6 अगस्त 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

बेरीसेंटर का विज्ञान: ग्रह असल में किसके चारों ओर घूमते हैं? जानिए चौंकाने वाला सच

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
बेरीसेंटर का विज्ञान: ग्रह असल में किसके चारों ओर घूमते हैं? जानिए चौंकाने वाला सच

सारांश

बेरीसेंटर विज्ञान बताता है कि ग्रह और तारे एक साझा द्रव्यमान केंद्र के चारों ओर घूमते हैं। बृहस्पति की वजह से सूर्य भी डगमगाता है। इसी तकनीक से 5,000 से अधिक एक्सोप्लैनेट खोजे जा चुके हैं। यह अवधारणा ब्रह्मांड में जीवन की खोज का आधार बन रही है।

मुख्य बातें

बेरीसेंटर दो या अधिक खगोलीय पिंडों का साझा द्रव्यमान केंद्र होता है, जिसके चारों ओर सभी पिंड घूमते हैं।
सूर्य और पृथ्वी का बेरीसेंटर सूर्य के केंद्र के अत्यंत निकट है क्योंकि सूर्य का द्रव्यमान पृथ्वी से लगभग ३,३३,००० गुना अधिक है।
बृहस्पति के विशाल द्रव्यमान के कारण सूर्य और बृहस्पति का बेरीसेंटर सूर्य की सतह के बाहर स्थित हो सकता है।
पूरे सौरमंडल का सामूहिक बेरीसेंटर ग्रहों की स्थिति के अनुसार निरंतर बदलता रहता है।
तारों की डगमगाहट (Stellar Wobble) मापकर अब तक ५,००० से अधिक एक्सोप्लैनेट की खोज की जा चुकी है।
NASA के केप्लर और TESS मिशन तथा भविष्य में James Webb Space Telescope बेरीसेंटर आधारित तकनीक से जीवन योग्य ग्रहों की तलाश कर रहे हैं।

नई दिल्ली, 25 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। अंतरिक्ष विज्ञान की एक बेहद रोचक और महत्वपूर्ण अवधारणा — बेरीसेंटर — यह साबित करती है कि ग्रह किसी तारे का नहीं, बल्कि दोनों के बीच के एक साझा द्रव्यमान केंद्र (Center of Mass) का चक्कर लगाते हैं। यह वैज्ञानिक सत्य न केवल हमारे सौरमंडल को समझने में मदद करता है, बल्कि ब्रह्मांड में हजारों एक्सोप्लैनेट की खोज का आधार भी बन चुका है।

बेरीसेंटर क्या होता है

बेरीसेंटर किसी भी दो या अधिक खगोलीय पिंडों का संयुक्त द्रव्यमान केंद्र होता है। सरल शब्दों में, यह वह बिंदु है जहां सभी पिंडों का संयुक्त भार पूरी तरह संतुलित होता है। जैसे एक रूलर को उंगली पर संतुलित करने पर उसका द्रव्यमान केंद्र स्पष्ट हो जाता है, ठीक वैसे ही अंतरिक्ष में भी हर पिंड का अपना द्रव्यमान केंद्र होता है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि यह केंद्र हमेशा दो वस्तुओं के ठीक बीच में नहीं होता। जो पिंड जितना भारी होगा, बेरीसेंटर उसी की ओर उतना अधिक झुका होगा। यही सिद्धांत ब्रह्मांड की हर गुरुत्वाकर्षण प्रणाली में लागू होता है।

सूर्य-पृथ्वी और बृहस्पति का उदाहरण

सूर्य का द्रव्यमान पृथ्वी की तुलना में लगभग ३,३३,००० गुना अधिक है। इसलिए सूर्य और पृथ्वी का बेरीसेंटर सूर्य के केंद्र के अत्यंत निकट होता है। यही कारण है कि सामान्य दृष्टि से ऐसा प्रतीत होता है जैसे पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगा रही हो।

लेकिन बृहस्पति (Jupiter) की स्थिति बिल्कुल अलग और दिलचस्प है। बृहस्पति का द्रव्यमान इतना अधिक है कि सूर्य और बृहस्पति का बेरीसेंटर सूर्य की सतह से बाहर स्थित हो सकता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि सूर्य भी इस बिंदु के चारों ओर हल्का-सा डगमगाता रहता है।

पूरे सौरमंडल का सामूहिक बेरीसेंटर

हमारे सौरमंडल का भी एक सामूहिक बेरीसेंटर होता है जिसके चारों ओर सभी ग्रह और स्वयं सूर्य परिक्रमा करते हैं। यह बिंदु स्थायी नहीं है — ग्रहों की बदलती स्थिति के अनुसार यह निरंतर बदलता रहता है। कभी यह सूर्य के भीतर होता है तो कभी उसकी सतह के बाहर।

यह तथ्य इस बात को पुनः स्थापित करता है कि ब्रह्मांड में कोई भी पिंड किसी दूसरे पिंड का एकतरफा चक्कर नहीं लगाता — बल्कि दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हुए एक साझा केंद्र के चारों ओर गतिशील रहते हैं।

एक्सोप्लैनेट खोज में बेरीसेंटर की भूमिका

एक्सोप्लैनेट यानी सौरमंडल के बाहर के ग्रहों की खोज में बेरीसेंटर की अवधारणा सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध हुई है। दूर के तारों के इर्द-गिर्द मौजूद ग्रह सीधे दिखाई नहीं देते क्योंकि उनकी रोशनी अपने तारे की चमक में दब जाती है।

