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आशिमा अहलावत: 12वीं में 98.6% अंक की शर्त से आइची-नागोया एशियन गेम्स 2026 तक का सफर

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आशिमा अहलावत: 12वीं में 98.6% अंक की शर्त से आइची-नागोया एशियन गेम्स 2026 तक का सफर

सारांश

12वीं में 98.6% की शर्त, 8 महीने की एम्युनिशन की जद्दोजहद, माँ का रोहतक से दिल्ली का सफर — आशिमा अहलावत की कहानी सिर्फ एक निशानेबाज की नहीं, एक पूरे परिवार के समर्पण की है। अब वह आइची-नागोया 2026 एशियन गेम्स में अपना पहला अंतरराष्ट्रीय बड़ा मंच पाने को तैयार हैं।

मुख्य बातें

आशिमा अहलावत ( 22 वर्ष , रोहतक) आइची-नागोया एशियन गेम्स 2026 में शॉटगन इवेंट में डेब्यू करेंगी।
उन्होंने 18 साल की उम्र में 12वीं बोर्ड परीक्षा में 98.6% अंक हासिल किए — यह घरेलू शर्त थी निशानेबाजी के करियर के लिए।
पहली शॉटगन और एम्युनिशन जुटाने में लगभग 8 महीने लगे, लेकिन हौसले पर असर नहीं पड़ा।
वर्ल्ड चैंपियनशिप 2024 में चौथे स्थान पर रहने के बाद वर्ल्ड यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल और पर्सनल बेस्ट स्कोर दर्ज किया।
माँ ने बेटी की ट्रेनिंग के लिए रोहतक से नई दिल्ली शिफ्ट किया और पारिवारिक व्यवसाय भी वहाँ स्थानांतरित किया।
आशिमा ने एनआरएआई कैंप के पिछले दो वर्षों के अनुभव को अपनी तेज़ प्रगति का मुख्य कारण बताया।

रोहतक की आशिमा अहलावत का आइची-नागोया एशियन गेम्स 2026 तक का सफर एक घरेलू शर्त से शुरू हुआ — पहले पढ़ाई में उत्कृष्टता साबित करो, तब निशानेबाजी को करियर बनाने की आज़ादी मिलेगी। 18 साल की उम्र में आशिमा ने 12वीं बोर्ड परीक्षा में 98.6 प्रतिशत अंक हासिल कर यह वादा पूरा किया। अब 22 वर्षीय यह शॉटगन निशानेबाज जापान में अपने पहले एशियन गेम्स में डेब्यू के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

प्रेरणा और शुरुआत

आशिमा की निशानेबाजी की यात्रा कॉमनवेल्थ गेम्स 2018 के दौरान जागी — जब उन्होंने मनु भाकर और हीना सिद्धू को अंतरराष्ट्रीय मंच पर चमकते देखा। आशिमा ने उस पल को याद करते हुए कहा, 'उस मंच पर मनु भाकर और हीना सिद्धू को देखकर मुझे याद है कि मैंने सोचा था — मैं भी कभी वैसा ही महसूस करना चाहती हूँ।' शुरुआत में उन्होंने पिस्टल शूटिंग चुनी, लेकिन बाद में शॉटगन इवेंट्स की ओर रुख किया, जो उनकी असली पहचान बनी।

परिवार का त्याग और संसाधनों की चुनौती

कंस्ट्रक्शन व्यवसाय से जुड़े परिवार से आने वाली आशिमा के लिए यह राह आसान नहीं थी। उनकी माँ ने बेटी की ट्रेनिंग के लिए रोहतक छोड़कर नई दिल्ली आने और पारिवारिक व्यवसाय वहाँ स्थानांतरित करने का कठिन निर्णय लिया। आशिमा ने भावुक होकर कहा, 'माँ ने मुझे सिर्फ इजाज़त ही नहीं दी, बल्कि इसके लिए बहुत कुछ त्याग भी किया। मैं इस बात को हल्के में नहीं लेती।' अपनी पहली शॉटगन और एम्युनिशन जुटाने में उन्हें लगभग 8 महीने लग गए, फिर भी उनका हौसला कभी नहीं टूटा।

मुश्किलों से वापसी और अहम उपलब्धियाँ

वर्ल्ड चैंपियनशिप 2024 में आखिरी टारगेट पर एक चूक के कारण वह चौथे स्थान पर रह गईं — पोडियम से ठीक एक कदम दूर। लेकिन कुछ ही हफ्तों बाद दिल्ली में वर्ल्ड यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल जीता और अपना पर्सनल बेस्ट स्कोर भी दर्ज किया। आशिमा का मानना है, 'सिर्फ मेडल ही यह नहीं बताता कि आप कितनी दूर आ गए हैं। अगर कुछ ठीक नहीं होता, तो मैं गलती ढूँढ़ती हूँ, उसे सुधारती हूँ और और मज़बूती से वापसी करती हूँ।'

