क्या चुन्नी गोस्वामी भारत के महान खिलाड़ियों में से एक हैं जिन्होंने क्रिकेट में भी कमाल किया?

Click to start listening
क्या चुन्नी गोस्वामी भारत के महान खिलाड़ियों में से एक हैं जिन्होंने क्रिकेट में भी कमाल किया?

सारांश

चुन्नी गोस्वामी, भारतीय फुटबॉल के एक दिग्गज, जिन्होंने एशियन गेम्स 1962 में गोल्ड मेडल दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फुटबॉल से संन्यास के बाद, उन्होंने क्रिकेट में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। जानिए उनके अद्भुत सफर के बारे में।

Key Takeaways

  • चुन्नी गोस्वामी का एशियन गेम्स 1962 में गोल्ड मेडल जीतना भारतीय फुटबॉल का एक महत्वपूर्ण क्षण था।
  • उन्होंने फुटबॉल के बाद क्रिकेट में भी अपनी प्रतिभा दिखाई।
  • उनका करियर मोहन बागान के साथ जुड़ा रहा, जहाँ उन्होंने कई उपलब्धियाँ हासिल कीं।

नई दिल्ली, 14 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। चुन्नी गोस्वामी भारतीय फुटबॉल के सबसे महान खिलाड़ियों में से एक माने जाते हैं, जिन्होंने एशियन गेम्स 1962 में अपने देश को गोल्ड मेडल दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अपनी अद्भुत ड्रिब्लिंग और नेतृत्व क्षमता के लिए प्रसिद्ध गोस्वामी ने फुटबॉल के बाद प्रथम श्रेणी क्रिकेट में भी अपनी छाप छोड़ी।

15 जनवरी 1938 को किशोरगंज में जन्मे सुबिमल गोस्वामी उच्च मध्यम वर्गीय परिवार से थे, जिन्होंने अपने करियर में केवल एक ही क्लब 'मोहन बागान' का प्रतिनिधित्व किया। हालांकि, उन्हें अन्य क्लबों से भी प्रस्ताव मिले, लेकिन मोहन बागान के प्रति उनका लगाव अद्वितीय था।

1956 से 1964 तक गोस्वामी ने एक फुटबॉलर के रूप में भारत के लिए 50 मैच खेले। 1962 में उनकी कप्तानी में भारत ने एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीता, और 1964 में मर्डेका कप में सिल्वर मेडल अपने नाम किया।

गोस्वामी ने 1946 में केवल 8 वर्ष की आयु में मोहन बागान क्लब की जूनियर टीम में शामिल होकर अपने करियर की शुरुआत की, और 1954 तक इसी का हिस्सा बने रहे। 1954 में, वह मोहन बागान की सीनियर टीम में शामिल हुए। 1960 से 1964 तक उन्होंने 5 सत्रों के लिए कप्तान के रूप में कार्य किया और स्ट्राइकर के रूप में 1968 में रिटायरमेंट तक खेलते रहे। चुन्नी गोस्वामी को न केवल फुटबॉल, बल्कि क्रिकेट का भी शौक था। उन्होंने मोहन बागान के लिए क्लब क्रिकेट भी खेला।

30 वर्ष की आयु में फुटबॉल को अलविदा कहने के बाद, चुन्नी गोस्वामी ने क्रिकेट में अपनी प्रतिभा को उजागर किया। उन्होंने 1972 में रणजी ट्रॉफी में बंगाल को फाइनल तक पहुंचाया।

चुन्नी गोस्वामी ने 1967 में गैरी सोबर्स की वेस्टइंडीज टीम के खिलाफ एक प्रैक्टिस मैच में 8 विकेट लिए थे। इस मैच में उन्होंने 25 गज तक दौड़ते हुए एक शानदार कैच लिया, जिसके बाद खुद सोबर्स ने उनकी प्रशंसा की। इस पर गोस्वामी ने मजाक में कहा, "सोबर्स को नहीं पता था कि मैं एक अंतरराष्ट्रीय फुटबॉलर था। मेरे लिए 25 गज दौड़ना कोई कठिनाई नहीं है।"

चुन्नी गोस्वामी ने 1962/63 से 1972/73 तक 46 फर्स्ट क्लास मैच खेले, जिसमें उन्होंने 28.42 की औसत से 1,592 रन बनाए। इस दौरान उनके नाम 1 शतक और 7 अर्धशतक भी थे। इसके अलावा, उन्होंने 47 विकेट भी लिए।

बेजोड़ खेल के लिए गोस्वामी को 1962 में एशिया के सर्वश्रेष्ठ स्ट्राइकर का पुरस्कार मिला, इसके बाद 1963 में 'अर्जुन अवार्ड' और 1983 में 'पद्म श्री अवार्ड' से सम्मानित किया गया। 2005 में उन्हें 'मोहन बागान रत्न' से नवाजा गया। 30 अप्रैल 2020 को इस महान खिलाड़ी ने 82 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कहा।

Point of View

जो हमें यह सिखाता है कि खेल में समर्पण और मेहनत से हम किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। उनका योगदान न केवल फुटबॉल में, बल्कि क्रिकेट में भी अद्वितीय है। यह उनके जैसे खिलाड़ियों के प्रयासों से ही है कि भारतीय खेल जगत को वैश्विक पहचान मिलती है।
NationPress
14/01/2026

Frequently Asked Questions

चुन्नी गोस्वामी ने कितने फुटबॉल मैच खेले?
चुन्नी गोस्वामी ने 1956 से 1964 तक भारत के लिए 50 फुटबॉल मैच खेले।
उन्होंने कब क्रिकेट में पदार्पण किया?
चुन्नी गोस्वामी ने फुटबॉल से संन्यास के बाद क्रिकेट में कदम रखा और 1972 में रणजी ट्रॉफी में बंगाल का नेतृत्व किया।
उन्हें कौन-कौन से पुरस्कार मिले?
उन्हें 1962 में एशिया का बेस्ट स्ट्राइकर, 1963 में अर्जुन पुरस्कार, और 1983 में पद्म श्री पुरस्कार मिला।
Nation Press