उत्तराखंड मदरसा बोर्ड भंग: जदयू नेता बलियावी बोले — अल्पसंख्यक समुदाय में गहरी निराशा
सारांश
मुख्य बातें
जनता दल यूनाइटेड (जदयू) नेता गुलाम रसूल बलियावी ने उत्तराखंड मदरसा बोर्ड को भंग किए जाने के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। पटना में मंगलवार, 7 जुलाई को पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि यह निर्णय संविधान-प्रदत्त अधिकारों के विरुद्ध है और अल्पसंख्यक समुदाय में खुशी नहीं, बल्कि निराशा का माहौल है।
बलियावी का मुख्य तर्क
बलियावी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म के अनुसार जीवन जीने, उसका प्रचार-प्रसार करने और परंपराओं का निर्वहन करने का पूरा अधिकार देता है। उनके अनुसार, 'मदरसा बोर्ड को भंग करने की जगह अगर बहुसंख्यक समुदाय के लोगों को नौकरी दे दी होती, तो वो उनके लिए फायदेमंद होता।'
उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग यह मान रहे हैं कि इस फैसले से अल्पसंख्यक समुदाय प्रसन्न होगा, 'वो उनकी गलतफहमी है।' उनके मुताबिक, मदरसा बोर्ड का गठन धार्मिक शिक्षा के दायरे को व्यापक बनाने के उद्देश्य से किया गया था और इसे भंग करना किसी भी लिहाज से उचित नहीं है।
नीतीश कुमार के प्रयासों का उल्लेख
बलियावी ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में मदरसा शिक्षा को सुदृढ़ करने के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार ने मदरसा बोर्ड के दायरे को विस्तार देने और मदरसों में दी जाने वाली तालीम को सामान्य शिक्षा के समकक्ष लाने के लिए ठोस कदम उठाए, ताकि वहाँ से शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को रोज़गार के अवसर मिल सकें।
राष्ट्रीय संदर्भ और व्यापक असर
बलियावी ने कहा कि उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड को भंग किए जाने की घटना को 'पूरा देश देख रहा है।' यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में मदरसा शिक्षा की प्रासंगिकता और उसके विनियमन को लेकर बहस तेज़ हो रही है। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय भी मदरसा शिक्षा से जुड़े विभिन्न मामलों पर विचार कर चुका है।
जदयू नेता ने यह भी रेखांकित किया कि ऐसी स्थिति को 'किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।' उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब जदयू, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में सहयोगी है — जो इस बयान को राजनीतिक रूप से और भी महत्त्वपूर्ण बनाती है।
आगे की स्थिति
फिलहाल उत्तराखंड सरकार की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। अल्पसंख्यक समुदाय के संगठनों और विपक्षी दलों की ओर से इस फैसले के विरोध में और आवाज़ें उठने की संभावना है।