रणजीत सिंह: जामनगर के महाराज जिन्होंने क्रिकेट की दुनिया में अपनी पहचान बनाई
सारांश
Key Takeaways
- रणजीत सिंह भारतीय क्रिकेट के पहले अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी थे।
- उन्होंने 'रणजी ट्रॉफी' की स्थापना की, जो कि भारत का प्रमुख घरेलू क्रिकेट टूर्नामेंट है।
- उनकी बल्लेबाजी शैली और तकनीक ने उन्हें महान बना दिया।
- उन्होंने 15 टेस्ट मैचों में 989 रन बनाकर अपनी प्रतिभा साबित की।
- उनका क्रिकेट जीवन प्रेरणादायक है, जो युवा खिलाड़ियों को प्रेरित करता है।
नई दिल्ली, 1 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। महाराजा रणजीत सिंह भारतीय क्रिकेट के सबसे प्रमुख खिलाड़ियों में से एक माने जाते हैं। वे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में इंग्लैंड के लिए खेलने वाले पहले भारतीय थे। उनकी अद्वितीय बल्लेबाजी शैली के कारण भारत के प्रमुख घरेलू क्रिकेट टूर्नामेंट का नाम 'रणजी ट्रॉफी' रखा गया।
10 सितंबर 1872 को गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र के नवानगर (जामनगर) राजघराने में जन्मे रणजीतसिंहजी को भारतीय क्रिकेट का 'पितामह' कहा जाता है। उन्होंने 16 साल की उम्र में पढ़ाई के लिए इंग्लैंड का रुख किया।
कलाई के जादूगर के तौर पर मशहूर रणजीत सिंह 'लेट कट' और 'लेग ग्लांस' जैसे स्टाइलिश शॉट्स के लिए जाने जाते थे। उन्होंने 'बैक-फुट डिफेंस' की कला में भी महारत हासिल की। मई 1895 में लॉर्ड्स के मैदान पर एमसीसी के खिलाफ खेलते हुए उन्होंने पहले मैच में 77 और 150 रन बनाए, जो उनकी असाधारण प्रतिभा का परिचय देता है। उनके इस प्रदर्शन ने इंग्लैंड क्रिकेट टीम के चयनकर्ताओं को उन्हें अपनी टीम में शामिल करने के लिए मजबूर कर दिया। उस वक्त भारत पर अंग्रेजों का शासन था, जिसके चलते रणजीत सिंह का चयन इंग्लैंड टीम में हुआ।
16-18 जुलाई 1896 के बीच मैनचेस्टर में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दाएं हाथ के बल्लेबाज रणजीत सिंह ने इंग्लैंड की दूसरी पारी में नाबाद 154 रन बनाए। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया ने यह मैच 3 विकेट से जीत लिया।
साल 1897 में इंग्लिश टीम ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर गई थी। दौरे से पहले रणजीत सिंह बीमार रहे, लेकिन इंग्लैंड ने उन्हें अपनी प्लेइंग इलेवन में शामिल किया। पहले दिन 39 रन बनाने के बाद वह कमजोरी महसूस कर रहे थे, लेकिन दूसरे दिन 175 रन की पारी खेलकर उन्होंने इंग्लैंड को 9 विकेट से जीत दिलाई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने 15 टेस्ट मैच खेले और 26 पारियों में 44.95 की औसत से 989 रन बनाएं, जिसमें 2 शतक और 6 अर्धशतक शामिल हैं।
फर्स्ट क्लास करियर में उन्होंने 307 मैचों में 56.37 की औसत से 24,692 रन बनाए, जिसमें 72 शतक और 109 अर्धशतक शामिल हैं। 1895 से लगातार 10 घरेलू सत्रों में उन्होंने हर बार 1,000 से अधिक रन बनाए। 1899 और 1900 में उन्होंने 3,000 रन का आंकड़ा पार किया। रणजीत सिंह ने 1899 से 1903 तक काउंटी टीम की कप्तानी की, लेकिन 1904 के अंत में बढ़ती जिम्मेदारियों के कारण भारत लौट आए। इसके बाद उन्होंने केवल दो और ग्रीष्मकालीन सत्रों (1908 और 1912) में क्रिकेट खेला। उनका अंतिम फर्स्ट क्लास मैच 1920 में हुआ।
साल 1907 में रणजी नवानगर रियासत के 'महाराजा जाम साहब' बने। 2 अप्रैल 1933 को 60 वर्ष की आयु में रणजीत सिंह का निधन हो गया।