UNSC सुधार पर चीन का रुख: विकसित देशों का प्रतिनिधित्व अधिशेष खत्म हो — फु त्सोंग
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र में चीन के स्थाई प्रतिनिधि फु त्सोंग ने 22 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में सुरक्षा परिषद सुधार पर अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि इस सुधार का अंतिम लक्ष्य विकसित देशों के प्रतिनिधित्व अधिशेष की मौजूदा स्थिति को बदलना होना चाहिए। उन्होंने जोर दिया कि विकासशील देशों को परिषद में उनकी आबादी और वैश्विक भूमिका के अनुरूप उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
चीन का मूल रुख
फु त्सोंग ने कहा कि चीन सुरक्षा परिषद में 'ज़रूरी और जायज़ सुधारों' का समर्थन करता है, जिनसे परिषद की प्रतिष्ठा और कार्यकुशलता में वृद्धि हो। उनके अनुसार, ऐसे सुधार परिषद को वैश्विक संकटों और चुनौतियों का बेहतर ढंग से सामना करने और संयुक्त राष्ट्र चार्टर में निर्धारित दायित्वों को प्रभावी रूप से निभाने में सक्षम बनाएँगे।
उन्होंने तीन प्रमुख सिद्धांत रेखांकित किए — विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व और अभिव्यक्ति अधिकार बढ़ाना, सदस्य देशों की सहमति का सम्मान करते हुए 'पैकेज समाधान' पर टिके रहना, और अंतर-सरकार वार्ता को सुधार प्रक्रिया का मुख्य माध्यम बनाए रखना।
वैश्विक शासन में सुधार की माँग
फु त्सोंग ने कहा कि चीन सभी पक्षों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करने के प्रयास जारी रखेगा कि सुरक्षा परिषद का सुधार समस्त सदस्य देशों के साझा हितों के अनुरूप हो। उनके बयान के अनुसार, इस प्रक्रिया का लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र के स्वस्थ विकास को सुनिश्चित करना और 'अधिक निष्पक्ष व युक्तियुक्त वैश्विक शासन व्यवस्था' के निर्माण में योगदान देना है।
यह ऐसे समय में आया है जब UNSC सुधार पर बहस एक बार फिर तेज़ हो गई है। भारत, ब्राज़ील, जर्मनी और जापान सहित 'G4' देश स्थाई सदस्यता के लिए दशकों से प्रयासरत हैं, और अफ्रीकी देश भी महाद्वीप को स्थाई प्रतिनिधित्व दिलाने की माँग करते रहे हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ
गौरतलब है कि सुरक्षा परिषद की संरचना 1945 में स्थापित हुई थी और तब से इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। पाँच स्थाई सदस्य — अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन — के पास वीटो का अधिकार है, जबकि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और घनी आबादी वाले देशों को स्थाई सीट नहीं मिली है। आलोचकों का कहना है कि मौजूदा ढाँचा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को दर्शाता है, न कि आज की दुनिया को।
आगे की राह
चीन के इस बयान को वैश्विक दक्षिण (Global South) की आकांक्षाओं के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। हालाँकि, विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सुधार के लिए सुरक्षा परिषद के सभी पाँच स्थाई सदस्यों की सहमति और दो-तिहाई महासभा समर्थन की ज़रूरत होगी, जो इस प्रक्रिया को कठिन बनाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में यह बहस अगले कई सत्रों तक जारी रहने की संभावना है।