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झारखंड बना भारतीय हॉकी की नर्सरी: सलीमा टेटे से जयपाल सिंह तक, विरासत जारी

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झारखंड बना भारतीय हॉकी की नर्सरी: सलीमा टेटे से जयपाल सिंह तक, विरासत जारी

सारांश

जयपाल सिंह मुंडा की 1928 की ओलंपिक विरासत से लेकर आज सलीमा टेटे की विश्व कप कप्तानी तक — झारखंड के सिमडेगा, खूंटी और गुमला जिले भारतीय हॉकी की रीढ़ बन चुके हैं। SAI के तहत 5,000 से अधिक बच्चे प्रशिक्षण ले रहे हैं, और यह राज्य देश की सबसे उत्पादक हॉकी पाठशाला के रूप में उभर रहा है।

मुख्य बातें

भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान सलीमा टेटे झारखंड से हैं और इस समय हॉकी विश्व कप (नीदरलैंड-बेल्जियम) में टीम का नेतृत्व कर रही हैं।
झारखंड के सिमडेगा , खूंटी और गुमला जिले भारत की हॉकी संस्कृति के केंद्र माने जाते हैं।
SAI के प्रतिभा विकास कार्यक्रमों के तहत राज्य में 5,000 से अधिक लड़के-लड़कियाँ आवासीय और गैर-आवासीय प्रशिक्षण ले रहे हैं।
झारखंड की हॉकी विरासत 1928 एम्स्टर्डम ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता टीम के कप्तान जयपाल सिंह मुंडा से जुड़ी है।
सिमडेगा में राज्य सरकार का हॉकी आवासीय केंद्र स्थापित होने से प्रशिक्षण ढाँचा और मज़बूत हुआ है।

भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान सलीमा टेटे का नाम आज देश की हर हॉकी प्रेमी की जुबान पर है — और यह कोई संयोग नहीं। झारखंड पिछले कई दशकों से भारतीय हॉकी, विशेषकर महिला हॉकी, की सबसे उर्वर पाठशाला बनकर उभरा है। सिमडेगा, खूंटी और गुमला जैसे जिलों की मिट्टी में हॉकी सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न अंग है।

हॉकी विश्व कप में झारखंड की बेटियाँ

इस समय भारतीय सीनियर महिला हॉकी टीम नीदरलैंड और बेल्जियम में आयोजित हॉकी विश्व कप में हिस्सा ले रही है। टीम में झारखंड की खिलाड़ियों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि राज्य राष्ट्रीय स्तर पर कितना महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। राज्य की खिलाड़ियाँ अपने बेहतरीन प्रदर्शन की बदौलत न केवल राष्ट्रीय टीम में जगह बना रही हैं, बल्कि भारत की हॉकी परंपरा को भी नई ऊँचाई पर ले जा रही हैं।

ऐतिहासिक जड़ें: जयपाल सिंह मुंडा से शुरू हुई विरासत

झारखंड का हॉकी से रिश्ता 20वीं सदी के शुरुआती दशकों से चला आ रहा है। यहाँ के आदिवासी समुदायों के लिए यह खेल मनोरंजन की सीमाएँ लाँघकर रोज़मर्रा की संस्कृति का हिस्सा बन गया। इस विरासत की नींव 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक में भारत की स्वर्ण पदक विजेता टीम के कप्तान जयपाल सिंह मुंडा ने रखी थी। उनकी ऐतिहासिक सफलता ने छोटानागपुर पठार की कई पीढ़ियों को हॉकी स्टिक थामने की प्रेरणा दी।

इस विरासत को आगे बढ़ाने में माइकल किंडो, सिल्वेनस डुंग डुंग, मनोहर टोपनो, अजीत लाकड़ा, बिमल लाकड़ा, बीरेंद्र लाकड़ा, असुंता लाकड़ा और सुमराय टेटे — जो भारत के पूर्व कप्तान, कॉमनवेल्थ गेम्स पदक विजेता और ध्यानचंद पुरस्कार विजेता हैं — जैसे दिग्गजों की भूमिका अहम रही है।

सिमडेगा: भारत की हॉकी नर्सरी

यदि झारखंड की हॉकी संस्कृति को किसी एक जिले में देखना हो, तो वह सिमडेगा है। इसे अक्सर भारत की 'हॉकी नर्सरी' कहा जाता है। दशकों से इस जिले ने ऐसे खिलाड़ी दिए हैं जिन्होंने सीमित संसाधनों और बुनियादी सुविधाओं के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का नाम रोशन किया। अब तस्वीर बदल रही है — जिले में एक राज्य सरकार का हॉकी आवासीय केंद्र स्थापित किया गया है, जो युवा प्रतिभाओं को व्यवस्थित प्रशिक्षण दे रहा है।

