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भारतीय फार्मा उद्योग 2047 तक $450 अरब का लक्ष्य, गुजरात की होगी निर्णायक भूमिका: विशेषज्ञ

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भारतीय फार्मा उद्योग 2047 तक $450 अरब का लक्ष्य, गुजरात की होगी निर्णायक भूमिका: विशेषज्ञ

सारांश

भारत पहले ही दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा फार्मा उत्पादक बन चुका है — और सीआईआई फार्मा समिट 2026 में अहमदाबाद के विशेषज्ञों का दांव इससे कहीं बड़ा है। 2047 तक $450 अरब का लक्ष्य, गुजरात का 30% योगदान और अमेरिका की सप्लाई चेन में भारत की बढ़ती जगह — यह सिर्फ संख्याएं नहीं, एक रणनीतिक पुनर्गठन की तस्वीर है।

मुख्य बातें

विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय फार्मा उद्योग 2047 तक $450 अरब तक पहुँच सकता है, यदि वर्तमान विकास गति बनी रहे।
विरंची शाह ने कहा कि गुजरात देश के कुल फार्मा उत्पादन का करीब 30% हिस्सा उत्पन्न करता है।
भारतीय फार्मा उद्योग का आकार दो दशकों में $3 अरब से बढ़कर $20 अरब हो चुका है; उद्योग का लक्ष्य इसे 2047 तक $80 अरब तक ले जाना है।
भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा फार्मा उत्पादक देश बन चुका है और बायोसिमिलर्स व बायोफार्मास्युटिकल्स में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।
कोविड-19 के सबक का हवाला देते हुए विशेषज्ञों ने वैश्विक सप्लाई चेन में फार्मास्युटिकल्स को विशेष दर्जा देने और निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने पर बल दिया।
बल्क ड्रग पार्कों में ग्रीन केमिस्ट्री और वैश्विक पर्यावरण मानकों को अपनाने की दिशा में काम हो रहा है।

भारत का फार्मास्युटिकल उद्योग वर्ष 2047 तक 450 अरब डॉलर के आकार तक पहुँच सकता है — यह अनुमान सीआईआई फार्मा समिट 2026 में अहमदाबाद में जुटे उद्योग विशेषज्ञों ने 23 अक्टूबर 2026 को व्यक्त किया। विशेषज्ञों के अनुसार इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उद्योग, सरकार, नियामक संस्थाओं और शिक्षण जगत के बीच ठोस और निरंतर समन्वय अनिवार्य है।

गुजरात: देश की फार्मा राजधानी

इंडियन ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (IDMA) के अध्यक्ष डॉ. विरंची शाह ने कहा कि भारत को विश्व स्तर पर 'फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड' का दर्जा प्राप्त है और गुजरात इस पहचान की रीढ़ है। उनके अनुसार, देश के कुल फार्मास्युटिकल विनिर्माण का करीब 30 प्रतिशत हिस्सा अकेले गुजरात से आता है।

डॉ. शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार का उद्देश्य केवल उत्पादन की मात्रा में वैश्विक नेतृत्व बनाए रखना नहीं, बल्कि वैल्यू-एडेड उत्पादों और नवाचार के क्षेत्र में भी शीर्ष स्थान हासिल करना है। उन्होंने कहा, 'यदि वर्तमान गति बनी रहती है तो अमृतकाल के दौरान वर्ष 2047 तक भारतीय फार्मा उद्योग का आकार करीब 450 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है।'

दो दशकों में छह गुना विस्तार, आगे और बड़ी छलांग का लक्ष्य

मेटिओरिक बायोफार्मास्युटिकल्स की डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर पूनम जी. कौशिक ने बताया कि लगभग दो दशक पहले भारतीय फार्मा उद्योग का आकार मात्र 3 अरब डॉलर था, जो आज बढ़कर 20 अरब डॉलर के करीब पहुँच चुका है। उद्योग जगत का लक्ष्य इसे 2047 तक 80 अरब डॉलर के स्तर तक ले जाने का है।

यह ऐसे समय में आया है जब भारत पहले ही विश्व का तीसरा सबसे बड़ा फार्मा उत्पादक देश बन चुका है और बायोसिमिलर्स, बायोफार्मास्युटिकल्स तथा इनोवेटिव मेडिसिन के क्षेत्र में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। गुजरात में आयोजित यह पहला सीआईआई फार्मा समिट इस बात का स्पष्ट संकेत है कि राज्य अब परंपरागत मैन्युफैक्चरिंग से आगे बढ़कर बायोफार्मास्युटिकल्स में भी वैश्विक पहचान बनाना चाहता है।

भारत-अमेरिका सहयोग और वैश्विक आपूर्ति शृंखला

डॉ. शाह ने हालिया भारत-अमेरिका चर्चाओं का हवाला देते हुए कहा कि फार्मास्युटिकल उद्योग दोनों देशों की साझा रणनीतिक प्राथमिकताओं में महत्वपूर्ण स्थान ले रहा है। उनके अनुसार, अमेरिका की दवा आपूर्ति शृंखला का बड़ा हिस्सा भविष्य में भारत की ओर स्थानांतरित हो सकता है, जिससे भारतीय उद्योग को विस्तार का अवसर मिलेगा और अमेरिकी मरीजों को किफायती दवाएं उपलब्ध होंगी।

पूनम कौशिक ने कहा, 'कोविड-19 ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी स्थिति में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र और जरूरी दवाओं की आपूर्ति बाधित नहीं होनी चाहिए।' उन्होंने जोर देकर कहा कि महामारी, युद्ध और भू-राजनीतिक संकटों ने वैश्विक सप्लाई चेन की कमज़ोरियाँ उजागर की हैं और फार्मास्युटिकल्स को विशेष श्रेणी में रखकर उनकी निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी।

