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वोटर लिस्ट विवाद: पूर्व जज करम चंद पुरी बोले — चुनाव आयोग जाएं, सड़क हंगामा देश की छवि खराब करता है

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वोटर लिस्ट विवाद: पूर्व जज करम चंद पुरी बोले — चुनाव आयोग जाएं, सड़क हंगामा देश की छवि खराब करता है

सारांश

42 सेवानिवृत्त जजों के खुले पत्र के बाद पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व जज करम चंद पुरी ने साफ कहा — मतदाता सूची से नाम हटने पर संवैधानिक रास्ता अपनाएं, सड़क हंगामा नहीं। उनके अनुसार 20 साल बाद सूची की सफाई ज़रूरी थी और वोट के अधिकार को राजनीतिक हथियार बनाना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

मुख्य बातें

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व जज करम चंद पुरी ने 9 अक्टूबर 2026 को वोटर लिस्ट विवाद पर बयान दिया।
42 सेवानिवृत्त ججों के खुले पत्र का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा — शिकायत हो तो चुनाव आयोग या अदालत जाएं, सड़क हंगामा नहीं।
मतदाता सूची में अंतिम बड़ा बदलाव 20 साल पहले हुआ था; मृत, स्थानांतरित और डुप्लीकेट एंट्री हटाना ज़रूरी था।
पूर्व जज के अनुसार अनुच्छेद 324 के तहत गठित चुनाव आयोग की शक्तियाँ सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से भी अधिक हैं।
उन्होंने भारत की 7.8 प्रतिशत विकास दर का उल्लेख करते हुए कहा कि विदेशी ताकतें भारत की प्रगति नहीं चाहतीं।
वोट के अधिकार को राजनीतिक हथियार बनाना मूल संवैधानिक भावना के विरुद्ध है — पूर्व जज पुरी।

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश करम चंद पुरी ने 9 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट किया कि यदि किसी मतदाता का नाम मतदाता सूची से हटाया गया है, तो उसे संवैधानिक रास्ता अपनाना चाहिए — भारत के चुनाव आयोग (ECI) या अदालत का दरवाज़ा खटखटाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सड़कों पर हंगामा करने से देश की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुँचता है। यह प्रतिक्रिया उन 42 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के खुले पत्र के संदर्भ में आई है, जिसमें चुनाव आयोग एवं संवैधानिक संस्थाओं को कमज़ोर करने की कथित कोशिशों पर चिंता जताई गई थी।

खुले पत्र की पृष्ठभूमि

42 सेवानिवृत्त जजों के एक समूह ने हाल ही में एक खुला पत्र जारी कर चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को कमज़ोर करने की कोशिशों के विरुद्ध चेतावनी दी। इसमें पूर्व जज और वरिष्ठ नौकरशाह भी शामिल थे। पत्र में यह रेखांकित किया गया कि मतदान का अधिकार लोकतंत्र की आत्मा है और इसे किसी भी परिस्थिति में छीना नहीं जाना चाहिए।

पूर्व जज पुरी ने इस पत्र का समर्थन करते हुए कहा, 'जिसे भी कोई समस्या है, या जिस भी वोटर का नाम लिस्ट से हटाया गया है, अगर वे सामने आते हैं, तो यह बहुत अच्छी बात है और उनकी शिकायत का समाधान किया जाना चाहिए। मेरी राय में, इसका इस्तेमाल राजनीतिक मकसद के लिए करना पूरी तरह से गलत है और इसे हतोत्साहित किया जाना चाहिए।'

चुनाव आयोग की संवैधानिक स्थिति

पूर्व जज पुरी ने अनुच्छेद 324 का हवाला देते हुए बताया कि चुनाव आयोग का गठन इसीलिए किया गया था ताकि चुनाव निष्पक्ष, स्वतंत्र और बिना किसी दबाव के संपन्न हों। उनके अनुसार, इस संस्था की शक्तियाँ सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से भी अधिक हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि किसी का वोट चोरी हुआ है तो संविधान के अनुसार पहला उपाय चुनाव आयोग में जाना है और दूसरा अदालत में। उनका कहना था कि अभी तक इनमें से कोई भी रास्ता नहीं अपनाया गया — इसके बजाय सड़कों पर हंगामे को प्राथमिकता दी जा रही है, जो उचित नहीं।

मतदाता सूची की सफाई क्यों जरूरी थी

पूर्व जज पुरी ने यह भी बताया कि मतदाता सूची में आखिरी बड़ा बदलाव 20 साल पहले हुआ था। इन दो दशकों में अनेक मतदाताओं की मृत्यु हो चुकी है, कुछ ने अपना निवास स्थान बदला है, डुप्लीकेट प्रविष्टियाँ जुड़ गईं और अन्य कारणों से नाम गलत तरीके से सूची में आ गए।

