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मद्रास हाई कोर्ट की टिप्पणी: टीवीके प्रचार में बच्चों को शामिल करना 'गलत चलन', खराब परवरिश की निशानी

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मद्रास हाई कोर्ट की टिप्पणी: टीवीके प्रचार में बच्चों को शामिल करना 'गलत चलन', खराब परवरिश की निशानी

सारांश

मद्रास हाई कोर्ट ने TVK के चुनाव प्रचार में बच्चों के इस्तेमाल को 'गलत चलन' और 'खराब परवरिश' करार दिया। न्यायमूर्ति भरत चक्रवर्ती ने कहा कि ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए संसद को कानून बनाना चाहिए — एक न्यायिक टिप्पणी जो राष्ट्रीय महत्व की है।

मुख्य बातें

मद्रास हाई कोर्ट ने TVK के चुनाव प्रचार में बच्चों के इस्तेमाल को 'राजनीतिक रूप से प्रेरित' और 'खराब परवरिश' बताया।
भरत चक्रवर्ती ने TVK विधायक के.
शिवकुमार की अर्जी स्वीकार करते हुए सलेम नॉर्थ विधानसभा चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की।
आरोप था कि TVK प्रमुख जोसेफ विजय ने बच्चों से अपील की कि वे माता-पिता को 'सीटी' चिह्न को वोट दिलाएँ।
अदालत ने कहा — घर के वयस्कों ने रील बनाई और फैलाई; बच्चों ने स्वतंत्र रूप से वयस्क निर्णय को प्रभावित नहीं किया, इसलिए तकनीकी रूप से 'अनुचित प्रभाव' सिद्ध नहीं।
कोर्ट ने संसद से आग्रह किया कि चुनाव प्रचार में बच्चों की भागीदारी पर स्पष्ट कानून बनाया जाए।

मद्रास हाई कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2026 को तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) के विधानसभा चुनाव प्रचार में बच्चों के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई — यह कहते हुए कि सोशल मीडिया रील्स के ज़रिए बच्चों से अपने माता-पिता को TVK और उसके चुनाव चिह्न 'सीटी' के पक्ष में वोट दिलवाने की कोशिश करना राजनीतिक रूप से प्रेरित, अनुचित और 'खराब परवरिश' का परिचायक है। कोर्ट ने यह टिप्पणी TVK विधायक के. शिवकुमार की उस अर्जी को स्वीकार करते हुए की, जिसमें उन्होंने सलेम नॉर्थ विधानसभा क्षेत्र से उनकी जीत को चुनौती देने वाली एक चुनाव याचिका को खारिज करने की माँग की थी।

मामले का पृष्ठभूमि और मुख्य घटनाक्रम

न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती के समक्ष विचाराधीन चुनाव याचिका में आरोप लगाया गया था कि TVK प्रमुख जोसेफ विजय ने प्रचार के दौरान सीधे बच्चों से अपील की — उनसे कहा कि वे अपने माता-पिता, दादा-दादी और परिजनों को TVK को वोट देने के लिए प्रेरित करें। इसके बाद सोशल मीडिया पर कई रील्स वायरल हुईं, जिनमें बच्चे अपने घर के बड़ों पर TVK के पक्ष में मतदान करने के लिए दबाव डालते नज़र आए।

याचिका में यह भी तर्क दिया गया था कि इस तरह के आचरण को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत 'अनुचित प्रभाव' की श्रेणी में रखा जाना चाहिए और इसे चुनाव रद्द करने का आधार बनाया जाना चाहिए।

अदालत की टिप्पणियाँ और कानूनी व्याख्या

न्यायमूर्ति भरत चक्रवर्ती ने कहा कि किसी राजनीतिक नेता द्वारा बच्चों के बीच प्रचार करना और उनसे अपने माता-पिता को प्रभावित करने को कहना 'पूरी तरह से गलत और अनुचित' है। कोर्ट ने इसे 'खराब परवरिश' बताते हुए स्पष्ट किया कि ऐसी गतिविधियाँ राजनीतिक मकसद से प्रेरित हैं और बच्चों की गरिमा के विरुद्ध भी हैं।

अदालत ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत 'अनुचित प्रभाव' की कानूनी परिभाषा का हवाला दिया और शिव कृपाल सिंह बनाम वी.वी. गिरी मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस मुद्दे पर की गई विस्तृत व्याख्या का भी उल्लेख किया। हालाँकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस विशेष मामले में तकनीकी अर्थों में 'अनुचित प्रभाव' सिद्ध नहीं होता, क्योंकि बच्चों के पास स्वयं के फोन नहीं थे और वे स्वतंत्र रूप से रील नहीं बना सकते थे — रील बनाने और उसे प्रचारित करने का काम घर के वयस्कों ने किया।

