भारतीय फार्मा उद्योग 2047 तक $450 अरब का लक्ष्य, गुजरात की होगी निर्णायक भूमिका: विशेषज्ञ
सारांश
मुख्य बातें
भारत का फार्मास्युटिकल उद्योग वर्ष 2047 तक 450 अरब डॉलर के आकार तक पहुँच सकता है — यह अनुमान सीआईआई फार्मा समिट 2026 में अहमदाबाद में जुटे उद्योग विशेषज्ञों ने 23 अक्टूबर 2026 को व्यक्त किया। विशेषज्ञों के अनुसार इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उद्योग, सरकार, नियामक संस्थाओं और शिक्षण जगत के बीच ठोस और निरंतर समन्वय अनिवार्य है।
गुजरात: देश की फार्मा राजधानी
इंडियन ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (IDMA) के अध्यक्ष डॉ. विरंची शाह ने कहा कि भारत को विश्व स्तर पर 'फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड' का दर्जा प्राप्त है और गुजरात इस पहचान की रीढ़ है। उनके अनुसार, देश के कुल फार्मास्युटिकल विनिर्माण का करीब 30 प्रतिशत हिस्सा अकेले गुजरात से आता है।
डॉ. शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार का उद्देश्य केवल उत्पादन की मात्रा में वैश्विक नेतृत्व बनाए रखना नहीं, बल्कि वैल्यू-एडेड उत्पादों और नवाचार के क्षेत्र में भी शीर्ष स्थान हासिल करना है। उन्होंने कहा, 'यदि वर्तमान गति बनी रहती है तो अमृतकाल के दौरान वर्ष 2047 तक भारतीय फार्मा उद्योग का आकार करीब 450 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है।'
दो दशकों में छह गुना विस्तार, आगे और बड़ी छलांग का लक्ष्य
मेटिओरिक बायोफार्मास्युटिकल्स की डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर पूनम जी. कौशिक ने बताया कि लगभग दो दशक पहले भारतीय फार्मा उद्योग का आकार मात्र 3 अरब डॉलर था, जो आज बढ़कर 20 अरब डॉलर के करीब पहुँच चुका है। उद्योग जगत का लक्ष्य इसे 2047 तक 80 अरब डॉलर के स्तर तक ले जाने का है।
यह ऐसे समय में आया है जब भारत पहले ही विश्व का तीसरा सबसे बड़ा फार्मा उत्पादक देश बन चुका है और बायोसिमिलर्स, बायोफार्मास्युटिकल्स तथा इनोवेटिव मेडिसिन के क्षेत्र में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। गुजरात में आयोजित यह पहला सीआईआई फार्मा समिट इस बात का स्पष्ट संकेत है कि राज्य अब परंपरागत मैन्युफैक्चरिंग से आगे बढ़कर बायोफार्मास्युटिकल्स में भी वैश्विक पहचान बनाना चाहता है।
भारत-अमेरिका सहयोग और वैश्विक आपूर्ति शृंखला
डॉ. शाह ने हालिया भारत-अमेरिका चर्चाओं का हवाला देते हुए कहा कि फार्मास्युटिकल उद्योग दोनों देशों की साझा रणनीतिक प्राथमिकताओं में महत्वपूर्ण स्थान ले रहा है। उनके अनुसार, अमेरिका की दवा आपूर्ति शृंखला का बड़ा हिस्सा भविष्य में भारत की ओर स्थानांतरित हो सकता है, जिससे भारतीय उद्योग को विस्तार का अवसर मिलेगा और अमेरिकी मरीजों को किफायती दवाएं उपलब्ध होंगी।
पूनम कौशिक ने कहा, 'कोविड-19 ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी स्थिति में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र और जरूरी दवाओं की आपूर्ति बाधित नहीं होनी चाहिए।' उन्होंने जोर देकर कहा कि महामारी, युद्ध और भू-राजनीतिक संकटों ने वैश्विक सप्लाई चेन की कमज़ोरियाँ उजागर की हैं और फार्मास्युटिकल्स को विशेष श्रेणी में रखकर उनकी निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी।
ग्रीन फार्मा और पर्यावरणीय जिम्मेदारी
डॉ. विरंची शाह ने उद्योग की एक और महत्वपूर्ण प्राथमिकता रेखांकित की — ग्रीन केमिस्ट्री और पर्यावरण संरक्षण। उन्होंने बताया कि देशभर में विकसित हो रहे बल्क ड्रग पार्कों में अपशिष्ट जल शोधन और प्रदूषण नियंत्रण के लिए वैश्विक मानक अपनाए जा रहे हैं।
डॉ. शाह ने कहा, 'फार्मा उद्योग केवल लोगों की जान बचाने का काम नहीं करता, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि वह पर्यावरण प्रदूषण की वैश्विक समस्या का हिस्सा न बने।' गौरतलब है कि फार्मास्युटिकल उत्पादन प्रक्रियाओं से जुड़ी पर्यावरणीय चिंताएं वैश्विक नियामकों की नज़र में लंबे समय से बनी हुई हैं।
एआई की भूमिका और भविष्य की दिशा
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के संभावित प्रभाव पर पूनम कौशिक ने सधी हुई राय रखी। उन्होंने कहा, 'एआई दवा विकास की प्रक्रिया को तेज और अधिक कुशल जरूर बना सकता है, लेकिन यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इसके कारण दवाओं की कीमतों में बड़ी कमी आएगी।'
उन्होंने माना कि दवा निर्माण में हज़ारों मानव-घंटे, विशाल संसाधन और क्लीनिकल ट्रायल की जटिल प्रक्रियाएं शामिल हैं। आने वाले वर्षों में अनुसंधान-आधारित विकास और एआई के साझा उपयोग से भारतीय फार्मा उद्योग नई वैश्विक ऊँचाइयों की ओर अग्रसर होगा।