उनके अनुसार, ऐसे में सूची की सफाई न केवल आवश्यक थी, बल्कि लोकतंत्र की शुद्धता के लिए अनिवार्य भी थी। उन्होंने कहा कि मतदान के अधिकार को राजनीतिक हथियार बनाना मूल सांविधानिक भावना के विरुद्ध है।

देश की छवि और विदेशी ताकतों पर चिंता

पूर्व जज ने यह भी कहा कि भारत की 7.8 प्रतिशत विकास दर — जो उनके अनुसार वर्तमान में विश्व में सर्वाधिक है — को लेकर कुछ विदेशी ताकतें और पड़ोसी देश ईर्ष्या रखते हैं। उन्होंने पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ युवाओं को आगे कर सरकारें गिराई गईं।

हालाँकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका व्यक्तिगत मानना है कि भारत की युवा पीढ़ी — चाहे वह 'जेन जी' हो या 'जनरेशन अल्फा' — समझदार है और ऐसे प्रयासों में फँसने वाली नहीं। उन्होंने कहा कि जब संवैधानिक अधिकारियों के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल होता है, तो विदेशों में भारत की छवि को नुकसान पहुँचता है।

आगे की राह

पूर्व जज करम चंद पुरी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब मतदाता सूची से नाम हटने को लेकर राजनीतिक विवाद तेज़ हो रहा है। उनकी राय है कि लोकतंत्र को मज़बूत रखने के लिए संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा और उनके माध्यम से समस्याओं का समाधान ही सही रास्ता है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि मतदाता सूची से जुड़ी शिकायतों को लेकर चुनाव आयोग क्या कदम उठाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसमें एक अनुत्तरित सवाल भी छिपा है — यदि चुनाव आयोग की प्रक्रिया इतनी सुलभ और प्रभावशाली है, तो क्यों आम मतदाता वहाँ नहीं पहुँच पाता? 20 साल की देरी के बाद की गई सूची-सफाई आवश्यक हो सकती है, परंतु यह भी देखना होगा कि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता और शिकायत निवारण का तंत्र कितना सुदृढ़ था। विदेशी ताकतों पर दोष मढ़ना राष्ट्रीय चिंता का वैध बिंदु है, किंतु इससे घरेलू प्रशासनिक खामियों पर जवाबदेही की माँग कमज़ोर नहीं होनी चाहिए।
RashtraPress
10 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पूर्व जज करम चंद पुरी ने वोटर लिस्ट विवाद पर क्या कहा?
पूर्व जज करम चंद पुरी ने कहा कि यदि किसी मतदाता का नाम वोटर लिस्ट से हटाया गया है, तो उसे चुनाव आयोग या अदालत में जाना चाहिए। उनके अनुसार सड़कों पर हंगामा करने से विदेशों में देश की छवि खराब होती है और मतदान के अधिकार को राजनीतिक हथियार बनाना गलत है।
42 सेवानिवृत्त जजों के खुले पत्र में क्या था?
42 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के समूह ने एक खुला पत्र जारी कर चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को कमज़ोर करने की कथित कोशिशों के विरुद्ध चेतावनी दी। पत्र में मतदान के अधिकार की रक्षा को लोकतंत्र की बुनियाद बताया गया।
मतदाता सूची की सफाई क्यों की गई?
पूर्व जज पुरी के अनुसार मतदाता सूची में अंतिम बड़ा संशोधन 20 साल पहले हुआ था। इस अवधि में कई मतदाताओं की मृत्यु हो गई, कुछ ने निवास बदला और डुप्लीकेट एंट्रीज़ जुड़ गईं, इसलिए सूची की सफाई आवश्यक थी।
चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्तियाँ क्या हैं?
चुनाव आयोग का गठन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत हुआ है। पूर्व जज पुरी के अनुसार इसकी शक्तियाँ सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से भी अधिक हैं, और इसे इसीलिए बनाया गया ताकि चुनाव निष्पक्ष, स्वतंत्र और बिना किसी दबाव के हों।
अगर वोटर का नाम लिस्ट से हटे तो क्या करें?
पूर्व जज करम चंद पुरी के अनुसार पहला उपाय चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराना है और दूसरा उपाय अदालत में जाना है। उन्होंने कहा कि ये दोनों संवैधानिक रास्ते उपलब्ध हैं और इन्हें अपनाने की बजाय सड़क पर हंगामा करना लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है।
राष्ट्र प्रेस
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