9 अगस्त 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

बॉम्बे हाई कोर्ट ने भारती सिंह और शेखर सुमन की 2010 की एफआईआर रद्द की, 'या अल्लाह! रसगुल्ला!' मामले में मिली राहत

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
बॉम्बे हाई कोर्ट ने भारती सिंह और शेखर सुमन की 2010 की एफआईआर रद्द की, 'या अल्लाह! रसगुल्ला!' मामले में मिली राहत

सारांश

बॉम्बे हाई कोर्ट ने 14 साल पुराने उस मामले को खारिज कर दिया जिसमें 'या अल्लाह! रसगुल्ला!' जैसी तुकबंदी को धार्मिक भावनाएँ आहत करने का आधार बनाया गया था। अदालत ने साफ कहा — खाद्य पदार्थों का हास्यपूर्ण उल्लेख अपराध नहीं, और स्क्रिप्ट न लिखने वाले कलाकारों पर आपराधिक दायित्व थोपना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

मुख्य बातें

बॉम्बे हाई कोर्ट ने 1 मई 2026 को भारती सिंह और शेखर सुमन के खिलाफ 27 नवंबर 2010 की एफआईआर रद्द की।
एफआईआर भारतीय दंड संहिता की धारा 295-ए के साथ धारा 34 के तहत पायधोनी पुलिस स्टेशन, मुंबई में दर्ज की गई थी।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुधवार, 1 मई 2026 को कॉमेडियन भारती सिंह और अभिनेता शेखर सुमन को बड़ी राहत देते हुए पायधोनी पुलिस स्टेशन में 27 नवंबर 2010 को दर्ज एफआईआर को रद्द करने का आदेश दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हास्य-व्यंग्य और तुकबंदी के उद्देश्य से की गई टिप्पणियाँ किसी समुदाय की भावनाओं को जानबूझकर आहत करने की श्रेणी में नहीं आतीं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एक पारिवारिक मनोरंजन टेलीविज़न शो के दौरान कही गई उन पंक्तियों से जुड़ा है, जिनमें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारती सिंह और शेखर सुमन के खिलाफ एफआईआर क्यों दर्ज हुई थी?
एफआईआर एक पारिवारिक मनोरंजन टेलीविज़न शो में कही गई 'या अल्लाह! रसगुल्ला! दही भल्ला!' जैसी तुकबंदी को लेकर दर्ज की गई थी, जिसे शिकायतकर्ता ने धार्मिक भावनाएँ आहत करने वाला बताया था। यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 295-ए के तहत दर्ज किया गया था।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने एफआईआर रद्द क्यों की?
कोर्ट ने माना कि 'रसगुल्ला' और 'दही भल्ला' जैसे सामान्य खाद्य पदार्थों का हास्यपूर्ण उपयोग धार्मिक अपमान नहीं है, और याचिकाकर्ताओं ने वे संवाद लिखे भी नहीं थे। अदालत ने कहा कि ऐसे साक्ष्य के अभाव में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
यह मामला कितने साल पुराना था और किस धारा के तहत दर्ज था?
यह मामला 27 नवंबर 2010 को पायधोनी पुलिस स्टेशन, मुंबई में भारतीय दंड संहिता की धारा 295-ए के साथ धारा 34 के तहत दर्ज किया गया था — यानी यह करीब 14-15 साल पुराना मामला था।
कोर्ट ने कलाकारों की जिम्मेदारी के बारे में क्या कहा?
अदालत ने स्पष्ट किया कि मंच पर प्रदर्शन करने वाला कलाकार प्रायः निर्धारित स्क्रिप्ट के अनुसार ही काम करता है। उपलब्ध साक्ष्यों से यह नहीं दिखता कि याचिकाकर्ताओं ने वे संवाद लिखे थे, इसलिए उन पर आरोप प्रथम दृष्टया सिद्ध नहीं होते।
इस फैसले का कलाकारों पर क्या असर पड़ेगा?
यह फैसला एक महत्वपूर्ण मिसाल बनाता है जिसमें कोर्ट ने माना कि आपराधिक कानून का गलत इस्तेमाल कर कलाकारों को निशाना बनाना उचित नहीं है। हास्य और व्यंग्य में तुकबंदी या खाद्य पदार्थों के उल्लेख को स्वतः धार्मिक अपमान नहीं माना जा सकता।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 5 दिन पहले
  2. 1 महीना पहले
  3. 1 महीना पहले
  4. 3 महीने पहले
  5. 3 महीने पहले
  6. 3 महीने पहले
  7. 10 महीने पहले
  8. 1 साल पहले