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लो-कैलोरी स्वीटनर्स गट बैक्टीरिया को प्रभावित कर सकते हैं — कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की नई स्टडी

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लो-कैलोरी स्वीटनर्स गट बैक्टीरिया को प्रभावित कर सकते हैं — कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की नई स्टडी

सारांश

चीनी से बचने के लिए अपनाए जाने वाले लो-कैलोरी स्वीटनर्स उतने 'निरापद' नहीं हैं जितना माना जाता था — कैम्ब्रिज के MRC टॉक्सिकोलॉजी यूनिट की स्टडी में 75% स्वीटनर्स का गट बैक्टीरिया पर असर मिला। आइसोस्टेवियोल और एंटीडिप्रेसेंट डुलोक्सेटीन का संयोजन माइक्रोबायोम विविधता को घटाता दिखा।

मुख्य बातें

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के MRC टॉक्सिकोलॉजी यूनिट ने 39 लो-कैलोरी स्वीटनर्स और 25 गट बैक्टीरिया पर प्रयोगशाला परीक्षण किए।
परीक्षण में लगभग 75% स्वीटनर्स ने कम से कम एक प्रकार के बैक्टीरिया की वृद्धि को प्रभावित किया।
स्वीटनर आइसोस्टेवियोल और एंटीडिप्रेसेंट डुलोक्सेटीन के संयोजन ने दो महत्वपूर्ण बैक्टीरिया — रोजबुरिया इंटेस्टाइनलिस और पैराबैक्टेरॉइड्स मर्डे — की वृद्धि अवरुद्ध की।
100 से अधिक संयोजनों में स्वीटनर्स का प्रभाव अकेले उपयोग की तुलना में बदला हुआ पाया गया।
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह अध्ययन केवल लैब स्तर पर है; मनुष्यों पर सीधे प्रभाव की पुष्टि के लिए और शोध आवश्यक है।

यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज के वैज्ञानिकों की एक नई स्टडी के अनुसार, चीनी के विकल्प के रूप में उपयोग किए जाने वाले लो-कैलोरी और आर्टिफिशियल स्वीटनर्स हमारी आंतों में मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया की वृद्धि को प्रभावित कर सकते हैं। 19 जुलाई को सामने आए इस शोध में 39 अलग-अलग स्वीटनर्स और 25 प्रकार के गट बैक्टीरिया पर प्रयोगशाला परीक्षण किए गए। हालाँकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन अभी केवल लैब स्तर पर है और इससे सीधे मनुष्यों पर प्रभाव का दावा नहीं किया जा सकता।

शोध की पृष्ठभूमि और उद्देश्य

हमारी आंतों में करोड़ों सूक्ष्मजीव रहते हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से 'गट माइक्रोबायोम' कहा जाता है। ये बैक्टीरिया केवल पाचन में ही सहायक नहीं होते, बल्कि ब्लड शुगर नियंत्रण, इम्यून सिस्टम को सुदृढ़ रखने और शरीर की अनेक महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रियाओं में भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इस संतुलन के बिगड़ने से समग्र स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के मेडिकल रिसर्च काउंसिल (MRC) टॉक्सिकोलॉजी यूनिट के वैज्ञानिकों ने यह जानने का प्रयास किया कि बाज़ार में प्रचलित स्वीटनर्स सीधे गट बैक्टीरिया पर क्या प्रभाव डालते हैं। इसके लिए लैब में 25 प्रकार के गट बैक्टीरिया को अलग-अलग विकसित किया गया — जिनमें लाभकारी, सामान्य और संभावित रूप से हानिकारक बैक्टीरिया शामिल थे।

मुख्य निष्कर्ष

शोध में सामने आया कि परीक्षण किए गए 39 स्वीटनर्स में से लगभग 75 प्रतिशत ने कम से कम एक प्रकार के बैक्टीरिया की वृद्धि को प्रभावित किया। कुछ स्वीटनर्स ने उन बैक्टीरिया की बढ़त को धीमा कर दिया जो स्वस्थ आंतों के लिए आवश्यक माने जाते हैं।

वैज्ञानिकों ने यह भी जाँचा कि जब इन स्वीटनर्स को कैफीन, वनीला एक्सट्रैक्ट, अन्य स्वीटनर्स और कुछ प्रचलित दवाओं के साथ मिलाया जाता है, तो क्या परिणाम मिलते हैं। इस दौरान 100 से अधिक ऐसे संयोजन पाए गए जहाँ स्वीटनर का प्रभाव अकेले उपयोग की तुलना में बदल गया — कुछ मामलों में बढ़ा, कुछ में घटा।

सबसे चिंताजनक संयोजन

शोध का सबसे उल्लेखनीय निष्कर्ष स्वीटनर आइसोस्टेवियोल और एंटीडिप्रेसेंट दवा डुलोक्सेटीन के संयुक्त प्रभाव से संबंधित था। वैज्ञानिकों के अनुसार, दोनों को एक साथ उपयोग करने पर दो महत्वपूर्ण गट बैक्टीरिया — रोजबुरिया इंटेस्टाइनलिस और पैराबैक्टेरॉइड्स मर्डे — की वृद्धि काफी हद तक अवरुद्ध हो गई। ये दोनों बैक्टीरिया ब्लड शुगर संतुलन, पाचन स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

