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क्या मंसूर अली खान पटौदी ने भारतीय क्रिकेट में नई ऊर्जा भरने का काम किया?

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क्या मंसूर अली खान पटौदी ने भारतीय क्रिकेट में नई ऊर्जा भरने का काम किया?

सारांश

क्या आप जानते हैं मंसूर अली खान पटौदी के बारे में? भारतीय क्रिकेट के इस महान कप्तान ने अपने साहस और नेतृत्व से टीम इंडिया को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। जानिए उनके जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं और उपलब्धियों के बारे में।

मुख्य बातें

मंसूर अली खान पटौदी की कप्तानी में भारतीय क्रिकेट को नई ऊर्जा मिली।
उन्होंने 46 टेस्ट मैचों में 2,793 रन बनाए।
उनके नाम 6 शतक और 16 अर्धशतक हैं।
वे 1975 में क्रिकेट से संन्यास लेने तक एक सक्रिय खिलाड़ी रहे।
उन्हें कई पुरस्कारों से नवाजा गया, जिनमें 'पद्म श्री' शामिल है।

नई दिल्ली, 4 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। मंसूर अली खान पटौदी भारतीय क्रिकेट के सबसे महान कप्तानों में से एक माने जाते हैं। 5 जनवरी 1941 को भोपाल के एक शाही परिवार में जन्मे पटौदी ने केवल 21 वर्ष की आयु में टीम इंडिया की कप्तानी संभाली। उनकी आक्रामक सोच, फिटनेस पर जोर और नेतृत्व क्षमता ने भारतीय क्रिकेट को नई पहचान दी। अपने पिता इफ्तिखार अली खान पटौदी के पदचिह्नों पर चलते हुए, मंसूर अली खान ने न केवल भारत के लिए क्रिकेट खेला, बल्कि कप्तानी भी की।

1 जुलाई 1961 को इंग्लैंड के ईस्ट ससेक्स में एक कार दुर्घटना में पटौदी की दाहिनी आंख में कांच का टुकड़ा घुस गया, जिसके कारण उन्होंने एक आंख की रोशनी खो दी। फिर भी, उन्होंने हार नहीं मानी और कुछ महीनों बाद भारतीय टीम में डेब्यू किया।

जिन्हें 'टाइगर पटौदी' के नाम से जाना जाता है, उन्होंने दिसंबर 1961 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखा। अपनी दूसरी टेस्ट पारी में ही उन्होंने अर्धशतक बनाया और तीसरे मैच में शतक जमाया।

पटौदी ने अपने करियर के चौथे टेस्ट मैच में कप्तान के रूप में मैदान में कदम रखा और भारतीय टीम को नई ऊर्जा दी। उनके नेतृत्व में भारत ने 1967 में न्यूजीलैंड के खिलाफ अपनी पहली विदेशी टेस्ट जीत दर्ज की, जिसे भारत ने 3-1 से हासिल किया। इसी वर्ष उन्हें 'विजडन क्रिकेटर ऑफ द ईयर' का खिताब मिला। 1969 में पटौदी ने प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेत्री शर्मिला टैगोर से विवाह किया।

एक साहसी और आक्रामक बल्लेबाज होने के नाते, पटौदी ने शॉट खेलने से कभी नहीं कतराए। उनकी आक्रामक रणनीति उनके कप्तान रहते भी देखने को मिली। 1962 से 1975 के बीच, पटौदी ने कप्तान के रूप में 40 मैच खेले, जिनमें से 9 मैचों में जीत हासिल की। 1967-68 में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 75 रन की पारी खेली, जिसे आज भी फैंस याद करते हैं। 1975 में, वेस्टइंडीज के दौरे के बाद, पटौदी ने क्रिकेट से संन्यास ले लिया।

उनके अंतरराष्ट्रीय करियर में, पटौदी ने 46 टेस्ट मैचों में 34.91 की औसत से 2,793 रन बनाये, जिसमें 6 शतक और 16 अर्धशतक शामिल हैं। इंग्लैंड के खिलाफ उन्होंने फरवरी 1964 में 203 रन की नाबाद पारी खेली।

पटौदी ने 310 फर्स्ट क्लास मैचों में 33.67 की औसत से 15,425 रन बनाये, जिसमें 33 शतक और 75 अर्धशतक शामिल हैं। 7 लिस्ट ए मुकाबलों में उन्होंने 210 रन बनाये।

संन्यास के बाद, टाइगर पटौदी ने 1993 से 1996 तक मैच रेफरी की भूमिका निभाई। इस दौरान उन्होंने 2 टेस्ट और 10 वनडे में अंपायरिंग की। वह क्रिकेट मैगजीन 'स्पोर्ट्सवर्ल्ड' के संपादक भी रहे और एक कमेंटेटर के रूप में भी दिखाई दिए।

2007 से, वह सुनील गावस्कर और रवि शास्त्री के साथ आईपीएल गवर्निंग काउंसिल का हिस्सा रहे, लेकिन अक्टूबर 2010 में उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया।

1964 में पटौदी को 'अर्जुन अवॉर्ड' मिला, और फिर 1967 में 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया। उनके सम्मान में 2007 से भारत और इंग्लैंड के बीच टेस्ट सीरीज का नाम 'पटौदी ट्रॉफी' रखा गया है।

22 सितंबर 2011 को, 70 वर्ष की आयु में इंटरस्टीशियल लंग डिजीज से जूझते हुए, पटौदी ने दुनिया को अलविदा कहा।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मानक स्थापित किया।
RashtraPress
17 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मंसूर अली खान पटौदी ने कब क्रिकेट में डेब्यू किया?
मंसूर अली खान पटौदी ने दिसंबर 1961 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में डेब्यू किया।
उन्हें किस पुरस्कार से सम्मानित किया गया?
उन्हें 1964 में 'अर्जुन अवॉर्ड' और 1967 में 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया।
पटौदी की कप्तानी में भारत ने पहली विदेशी टेस्ट जीत कब हासिल की?
पटौदी की कप्तानी में भारत ने 1967 में न्यूजीलैंड के खिलाफ अपनी पहली विदेशी टेस्ट जीत हासिल की।
पटौदी का उपनाम क्या था?
पटौदी को 'टाइगर पटौदी' के नाम से जाना जाता था।
पटौदी ने क्रिकेट से कब संन्यास लिया?
पटौदी ने 1975 में वेस्टइंडीज के भारत दौरे के बाद क्रिकेट से संन्यास लिया।
राष्ट्र प्रेस
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