एनआरएआई की भूमिका

आशिमा अपनी तरक्की का बड़ा श्रेय नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एनआरएआई) को देती हैं। उन्होंने कहा, 'एनआरएआई ने मुझ जैसे शूटर्स के लिए चीज़ें बहुत आसान बना दी हैं — कैंप, कॉम्पिटिशन और यहाँ तक कि एम्युनिशन की लगातार उपलब्धता जैसी बुनियादी चीज़ें भी। पिछले दो वर्षों में एनआरएआई कैंप से मुझे जो अनुभव मिला है, मुझे नहीं लगता कि उसके बिना मैं इतनी तेज़ी से आगे बढ़ पाती।'

मानसिक दृढ़ता और एशियन गेम्स की तैयारी

निशानेबाजी जैसे एकाग्रता-प्रधान खेल में मानसिक स्थिरता बनाए रखने के लिए आशिमा ने अपना एक अनूठा तरीका विकसित किया है — शूटिंग स्टेशन पर पहुँचने से पहले वह साँस लेने की प्रक्रिया पर ध्यान देती हैं और मन में कोई गाना लूप पर चलाती हैं। उन्होंने कहा, 'यह उस पल में शांत और सुरक्षित महसूस करने का मेरा तरीका है।' आइची-नागोया 2026 में उनका लक्ष्य स्पष्ट है — एक-एक टारगेट पर फोकस करना, और आगे चलकर ओलंपिक कोटा हासिल कर ओलंपिक में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देना।

संपादकीय दृष्टिकोण

संसाधन तक पहुँच ही असली बाधा है। पहली शॉटगन के लिए 8 महीने की प्रतीक्षा और माँ का पूरा जीवन दाँव पर लगाना बताता है कि भारतीय शूटिंग का बुनियादी ढाँचा अभी भी शहरी और संपन्न तबके के पक्ष में झुका है। एनआरएआई की सराहना जायज़ है, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी व्यवस्था कितनी 'आशिमाओं' तक पहुँच पा रही है जो रोहतक से नहीं, बल्कि उससे भी छोटे शहरों और गाँवों से आती हैं। एशियन गेम्स डेब्यू एक मील का पत्थर है, लेकिन ओलंपिक कोटा और पोडियम फिनिश ही यह तय करेगा कि यह यात्रा महज़ प्रेरणादायी कहानी से आगे जाती है या नहीं।
RashtraPress
16 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आशिमा अहलावत कौन हैं और वह किस खेल में हिस्सा लेती हैं?
आशिमा अहलावत रोहतक, हरियाणा की 22 वर्षीय भारतीय निशानेबाज हैं, जो शॉटगन इवेंट्स में प्रतिस्पर्धा करती हैं। वह आइची-नागोया 2026 एशियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली हैं।
आशिमा अहलावत की एशियन गेम्स तक की यात्रा कैसी रही?
आशिमा की यात्रा एक घरेलू शर्त से शुरू हुई — 12वीं में 98.6% लाओ, तब निशानेबाजी में करियर बनाने की आज़ादी मिलेगी। उन्होंने यह शर्त पूरी की, पहली शॉटगन जुटाने में 8 महीने लगाए, और वर्ल्ड यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल जीतने के बाद एशियन गेम्स तक पहुँचीं।
वर्ल्ड चैंपियनशिप 2024 में आशिमा का प्रदर्शन कैसा रहा?
वर्ल्ड चैंपियनशिप 2024 में आशिमा आखिरी टारगेट पर एक चूक के कारण चौथे स्थान पर रहीं। हालाँकि, कुछ हफ्तों बाद दिल्ली में वर्ल्ड यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल जीता और अपना पर्सनल बेस्ट स्कोर दर्ज किया।
आशिमा अहलावत की माँ ने उनके करियर के लिए क्या त्याग किया?
आशिमा की माँ ने बेटी की ट्रेनिंग के लिए रोहतक छोड़कर नई दिल्ली शिफ्ट किया और पारिवारिक व्यवसाय भी वहाँ स्थानांतरित कर लिया। आशिमा ने खुद कहा कि माँ के इस त्याग को वह कभी हल्के में नहीं लेतीं।
एशियन गेम्स 2026 में आशिमा का क्या लक्ष्य है?
आशिमा ने कहा कि उनका फोकस एक-एक टारगेट पर रहेगा, न कि मेडल की चिंता पर। आगे चलकर उनका सपना ओलंपिक कोटा हासिल करना और ओलंपिक में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देना है।
राष्ट्र प्रेस
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