इसके बाद वैज्ञानिकों ने 25 बैक्टीरिया का एक कृत्रिम समूह तैयार कर वास्तविक आंत जैसी परिस्थितियों का अनुकरण किया। इस मॉडल में भी आइसोस्टेवियोल और डुलोक्सेटीन के मिश्रण ने माइक्रोबायोम की विविधता को घटाया, कुछ कोशिकाओं पर विषैले प्रभाव दिखाए और शरीर की सूजन तथा इम्यून प्रक्रियाओं को प्रभावित करने के संकेत दिए। आमतौर पर माइक्रोबायोम जितना विविध होता है, उसे उतना ही स्वस्थ माना जाता है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

शोध की प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. सोनजा ब्लाशे ने कहा कि स्वीटनर्स को अक्सर इस तरह प्रचारित किया जाता है जैसे इनका शरीर पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन यह अध्ययन उस धारणा को चुनौती देता है। उनके अनुसार, जब ये पदार्थ दवाओं या अन्य फूड एडिटिव्स के साथ मिलते हैं, तो इनके प्रभाव बदल सकते हैं और गट माइक्रोबायोम पर अनपेक्षित असर हो सकता है।

वरिष्ठ लेखक प्रोफेसर किरण पाटिल ने कहा कि यह शोध भविष्य के अध्ययनों का मार्ग प्रशस्त करता है। उनका मत है कि आर्टिफिशियल स्वीटनर्स शरीर से बिना प्रतिक्रिया किए नहीं निकलते — ये गट बैक्टीरिया के साथ अंतःक्रिया कर सकते हैं और अन्य पदार्थों के साथ मिलकर उनका प्रभाव और भी जटिल हो सकता है।

आगे क्या

शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन प्रयोगशाला स्तर पर है और मानव शरीर पर इसके सीधे प्रभाव को अभी प्रमाणित नहीं किया जा सकता। इस दिशा में मानव-आधारित नैदानिक परीक्षण आवश्यक होंगे। फिलहाल, विशेषज्ञों का सुझाव है कि जो लोग एंटीडिप्रेसेंट या अन्य दवाएँ नियमित रूप से लेते हैं, वे स्वीटनर्स के उपयोग के बारे में अपने चिकित्सक से परामर्श करें।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो उनका प्रभाव अप्रत्याशित रूप से बदल सकता है — और एंटीडिप्रेसेंट लेने वाले करोड़ों भारतीय मरीज़ इस जोखिम से अनजान हो सकते हैं। हालाँकि यह केवल लैब अध्ययन है, लेकिन नियामकों और खाद्य उद्योग के लिए यह संकेत है कि 'बायोलॉजिकली इनर्ट' का दावा अब पर्याप्त नहीं है — मानव-आधारित परीक्षण अब अपरिहार्य हैं।
RashtraPress
19 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लो-कैलोरी स्वीटनर्स गट बैक्टीरिया को कैसे प्रभावित करते हैं?
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की स्टडी के अनुसार, लगभग 75% लो-कैलोरी स्वीटनर्स प्रयोगशाला में कम से कम एक प्रकार के गट बैक्टीरिया की वृद्धि को प्रभावित करते हैं। कुछ स्वीटनर्स ने उन बैक्टीरिया की बढ़त धीमी की जो स्वस्थ आंतों के लिए आवश्यक माने जाते हैं।
आइसोस्टेवियोल और डुलोक्सेटीन का संयोजन क्यों खतरनाक माना गया?
शोध में पाया गया कि स्वीटनर आइसोस्टेवियोल और एंटीडिप्रेसेंट डुलोक्सेटीन को एक साथ उपयोग करने पर दो महत्वपूर्ण गट बैक्टीरिया — रोजबुरिया इंटेस्टाइनलिस और पैराबैक्टेरॉइड्स मर्डे — की वृद्धि काफी हद तक अवरुद्ध हो गई। ये बैक्टीरिया ब्लड शुगर, पाचन और इम्यून सिस्टम के लिए ज़रूरी हैं।
क्या इस स्टडी के आधार पर स्वीटनर्स बंद कर देने चाहिए?
नहीं — शोधकर्ताओं ने स्वयं स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन केवल प्रयोगशाला स्तर पर है और मनुष्यों पर सीधे प्रभाव की पुष्टि अभी नहीं हुई है। हालाँकि, जो लोग एंटीडिप्रेसेंट या अन्य नियमित दवाएँ लेते हैं, उन्हें स्वीटनर्स के उपयोग के बारे में अपने चिकित्सक से परामर्श करना उचित होगा।
गट माइक्रोबायोम क्या होता है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
गट माइक्रोबायोम हमारी आंतों में रहने वाले करोड़ों सूक्ष्मजीवों का समूह है। ये बैक्टीरिया पाचन, ब्लड शुगर नियंत्रण और इम्यून सिस्टम को सुदृढ़ रखने में अहम भूमिका निभाते हैं — माइक्रोबायोम जितना विविध होता है, उसे उतना ही स्वस्थ माना जाता है।
यह शोध किसने किया और इसके आगे क्या होगा?
यह शोध कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के MRC टॉक्सिकोलॉजी यूनिट ने किया, जिसकी प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. सोनजा ब्लाशे और वरिष्ठ लेखक प्रोफेसर किरण पाटिल हैं। आगे मानव-आधारित नैदानिक परीक्षणों की आवश्यकता होगी ताकि लैब निष्कर्षों को वास्तविक जीवन परिस्थितियों में सत्यापित किया जा सके।
राष्ट्र प्रेस
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