसे कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी सोशल मीडिया उपयोग और प्रोडक्ट इस्तेमाल के बीच स्पष्ट संबंध देखा गया।

मुख्य निष्कर्ष

अध्ययन के अनुसार, जिन छात्रों ने अपनी खुद की प्रोडक्ट लाइन रखने वाले सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को फॉलो किया था, उन्होंने पिछले 24 घंटों में औसतन 30 फीसदी अधिक प्रोडक्ट्स का उपयोग किया। वहीं, हेयर या ब्यूटी ट्यूटोरियल देखने वाले छात्रों में यह आँकड़ा 40 फीसदी अधिक पाया गया। लड़कियों ने औसतन 14 पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स प्रतिदिन उपयोग करने की जानकारी दी, जो लड़कों की तुलना में लगभग दोगुना था। करीब 57 फीसदी छात्रों ने पिछले दिन फ्रेगरेंस या परफ्यूम का उपयोग किया था।

हार्मोन पर संभावित जोखिम

शोध की प्रमुख लेखिका एमिली बैरेट के अनुसार, सोशल मीडिया किशोरों को ऐसे पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स अधिक उपयोग करने के लिए प्रेरित कर सकता है जिनमें संभावित रूप से हार्मोन को प्रभावित करने वाले रसायन मौजूद हो सकते हैं। गौरतलब है कि किशोरावस्था वैसे भी शरीर में तेज़ हार्मोनल बदलाव का समय होता है, इसलिए शोधकर्ताओं का मानना है कि इस उम्र में रासायनिक एक्सपोजर को समझना और सीमित करना महत्वपूर्ण हो सकता है। हालाँकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी प्रोडक्ट में रसायन की उपस्थिति का अर्थ यह नहीं है कि उसके उपयोग से निश्चित रूप से बीमारी होगी — जोखिम को समझने के लिए एक्सपोजर की मात्रा और दीर्घकालिक प्रभावों पर और अधिक शोध आवश्यक है।

जागरूकता की कमी चिंताजनक

अध्ययन में सामने आया कि अधिकांश किशोर इन प्रोडक्ट्स में मौजूद सामग्री को लेकर सतर्क नहीं हैं। केवल 19 फीसदी छात्र नियमित रूप से प्रोडक्ट के लेबल पढ़ते थे, जबकि मात्र 5 फीसदी ऐसे ऐप या वेबसाइट का उपयोग करते थे जो अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्प चुनने में सहायता करती हैं। इस अध्ययन की एक विशेष बात यह भी रही कि हाई स्कूल के दो छात्रों — गैब्रिएल कपुटा और वीटा मॉस-वांग — ने सर्वे तैयार करने में सहयोग किया और बाद में इस वैज्ञानिक पेपर के सह-लेखक भी बने।

आगे की दिशा

शोधकर्ता अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि कौन से सोशल मीडिया अकाउंट, इन्फ्लुएंसर्स और संदेश किशोरों के प्रोडक्ट चुनाव को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। भविष्य में बड़े और अधिक विविध समूहों पर अध्ययन की योजना है। शोधकर्ता छात्रों द्वारा उपयोग किए गए प्रोडक्ट्स की जानकारी को उनके मूत्र के नमूनों में मौजूद रसायनों के स्तर से जोड़कर भी विश्लेषण करना चाहते हैं, ताकि वास्तविक जैविक एक्सपोजर का आकलन किया जा सके।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह शोध महज़ अमेरिकी परिप्रेक्ष्य तक सीमित नहीं रहता। हालाँकि यह अध्ययन सीमित नमूने पर आधारित है और कार्य-कारण संबंध स्थापित नहीं करता, फिर भी यह नीति-निर्माताओं और अभिभावकों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है कि डिजिटल साक्षरता केवल स्क्रीन टाइम तक नहीं, बल्कि उत्पाद जागरूकता तक भी विस्तारित होनी चाहिए।
RashtraPress
18 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रटगर्स विश्वविद्यालय के इस अध्ययन में क्या पाया गया?
अध्ययन के अनुसार, सोशल मीडिया पर ब्यूटी और हेयर केयर कंटेंट देखने वाले हाई स्कूल के छात्र पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स का उपयोग 30 से 40 फीसदी अधिक करते हैं। इनमें से कुछ उत्पादों में फ्थैलेट्स और पैराबेन्स जैसे रसायन हो सकते हैं जो संभावित रूप से हार्मोन सिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं।
क्या पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स में मौजूद रसायन वाकई हार्मोन को नुकसान पहुँचाते हैं?
शोधकर्ताओं के अनुसार, फ्थैलेट्स, पैराबेन्स और फेनॉल्स को हार्मोन सिग्नलिंग पर संभावित असर से जोड़ा गया है, लेकिन किसी प्रोडक्ट में रसायन की उपस्थिति का अर्थ निश्चित रूप से बीमारी नहीं है। जोखिम को समझने के लिए एक्सपोजर की मात्रा और दीर्घकालिक प्रभावों पर और अधिक शोध आवश्यक है।
लड़कियों और लड़कों के प्रोडक्ट उपयोग में क्या अंतर पाया गया?
अध्ययन में लड़कियों ने प्रतिदिन औसतन 14 पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स उपयोग करने की जानकारी दी, जो लड़कों की तुलना में लगभग दोगुना था। करीब 57 फीसदी छात्रों ने पिछले 24 घंटों में फ्रेगरेंस या परफ्यूम का उपयोग किया था।
किशोर प्रोडक्ट लेबल पढ़ने को लेकर कितने जागरूक हैं?
अध्ययन के अनुसार, केवल 19 फीसदी छात्र नियमित रूप से प्रोडक्ट के लेबल पढ़ते थे और मात्र 5 फीसदी सुरक्षित विकल्प चुनने में मदद करने वाले ऐप या वेबसाइट का उपयोग करते थे। यह जागरूकता की गंभीर कमी को दर्शाता है।
शोधकर्ता आगे क्या जानना चाहते हैं?
शोधकर्ता अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि कौन से सोशल मीडिया अकाउंट और इन्फ्लुएंसर किशोरों के प्रोडक्ट चुनाव को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। वे छात्रों के उपयोग किए गए प्रोडक्ट्स की जानकारी को उनके मूत्र के नमूनों में रसायनों के स्तर से जोड़कर वास्तविक जैविक एक्सपोजर का आकलन करना चाहते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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