ऐसे में खगोलविद (Astronomers) उस तारे की सूक्ष्म डगमगाहट (Stellar Wobble) को मापते हैं। यह डगमगाहट इस बात का प्रमाण होती है कि तारे के समीप कोई ग्रह मौजूद है और दोनों एक साझा बेरीसेंटर के चारों ओर परिक्रमा कर रहे हैं। इसी रेडियल वेलोसिटी तकनीक की सहायता से अब तक ५,००० से अधिक एक्सोप्लैनेट की पुष्टि की जा चुकी है।

गौरतलब है कि NASA के केप्लर मिशन और TESS मिशन ने इसी सिद्धांत का उपयोग करते हुए ब्रह्मांड में जीवन की संभावना वाले ग्रहों की तलाश को नई दिशा दी है। भविष्य में James Webb Space Telescope इन एक्सोप्लैनेट के वायुमंडल का विश्लेषण करने में बेरीसेंटर आधारित डेटा का उपयोग करेगा।

बेरीसेंटर का व्यापक वैज्ञानिक महत्व

बेरीसेंटर की अवधारणा केवल ग्रहों और तारों तक सीमित नहीं है। द्विआधारी तारा प्रणालियों (Binary Star Systems), आकाशगंगाओं के विलय और यहां तक कि ब्लैक होल की गतिविधियों को समझने में भी यह सिद्धांत अनिवार्य है। अंतरिक्ष में कोई भी गुरुत्वाकर्षण से बंधी प्रणाली बेरीसेंटर के नियम का पालन करती है।

आने वाले वर्षों में जैसे-जैसे अंतरिक्ष अन्वेषण तकनीक उन्नत होगी, बेरीसेंटर आधारित गणनाएं हमें ब्रह्मांड के और अधिक रहस्यों से परिचित कराएंगी — विशेष रूप से उन ग्रहों की खोज में जो जीवन के अनुकूल परिस्थितियां रखते हों।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह उस बड़ी सोच का प्रतीक है जो हमें ब्रह्मांड को केंद्रवादी नजरिए से नहीं, बल्कि परस्पर निर्भरता की दृष्टि से देखना सिखाती है। दिलचस्प यह है कि जब NASA जैसी संस्थाएं अरबों डॉलर एक्सोप्लैनेट खोज पर खर्च कर रही हैं, तो उनकी सबसे बुनियादी तकनीक इसी सरल भौतिकी सिद्धांत पर टिकी है। भारत का ISRO भी अपने भविष्य के अंतरग्रहीय मिशनों में बेरीसेंटर गणनाओं का उपयोग करता है — यह दर्शाता है कि बुनियादी विज्ञान की समझ ही बड़ी छलांग का आधार बनती है। मुख्यधारा की कवरेज इस विषय को अक्सर सतही रखती है, जबकि यह अवधारणा जीवन की खोज से सीधे जुड़ी है।
RashtraPress
6 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बेरीसेंटर क्या होता है और यह कैसे काम करता है?
बेरीसेंटर दो या अधिक खगोलीय पिंडों का साझा द्रव्यमान केंद्र होता है जिसके चारों ओर सभी पिंड एक साथ घूमते हैं। यह बिंदु हमेशा भारी पिंड के अधिक निकट होता है।
क्या सूर्य भी किसी बिंदु के चारों ओर घूमता है?
हां, सूर्य भी पूरे सौरमंडल के सामूहिक बेरीसेंटर के चारों ओर हल्का-सा डगमगाता है। बृहस्पति के अत्यधिक द्रव्यमान के कारण यह बेरीसेंटर कभी-कभी सूर्य की सतह से बाहर भी चला जाता है।
एक्सोप्लैनेट खोजने में बेरीसेंटर कैसे मदद करता है?
वैज्ञानिक दूर के तारों की सूक्ष्म डगमगाहट को मापकर उनके पास मौजूद ग्रहों का पता लगाते हैं। यह डगमगाहट बेरीसेंटर के इर्द-गिर्द तारे की गति के कारण होती है और अब तक 5,000 से अधिक एक्सोप्लैनेट इसी तकनीक से खोजे गए हैं।
क्या पृथ्वी वाकई सूर्य का चक्कर नहीं लगाती?
तकनीकी रूप से पृथ्वी और सूर्य दोनों अपने साझा बेरीसेंटर के चारों ओर घूमते हैं। चूंकि सूर्य का द्रव्यमान बहुत अधिक है, यह बेरीसेंटर सूर्य के केंद्र के बेहद करीब होता है, इसलिए व्यावहारिक रूप से ऐसा लगता है कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगा रही है।
बेरीसेंटर और गुरुत्वाकर्षण में क्या संबंध है?
जब दो पिंड एक-दूसरे के गुरुत्वाकर्षण से बंधे होते हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से अपने साझा बेरीसेंटर के चारों ओर घूमने लगते हैं। गुरुत्वाकर्षण ही वह बल है जो इस साझा केंद्र की स्थिति और दोनों पिंडों की गति को निर्धारित करता है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 महीना पहले
  2. 2 महीने पहले
  3. 3 महीने पहले
  4. 4 महीने पहले
  5. 4 महीने पहले
  6. 4 महीने पहले
  7. 4 महीने पहले
  8. 4 महीने पहले