साई के कार्यक्रम और बढ़ती पहुँच

स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) के प्रतिभा विकास कार्यक्रमों ने झारखंड में हॉकी की पहुँच को और व्यापक बनाया है। आँकड़ों के अनुसार, पूरे राज्य में 5,000 से अधिक लड़के और लड़कियाँ आवासीय और गैर-आवासीय कार्यक्रमों के ज़रिए प्रशिक्षण ले रहे हैं। सरकारी सहयोग और खिलाड़ियों के जुनून के इस संगम ने झारखंड को भारत की सबसे उत्पादक हॉकी पाठशालाओं में से एक बना दिया है।

जगन टोपनो ने कहा, 'झारखंड के तीन जिलों — खूंटी, सिमडेगा और गुमला — के हर घर में हर बच्चा हॉकी खेलता है। सुबह-शाम, आपको पूरे झारखंड में खेतों में गाँव के बच्चे हॉकी खेलते हुए मिल जाएंगे। हॉकी हमारी संस्कृति का एक अहम हिस्सा है।'

आगे की राह

झारखंड की हॉकी यात्रा यह साबित करती है कि संसाधनों की कमी भी जुनून और सांस्कृतिक जुड़ाव को नहीं रोक सकती। जैसे-जैसे सरकारी निवेश और प्रशिक्षण ढाँचा मज़बूत होता जाएगा, आने वाले वर्षों में झारखंड से और अधिक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी निकलने की उम्मीद है — और भारतीय हॉकी का यह 'हार्टलैंड' और भी चमकदार भविष्य की ओर बढ़ रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस सांस्कृतिक जड़ की है जो दशकों की उपेक्षा के बावजूद जीवित रही। असली सवाल यह है कि जब SAI और राज्य सरकार का निवेश अब बढ़ रहा है, तो क्या यह ढाँचा उन हज़ारों बच्चों को व्यवस्थित अवसर दे पाएगा जो अब भी खेतों में बिना उचित मैदान के खेल रहे हैं। सिमडेगा जैसे जिले दशकों से 'नर्सरी' का टैग ढो रहे हैं, लेकिन वहाँ के खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधाएँ अभी भी उनकी प्रतिभा के अनुपात में नहीं हैं। विरासत तो है — अब ज़रूरत है उस विरासत के समानुपातिक निवेश की।
RashtraPress
18 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड को भारतीय हॉकी की नर्सरी क्यों कहा जाता है?
झारखंड के सिमडेगा, खूंटी और गुमला जिलों ने दशकों से भारतीय हॉकी टीमों को खिलाड़ी दिए हैं। यहाँ की आदिवासी संस्कृति में हॉकी रोज़मर्रा की जीवनशैली का हिस्सा है, और SAI के कार्यक्रमों के तहत 5,000 से अधिक बच्चे प्रशिक्षण ले रहे हैं।
सलीमा टेटे कौन हैं और झारखंड से उनका क्या संबंध है?
सलीमा टेटे भारतीय सीनियर महिला हॉकी टीम की कप्तान हैं और झारखंड से आती हैं। वे इस समय नीदरलैंड और बेल्जियम में आयोजित हॉकी विश्व कप में भारतीय टीम का नेतृत्व कर रही हैं।
जयपाल सिंह मुंडा का झारखंड की हॉकी विरासत से क्या संबंध है?
जयपाल सिंह मुंडा 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक में भारत की स्वर्ण पदक विजेता हॉकी टीम के कप्तान थे। झारखंड से ताल्लुक रखने वाले मुंडा की सफलता ने छोटानागपुर पठार की पीढ़ियों को हॉकी खेलने की प्रेरणा दी।
SAI झारखंड में हॉकी के विकास के लिए क्या कर रहा है?
स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) के प्रतिभा विकास कार्यक्रमों के तहत झारखंड में 5,000 से अधिक लड़के और लड़कियाँ आवासीय और गैर-आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग ले रहे हैं। इसके अलावा सिमडेगा में राज्य सरकार का हॉकी आवासीय केंद्र भी स्थापित किया गया है।
झारखंड के किन जिलों से सबसे अधिक हॉकी खिलाड़ी निकलते हैं?
सिमडेगा, खूंटी और गुमला — ये तीन जिले झारखंड की हॉकी संस्कृति के केंद्र हैं। जगन टोपनो के अनुसार, इन जिलों के हर घर में बच्चे हॉकी खेलते हैं और यह खेल यहाँ की संस्कृति का अभिन्न अंग बन चुका है।
राष्ट्र प्रेस
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