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उत्तरकाशी: मलबे में दबे प्राचीन कल्पकेदार मंदिर को बचाने के लिए धराली के ग्रामीणों ने शुरू की खुदाई

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उत्तरकाशी: मलबे में दबे प्राचीन कल्पकेदार मंदिर को बचाने के लिए धराली के ग्रामीणों ने शुरू की खुदाई

सारांश

धराली के ग्रामीणों ने नवरात्र के पहले दिन सोमेश्वर देवता की डोली की उपस्थिति में वह खुदाई शुरू की, जो सरकार के आश्वासन के बावजूद नहीं हुई। 5 अगस्त 2025 की खीर गंगा बाढ़ में दबा कल्पकेदार मंदिर सिर्फ आस्था नहीं — धराली की सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।

मुख्य बातें

उत्तरकाशी के धराली में 5 अगस्त 2025 की खीर गंगा बाढ़ में प्राचीन कल्पकेदार मंदिर मलबे में दब गया था।
शारदीय नवरात्र के पहले दिन सोमेश्वर देवता की देवडोली की उपस्थिति में हवन-पूजन के बाद खुदाई शुरू की गई।
एक्सकेवेटर मशीन से प्रतिदिन लगभग 8 घंटे खुदाई का कार्यक्रम; प्रतिदिन करीब ₹40 हजार खर्च का अनुमान।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, धराली में कभी लगभग 240 मंदिरों का समूह था, जिसमें कल्पकेदार प्रमुख था।
मंदिर समिति के अनुसार उत्तराखंड सरकार ने पहले खुदाई का आश्वासन दिया था, किंतु अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
ग्राम प्रधान अजय नेगी , समिति अध्यक्ष राजेश पंवार और महिला मंगल दल सहित ग्रामीणों की व्यापक भागीदारी।

उत्तरकाशी जिले के धराली में 5 अगस्त 2025 को खीर गंगा में आई विनाशकारी बाढ़ और मलबे के प्रवाह में पूरी तरह दब गए प्राचीन कल्पकेदार मंदिर को पुनः बाहर निकालने की दिशा में स्थानीय ग्रामीणों ने ठोस पहल की है। शारदीय नवरात्र के पहले दिन रविवार को मंदिर समिति और ग्रामीणों ने धार्मिक अनुष्ठान के साथ खुदाई कार्य शुरू करवाया, जो धराली की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को बचाने का प्रयास माना जा रहा है।

खुदाई का शुभारंभ और धार्मिक अनुष्ठान

प्राचीन कल्पकेदार मंदिर समिति और धराली के ग्रामीणों ने क्षेत्र के आराध्य सोमेश्वर देवता की डोली की उपस्थिति में हवन-पूजन और भूमि पूजन संपन्न किया। इसके पश्चात मंदिर को मलबे से बाहर निकालने के लिए खुदाई का कार्य विधिवत आरंभ करवाया गया। समिति अध्यक्ष राजेश पंवार और सचिव संजय पंवार के अनुसार, आपदा की पहली बरसी यानी 5 अगस्त 2026 को ग्रामीणों ने सोमेश्वर देवता से खुदाई की अनुमति माँगी थी, और नवरात्र के शुभ अवसर पर देवडोली की उपस्थिति में यह कार्य शुरू किया गया।

मंदिर का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, धराली क्षेत्र में कभी लगभग 240 मंदिरों का समूह हुआ करता था, जिनमें कल्पकेदार मंदिर का स्थान सर्वोच्च था। भगवान शिव को समर्पित यह प्राचीन मंदिर चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक पड़ाव रहा है। इससे जुड़ी पौराणिक कथाएं, ऐतिहासिक मान्यताएं और पीढ़ियों से चली आ रही जनश्रुतियाँ क्षेत्र के सामाजिक जीवन की अभिन्न पहचान रही हैं। हिमालयी शिव उपासना की यह परंपरा धराली की सांस्कृतिक आत्मा से जुड़ी है।

आपदा और उसके बाद की स्थिति

5 अगस्त 2025 को खीर गंगा में आई भीषण बाढ़ ने धराली में व्यापक तबाही मचाई थी। इस आपदा में भारी मात्रा में मलबा आने से कल्पकेदार मंदिर पूरी तरह दब गया। स्थानीय लोगों के अनुसार, मंदिर को पहले भी कई बार मलबे से नुकसान पहुँचा था, लेकिन हर बार ग्रामीणों के सामूहिक प्रयासों से इसे बाहर निकाला जाता रहा। इस बार मलबे की अत्यधिक मोटाई के कारण खुदाई कार्य असाधारण रूप से चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

