क्या एंटीबायोटिक प्रतिरोध का बढ़ता खतरा इलाज की लागत को 2050 तक बढ़ा सकता है?
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली, 21 जुलाई (राष्ट्र प्रेस)। एक नई स्टडी के अनुसार, एंटीबायोटिक दवाओं का प्रभाव कम होने (एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस) के कारण न केवल मौतों की संख्या में वृद्धि हो सकती है, बल्कि इलाज की लागत भी वर्तमान 66 अरब डॉलर (लगभग 5.5 लाख करोड़ रुपये) प्रति वर्ष से बढ़कर 2050 तक 159 अरब डॉलर (लगभग 13.3 लाख करोड़ रुपये) प्रति वर्ष हो सकती है।
यह चेतावनी सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट के एक नए अध्ययन में दी गई है।
जब हम एंटीबायोटिक दवाओं का गलत या अत्यधिक उपयोग करते हैं, तब बैक्टीरिया उन दवाओं के विरुद्ध प्रतिरोधी हो जाते हैं। इन प्रतिरोधी बैक्टीरिया को सुपरबग्स कहा जाता है, जो सामान्य दवाओं पर असर नहीं होने देते। इससे अस्पतालों में भर्ती मरीजों की संख्या और इलाज की अवधि बढ़ जाती है, जिससे इलाज अधिक कठिन और महंगा हो जाता है।
अध्ययन के अनुसार, यह समस्या विशेष रूप से निम्न और मध्यम आय वाले देशों में अधिक गंभीर होगी, जहां संसाधन सीमित हैं।
इस अध्ययन में इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (आईएचएमई) के डेटा का उपयोग किया गया है, जिसमें अनुमान है कि 2050 तक एंटीबायोटिक प्रतिरोध के कारण होने वाली मौतें 60 फीसदी बढ़ सकती हैं। 2025 से 2050 के बीच 3.85 करोड़ लोग इसकी चपेट में आ सकते हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि प्रतिरोध की दर 1990 के बाद के रुझानों के समान रही, तो स्वास्थ्य खर्च का 1.2 फीसदी हिस्सा एंटीबायोटिक प्रतिरोध के उपचार पर खर्च होगा।
सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट के नीति फेलो एंथनी मैकडॉनेल के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने बताया, “एंटीबायोटिक प्रतिरोध का सबसे अधिक असर निम्न और मध्यम आय वाले देशों पर पड़ता है। यह स्वास्थ्य देखभाल की लागत को बढ़ाता है और वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।”
शोध में सुझाव दिया गया है कि नई और प्रभावी दवाओं के शोध को बढ़ावा दिया जाए, एंटीबायोटिक्स का सही उपयोग सुनिश्चित किया जाए और उच्च गुणवत्ता वाले इलाज तक पहुंच बढ़ाई जाए। यदि एंटीबायोटिक प्रतिरोध से होने वाली मौतें रोकी जाएं, तो 2050 तक दुनिया की आबादी 2.22 करोड़ ज्यादा होगी। यह अध्ययन सरकारों और स्वास्थ्य संगठनों के लिए तात्कालिक कदम उठाने की आवश्यकता को बताता है।