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कॉमनवेल्थ गेम्स की नींव: एक कनाडाई स्पोर्ट्स राइटर के सपने से बना राष्ट्रमंडल का महाकुंभ

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कॉमनवेल्थ गेम्स की नींव: एक कनाडाई स्पोर्ट्स राइटर के सपने से बना राष्ट्रमंडल का महाकुंभ

सारांश

एक कनाडाई स्पोर्ट्स पत्रकार का 1928 ओलंपिक से लौटने के बाद आया विचार 1930 में हैमिल्टन में 'ब्रिटिश एम्पायर गेम्स' बन गया — और आज वही कॉमनवेल्थ गेम्स है। भारत ने 1934 में डेब्यू किया, राशिद अनवर ने पहला पदक जीता और मिल्खा सिंह ने 1958 में पहला गोल्ड।

मुख्य बातें

कनाडाई पत्रकार मेल्विल मार्क्स रॉबिन्सन के विचार से 1930 में हैमिल्टन, कनाडा में पहली बार 'ब्रिटिश एम्पायर गेम्स' का आयोजन हुआ; 11 देशों के करीब 400 एथलीट शामिल हुए।
पहले संस्करण में 8 खेलों के 59 इवेंट थे; महिलाओं के लिए केवल तैराकी का इवेंट रखा गया।
भारत ने 1934 में कॉमनवेल्थ गेम्स में डेब्यू किया; पहलवान राशिद अनवर ने 74 किग्रा फ्रीस्टाइल कुश्ती में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर पहले भारतीय पदक विजेता बने।
मिल्खा सिंह ने 1958 में 440 यार्ड दौड़ में गोल्ड जीतकर पहले भारतीय स्वर्ण विजेता बनने का गौरव पाया।
भारत ने 1962 में चीन युद्ध और 1986 में दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति के विरोध में इन खेलों का बहिष्कार किया।
1978 में इन खेलों को आधिकारिक रूप से 'कॉमनवेल्थ गेम्स' नाम मिला।

कॉमनवेल्थ गेम्स — राष्ट्रमंडल देशों का सबसे बड़ा बहु-खेल महोत्सव — की जड़ें किसी सरकारी नीति में नहीं, बल्कि एक कनाडाई पत्रकार की कल्पनाशीलता में हैं। हर चार साल पर आयोजित होने वाला यह आयोजन आज दर्जनों देशों के हजारों एथलीटों का साझा मंच है, लेकिन इसकी शुरुआत एक छोटे-से विचार से हुई थी जो 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक की वापसी के बाद अंकुरित हुआ।

एक पत्रकार का सपना, एक खेल आयोजन की नींव

कनाडा के स्पोर्ट्स राइटर मेल्विल मार्क्स रॉबिन्सन 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक से लौटने के बाद राष्ट्रमंडल देशों के लिए एक अलग खेल प्रतियोगिता की परिकल्पना लेकर आए। उनके इस विचार को आकार मिला और अंततः 16 से 23 अगस्त 1930 के बीच कनाडा के हैमिल्टन शहर में पहली बार 'ब्रिटिश एम्पायर गेम्स' का आयोजन हुआ। इस ऐतिहासिक आयोजन में 11 देशों के करीब 400 एथलीटों ने भाग लिया।

गौरतलब है कि इससे पहले 1911 में लंदन में इंटर-एम्पायर चैंपियनशिप का आयोजन हुआ था, जो किंग जॉर्ज पंचम के राज्याभिषेक उत्सव का हिस्सा था — लेकिन वह कॉमनवेल्थ गेम्स का आधिकारिक संस्करण नहीं था। रॉबिन्सन की पहल ने ही इस विचार को संस्थागत रूप दिया।

पहले संस्करण का स्वरूप

हैमिल्टन में आयोजित इस पहले संस्करण में 8 खेलों के 59 इवेंट शामिल थे, और सभी मुकाबले सिंगल्स प्रारूप में थे। महिलाओं के लिए उस समय केवल तैराकी का एकमात्र इवेंट रखा गया था। खिलाड़ियों के ठहरने की व्यवस्था हैमिल्टन के सिविक स्टेडियम के निकट स्थित प्रिंस ऑफ वेल्स स्कूल में की गई थी, जिसे खेल गांव का रूप दिया गया — एक-एक कक्षा में दो-दो दर्जन खिलाड़ी ठहराए गए। यह आयोजन उस दौर की सीमित संसाधनों के बावजूद खेल भावना की मिसाल था।

इन खेलों में उन्हीं देशों को आमंत्रित किया गया जो उस समय ब्रिटिश साम्राज्य के उपनिवेश थे या पहले कभी रहे थे।

भारत की यात्रा: पहला कदम और पहला पदक

पहले संस्करण में भारत की अनुपस्थिति उल्लेखनीय है। 1930 में भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारतीय ओलंपिक संगठन का अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर पर्याप्त प्रशासनिक ढाँचा तैयार नहीं था — इसलिए भारत पहले संस्करण में भाग नहीं ले सका।