सरकार का आश्वासन, लेकिन कार्रवाई नहीं

मंदिर समिति पदाधिकारियों के अनुसार, उत्तराखंड सरकार की ओर से पहले मंदिर को मलबे से बाहर निकालने का आश्वासन दिया गया था, किंतु उनके अनुसार अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो सकी। इसी कारण ग्रामीणों ने अपने स्तर पर पहल करते हुए खुदाई शुरू करने का निर्णय लिया। एक्सकेवेटर मशीन से प्रतिदिन लगभग आठ घंटे खुदाई किए जाने की योजना है, जिस पर प्रतिदिन करीब ₹40 हजार खर्च होने का अनुमान है।

सामुदायिक भागीदारी और आगे की उम्मीद

मंदिर समिति के कोषाध्यक्ष विपेंद्र पंवार, ग्राम प्रधान अजय नेगी, युवक मंगल दल के अध्यक्ष शुभम पंवार सहित महिला मंगल दल और कीर्तन मंडली के सदस्य इस पहल में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ग्रामीणों को उम्मीद है कि व्यवस्थित खुदाई के दौरान मंदिर की मूल संरचना, प्रवेश द्वार, शिवलिंग अथवा स्थापत्य से जुड़े अन्य अवशेष सामने आ सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अवशेषों का सुरक्षित निष्कर्षण सुनिश्चित करने के लिए पुरातत्व विशेषज्ञों की निगरानी भी आवश्यक होगी।

यह पहल धराली के इतिहास और धार्मिक विरासत को संजोने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है — अब सभी की निगाहें खुदाई के आगे बढ़ने और मंदिर के अवशेषों के सामने आने पर टिकी हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि आपदा-प्रभावित समुदायों की सरकारी वादों से बढ़ती निराशा की कहानी है — जब प्रदेश सरकार का आश्वासन एक साल बाद भी कागज़ पर ही रहे, तो ग्रामीण खुद ₹40 हजार प्रतिदिन जुटाकर खुदाई करते हैं। गौरतलब है कि उत्तराखंड में बाढ़-भूस्खलन से क्षतिग्रस्त धरोहरों के पुनरुद्धार की न कोई स्पष्ट नीति है, न कोई समयबद्ध तंत्र। कल्पकेदार मंदिर का मामला इस नीतिगत शून्य को उजागर करता है। पुरातत्व विशेषज्ञों की निगरानी के बिना की गई मशीनी खुदाई खुद अवशेषों को नुकसान पहुँचा सकती है — यह जोखिम भी उतना ही गंभीर है।
RashtraPress
13 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कल्पकेदार मंदिर कहाँ स्थित है और यह मलबे में कैसे दबा?
कल्पकेदार मंदिर उत्तरकाशी जिले के धराली में स्थित है। 5 अगस्त 2025 को खीर गंगा में आई विनाशकारी बाढ़ और भारी मलबे के प्रवाह से यह प्राचीन शिव मंदिर पूरी तरह दब गया था।
खुदाई कब और कैसे शुरू हुई?
शारदीय नवरात्र के पहले दिन रविवार को प्राचीन कल्पकेदार मंदिर समिति और ग्रामीणों ने सोमेश्वर देवता की डोली की उपस्थिति में हवन-पूजन और भूमि पूजन के बाद खुदाई शुरू करवाई। एक्सकेवेटर मशीन से प्रतिदिन लगभग आठ घंटे खुदाई की योजना है।
इस खुदाई पर कितना खर्च आएगा और पैसे कौन दे रहा है?
खुदाई पर प्रतिदिन करीब ₹40 हजार खर्च होने का अनुमान है। मंदिर समिति के अनुसार सरकार ने पहले मदद का आश्वासन दिया था, लेकिन अपेक्षित कदम नहीं उठाए जाने के बाद ग्रामीणों ने अपने स्तर पर यह पहल शुरू की है।
कल्पकेदार मंदिर का धार्मिक महत्व क्या है?
भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं का प्रमुख धार्मिक पड़ाव माना जाता रहा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार धराली में कभी लगभग 240 मंदिरों का समूह था और कल्पकेदार उनमें सर्वोच्च स्थान रखता था।
खुदाई में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?
मलबे की अत्यधिक मोटाई के कारण मंदिर की मूल संरचना तक सुरक्षित पहुँचना सबसे बड़ी चुनौती है। विशेषज्ञों के अनुसार, मशीनी खुदाई के दौरान शिवलिंग और स्थापत्य अवशेषों की सुरक्षा के लिए पुरातत्व विशेषज्ञों की निगरानी आवश्यक होगी।
राष्ट्र प्रेस
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