अदालत का विश्लेषण: बच्चों की भूमिका और वयस्कों की जिम्मेदारी

कोर्ट ने परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए कहा कि इन वीडियो में दिखे बच्चों ने अकेले या स्वतंत्र रूप से वयस्कों के निर्णय को प्रभावित नहीं किया। बल्कि घर के वयस्कों ने उन्हें राजनीतिक नेता की अपील दिखाई, उन्हें इसमें भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया, रील तैयार की और उसे सोशल मीडिया पर फैलाया। इसलिए इसे अधिक से अधिक किसी राजनीतिक दल और उसके उम्मीदवार के पक्ष में वोट दिलाने का एक अप्रत्यक्ष प्रयास माना जा सकता है, न कि बच्चों द्वारा स्वतंत्र रूप से अभिभावकों की स्वतंत्र इच्छा को बाधित करना।

संसद से विधायी हस्तक्षेप की माँग

अदालत ने इस मुद्दे की व्यापकता को देखते हुए कहा कि यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है — क्या चुनाव प्रचार में बच्चों को शामिल करने पर रोक लगाई जानी चाहिए और क्या इसे चुनाव रद्द करने का आधार बनाया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि इस पर संसद को गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है, क्योंकि मौजूदा कानूनी ढाँचा इस तरह के आचरण को स्पष्ट रूप से परिभाषित या प्रतिबंधित नहीं करता।

फैसले का असर और आगे की राह

अदालत ने TVK विधायक के. शिवकुमार की अर्जी को स्वीकार कर लिया और उनकी जीत को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका खारिज कर दी। हालाँकि, न्यायालय की यह टिप्पणियाँ — जो कि तकनीकी रूप से ऑर्डर का हिस्सा हैं — भविष्य के मामलों और संभावित कानूनी बदलावों के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक संकेत के रूप में देखी जा रही हैं। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब डिजिटल प्रचार और सोशल मीडिया के उपयोग को लेकर देशभर में चुनाव आयोग और न्यायपालिका दोनों की सक्रियता बढ़ रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो एक स्पष्ट विधायी शून्य है। जब तक संसद इस पर कार्रवाई नहीं करती, ऐसे प्रचार तरीकों को केवल 'गलत चलन' कहने तक सीमित रहना न्यायिक जवाबदेही के लिहाज़ से अपर्याप्त है। राजनीतिक दलों की ओर से इस टिप्पणी पर चुप्पी भी उतनी ही ध्यान देने योग्य है जितना खुद यह फैसला।
RashtraPress
16 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मद्रास हाई कोर्ट ने TVK के प्रचार पर क्या टिप्पणी की?
मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि चुनाव प्रचार और सोशल मीडिया रील्स में बच्चों को शामिल करना राजनीतिक रूप से प्रेरित, गरिमा के विरुद्ध और 'खराब परवरिश' का संकेत है। न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती ने यह टिप्पणी TVK विधायक के. शिवकुमार की अर्जी पर सुनवाई के दौरान की।
TVK प्रचार में बच्चों के इस्तेमाल का आरोप क्या था?
याचिका में आरोप लगाया गया था कि TVK प्रमुख जोसेफ विजय ने बच्चों से सीधे अपील की थी कि वे अपने माता-पिता और दादा-दादी को TVK के चुनाव चिह्न 'सीटी' को वोट देने के लिए प्रेरित करें। इसके बाद सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में ऐसी रील्स वायरल हुईं।
क्या अदालत ने इसे 'अनुचित प्रभाव' माना?
नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि तकनीकी अर्थों में यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत 'अनुचित प्रभाव' नहीं माना जा सकता, क्योंकि रील्स घर के वयस्कों ने बनाई और प्रचारित कीं — बच्चों ने स्वतंत्र रूप से वयस्कों के निर्णय को प्रभावित नहीं किया।
सलेम नॉर्थ चुनाव याचिका का क्या हुआ?
मद्रास हाई कोर्ट ने TVK विधायक के. शिवकुमार की अर्जी स्वीकार करते हुए सलेम नॉर्थ विधानसभा क्षेत्र से उनकी जीत को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका खारिज कर दी।
क्या भविष्य में ऐसे प्रचार पर कानूनी रोक लग सकती है?
अदालत ने संसद से आग्रह किया है कि चुनाव प्रचार में बच्चों की भागीदारी को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करने और इसे चुनाव रद्द करने का आधार बनाने पर गंभीरता से विचार किया जाए। फिलहाल मौजूदा कानून में इस तरह की गतिविधियों पर कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है।
राष्ट्र प्रेस
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