1934 में भारत ने पहली बार इन खेलों में कदम रखा और अपने डेब्यू में ही पदक तालिका में जगह बनाई। पहलवान राशिद अनवर 74 किलोग्राम फ्रीस्टाइल कुश्ती इवेंट में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक पाने वाले पहले भारतीय बने। इसके बाद 1958 में महान धावक मिल्खा सिंह ने 440 यार्ड दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा — वे कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतने वाले पहले भारतीय बने।

उसी वर्ष 1958 में ट्रैक एंड फील्ड एथलीट स्टेफनी डिसूजा और एलिजाबेथ डेवनपोर्ट इन खेलों में भाग लेने वाली पहली भारतीय महिलाएँ बनीं। 20 साल बाद 1978 में अमी घिया और कंवल सिंह पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनीं।

भारत के बहिष्कार और राजनीतिक संदर्भ

भारत का कॉमनवेल्थ गेम्स से नाता सदा सहज नहीं रहा। 1962 में चीन के साथ युद्ध के चलते भारत ने उस वर्ष के खेलों में भाग नहीं लिया। इसके बाद 1986 में दक्षिण अफ्रीका की 'रंगभेद की नीति' के विरोध में कई देशों के साथ मिलकर भारत ने सामूहिक बहिष्कार किया। ये दोनों निर्णय खेल से परे राजनीतिक और नैतिक प्रतिबद्धताओं के प्रतीक थे।

यह ऐसे समय में आया जब अंतरराष्ट्रीय खेल मंचों पर राजनीतिक दबाव और नैतिक सवाल अक्सर एथलेटिक प्रतिस्पर्धा पर भारी पड़ते थे।

नाम बदला, भावना रही

1930 से शुरू हुए इन खेलों को 1978 में आधिकारिक रूप से 'कॉमनवेल्थ गेम्स' का नाम मिला। द्वितीय विश्व युद्ध के कारण 1942 और 1946 में आयोजन नहीं हो सका, लेकिन उसके बाद से यह सिलसिला निर्बाध जारी है। आज यह प्रतियोगिता उन खिलाड़ियों के लिए विशेष महत्व रखती है जो ओलंपिक से पहले अंतरराष्ट्रीय अनुभव और आत्मविश्वास अर्जित करना चाहते हैं। कई भारतीय एथलीटों ने कॉमनवेल्थ गेम्स की सफलता को ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप में उत्कृष्ट प्रदर्शन की सीढ़ी बनाया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और 'ब्रिटिश एम्पायर गेम्स' से 'कॉमनवेल्थ गेम्स' तक का सफर महज नाम बदलने का नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन बदलने का प्रतिबिंब है। भारत के बहिष्कारों — 1962 और 1986 — से स्पष्ट है कि खेल कभी राजनीति से निरपेक्ष नहीं रहे। आज जब कॉमनवेल्थ गेम्स की प्रासंगिकता पर सवाल उठते हैं, तो इस इतिहास को जानना ज़रूरी है।
RashtraPress
15 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कॉमनवेल्थ गेम्स की शुरुआत कैसे हुई?
कॉमनवेल्थ गेम्स की शुरुआत 1930 में कनाडा के हैमिल्टन शहर में 'ब्रिटिश एम्पायर गेम्स' के रूप में हुई, जो कनाडाई स्पोर्ट्स पत्रकार मेल्विल मार्क्स रॉबिन्सन के विचार पर आधारित थी। 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक से प्रेरित होकर उन्होंने राष्ट्रमंडल देशों के लिए अलग खेल आयोजन का प्रस्ताव रखा।
भारत ने पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स में कब भाग लिया?
भारत ने 1934 में पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स (तब 'ब्रिटिश एम्पायर गेम्स') में भाग लिया। 1930 के पहले संस्करण में भारत शामिल नहीं हो सका क्योंकि तब वह ब्रिटिश शासन के अधीन था और भारतीय ओलंपिक संगठन का अंतरराष्ट्रीय ढाँचा पर्याप्त रूप से तैयार नहीं था।
कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक जीतने वाले पहले भारतीय कौन थे?
पहलवान राशिद अनवर कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक जीतने वाले पहले भारतीय थे। उन्होंने 1934 में 74 किलोग्राम फ्रीस्टाइल कुश्ती इवेंट में ब्रॉन्ज मेडल जीता था।
मिल्खा सिंह का कॉमनवेल्थ गेम्स में क्या योगदान रहा?
मिल्खा सिंह 1958 में कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने वाले पहले भारतीय बने। उन्होंने 440 यार्ड दौड़ में पहला स्थान हासिल किया, जो भारतीय एथलेटिक्स के इतिहास में एक मील का पत्थर है।
भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स का बहिष्कार कब और क्यों किया?
भारत ने दो बार इन खेलों से दूरी बनाई — 1962 में चीन के साथ युद्ध के कारण और 1986 में दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति के विरोध में कई देशों के साथ सामूहिक बहिष्कार के रूप में। दोनों निर्णय खेल से इतर राजनीतिक और नैतिक कारणों से लिए गए थे।
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