ग्रीन फार्मा और पर्यावरणीय जिम्मेदारी

डॉ. विरंची शाह ने उद्योग की एक और महत्वपूर्ण प्राथमिकता रेखांकित की — ग्रीन केमिस्ट्री और पर्यावरण संरक्षण। उन्होंने बताया कि देशभर में विकसित हो रहे बल्क ड्रग पार्कों में अपशिष्ट जल शोधन और प्रदूषण नियंत्रण के लिए वैश्विक मानक अपनाए जा रहे हैं।

डॉ. शाह ने कहा, 'फार्मा उद्योग केवल लोगों की जान बचाने का काम नहीं करता, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि वह पर्यावरण प्रदूषण की वैश्विक समस्या का हिस्सा न बने।' गौरतलब है कि फार्मास्युटिकल उत्पादन प्रक्रियाओं से जुड़ी पर्यावरणीय चिंताएं वैश्विक नियामकों की नज़र में लंबे समय से बनी हुई हैं।

एआई की भूमिका और भविष्य की दिशा

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के संभावित प्रभाव पर पूनम कौशिक ने सधी हुई राय रखी। उन्होंने कहा, 'एआई दवा विकास की प्रक्रिया को तेज और अधिक कुशल जरूर बना सकता है, लेकिन यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इसके कारण दवाओं की कीमतों में बड़ी कमी आएगी।'

उन्होंने माना कि दवा निर्माण में हज़ारों मानव-घंटे, विशाल संसाधन और क्लीनिकल ट्रायल की जटिल प्रक्रियाएं शामिल हैं। आने वाले वर्षों में अनुसंधान-आधारित विकास और एआई के साझा उपयोग से भारतीय फार्मा उद्योग नई वैश्विक ऊँचाइयों की ओर अग्रसर होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या भारत 'वॉल्यूम लीडर' से 'वैल्यू लीडर' की छलांग लगा पाएगा — जो दशकों से अधूरी महत्वाकांक्षा रही है। घरेलू एपीआई पर निर्भरता कम करना और मौलिक अनुसंधान में निवेश बढ़ाना अभी भी बड़ी चुनौती है। भारत-अमेरिका फार्मा साझेदारी की संभावना वास्तविक है, लेकिन यूएस एफडीए की सख्त नियामक जाँच और दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन की जटिलताएं इस रास्ते को सरल नहीं बनातीं। बिना मज़बूत अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र और स्वतंत्र नियामक सुधारों के, ये आँकड़े केवल सम्मेलन कक्षों की महत्वाकांक्षाएं बनकर न रह जाएं — यह सुनिश्चित करना नीति-निर्माताओं की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है।
RashtraPress
23 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारतीय फार्मा उद्योग का 2047 तक क्या लक्ष्य है?
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि वर्तमान विकास गति बनी रही तो भारतीय फार्मा उद्योग का आकार 2047 तक करीब 450 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है। उद्योग जगत का अपना लक्ष्य इसे 80 अरब डॉलर तक ले जाने का है, जबकि समग्र क्षेत्र के लिए 450 अरब डॉलर का अनुमान IDMA अध्यक्ष डॉ. विरंची शाह ने सीआईआई फार्मा समिट 2026 में प्रस्तुत किया।
गुजरात भारतीय फार्मा उद्योग में क्यों महत्वपूर्ण है?
गुजरात को देश की 'फार्मा राजधानी' माना जाता है क्योंकि देश के कुल फार्मास्युटिकल विनिर्माण का करीब 30 प्रतिशत हिस्सा अकेले इस राज्य से आता है। अहमदाबाद में आयोजित सीआईआई फार्मा समिट 2026 इस बात का संकेत है कि गुजरात अब परंपरागत मैन्युफैक्चरिंग से आगे बढ़कर बायोफार्मास्युटिकल्स में भी वैश्विक पहचान बनाना चाहता है।
भारतीय फार्मा उद्योग की मौजूदा स्थिति क्या है?
भारत वर्तमान में विश्व का तीसरा सबसे बड़ा फार्मा उत्पादक देश है। उद्योग का आकार दो दशकों में 3 अरब डॉलर से बढ़कर करीब 20 अरब डॉलर हो चुका है और देश बायोसिमिलर्स, बायोफार्मास्युटिकल्स तथा इनोवेटिव मेडिसिन के क्षेत्र में तेज़ी से प्रगति कर रहा है।
वैश्विक दवा आपूर्ति शृंखला में भारत की क्या भूमिका होगी?
विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका की दवा आपूर्ति शृंखला का बड़ा हिस्सा भविष्य में भारत की ओर स्थानांतरित हो सकता है। कोविड-19 और भू-राजनीतिक संकटों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जीवनरक्षक दवाओं की आपूर्ति हर हाल में सुनिश्चित होनी चाहिए और फार्मास्युटिकल्स को सप्लाई चेन में विशेष दर्जा मिलना चाहिए।
फार्मा उद्योग में एआई की भूमिका कितनी प्रभावी होगी?
मेटिओरिक बायोफार्मास्युटिकल्स की डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर पूनम जी. कौशिक के अनुसार, एआई दवा विकास की प्रक्रिया को तेज़ और अधिक कुशल बना सकता है, लेकिन इससे दवाओं की कीमतों में बड़ी कमी आएगी — यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। आने वाले वर्षों में इसका वास्तविक प्रभाव स्पष्ट होगा।
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