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हरभजन सिंह: 2001 की ऑस्ट्रेलिया सीरीज में 32 विकेट — ट्रक ड्राइवर बनने से 'टर्बनेटर' तक का सफर

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हरभजन सिंह: 2001 की ऑस्ट्रेलिया सीरीज में 32 विकेट — ट्रक ड्राइवर बनने से 'टर्बनेटर' तक का सफर

सारांश

ट्रक ड्राइवर बनने का मन बना चुके हरभजन सिंह को बहनों के हौसले और सौरव गांगुली के भरोसे ने 2001 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मैदान में उतारा — और भज्जी ने 3 टेस्ट में 32 विकेट लेकर इतिहास रच दिया। यही वह मोड़ था जिसने 'टर्बनेटर' को जन्म दिया।

मुख्य बातें

हरभजन सिंह का जन्म 3 जुलाई 1980 को जालंधर, पंजाब में हुआ; मार्च 1998 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट डेब्यू किया।
साल 2000 में पिता के निधन और टीम से बाहरी के बाद उन्होंने अमेरिका जाकर ट्रक ड्राइवर बनने का मन बनाया था।
बहनों के प्रोत्साहन पर रणजी ट्रॉफी में उतरे और एक सीजन में 28 विकेट लिए।
2001 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 3 टेस्ट में 32 विकेट और कोलकाता टेस्ट में हैट्रिक से करियर का रुख बदला।
भारत के लिए 103 टेस्ट में 417 विकेट ; टी20 विश्व कप 2007 और वनडे विश्व कप 2011 विजेता टीम का हिस्सा।
2003 में अर्जुन अवॉर्ड और 2009 में पद्म श्री से सम्मानित।

भारतीय क्रिकेट के महान ऑफ स्पिनर हरभजन सिंह की जीवनगाथा केवल विकेटों और पुरस्कारों तक सीमित नहीं है — यह संघर्ष, त्याग और असाधारण वापसी की कहानी है। 3 जुलाई 1980 को पंजाब के जालंधर में जन्मे भज्जी ने टेस्ट क्रिकेट में 417 विकेट लेकर इतिहास रचा और 'टर्बनेटर' का खिताब अर्जित किया। लेकिन इस मुकाम तक पहुँचने से पहले एक ऐसा दौर भी आया जब उन्होंने अमेरिका जाकर ट्रक ड्राइवर बनने का मन बना लिया था।

संघर्ष के शुरुआती दिन

बचपन से क्रिकेट के प्रति दीवानगी रखने वाले हरभजन को मार्च 1998 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट डेब्यू का मौका मिला। हालांकि, करीब डेढ़ साल तक टीम में रहने के बाद उन्हें बाहर कर दिया गया। उस दौर में अनिल कुंबले टीम इंडिया के प्रमुख स्पिनर थे और कुंबले के चोटिल होने पर भी भज्जी को तरजीह नहीं दी जा रही थी, जिससे वह गहरी निराशा में डूब गए।

इसी बीच साल 2000 में हरभजन के पिता का निधन हो गया। माँ और 5 बहनों की ज़िम्मेदारी अचानक उनके कंधों पर आ गई। टीम में जगह न मिलने और घर की आर्थिक तंगी ने उन्हें क्रिकेट छोड़ने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने अमेरिका जाकर ट्रक चलाने का फैसला लगभग पक्का कर लिया था।

बहनों का साथ और रणजी में वापसी

यह भज्जी की बहनें थीं जिन्होंने उन्हें हिम्मत दी और क्रिकेट न छोड़ने के लिए मनाया। उनके प्रोत्साहन पर हरभजन रणजी ट्रॉफी में उतरे और एक ही सीजन में 28 विकेट लेकर चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा। यह प्रदर्शन उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

2001 की ऑस्ट्रेलिया सीरीज: नसीब बदलने वाला मुकाम

साल 2001 में ऑस्ट्रेलिया के भारत दौरे से पहले कुंबले एक बार फिर चोटिल हो गए। तब कप्तान सौरव गांगुली के आग्रह पर हरभजन को टीम में वापस बुलाया गया। इस सीरीज में भज्जी ने 3 टेस्ट मैचों में कुल 32 विकेट झटके — एक ऐसा प्रदर्शन जिसने क्रिकेट जगत को चौंका दिया। कोलकाता में खेले गए ऐतिहासिक टेस्ट में उन्होंने हैट्रिक भी ली, जो भारतीय टेस्ट क्रिकेट में एक दुर्लभ उपलब्धि थी। इस सीरीज के बाद हरभजन टीम इंडिया के अपरिहार्य स्पिनर बन गए।

विश्व क्रिकेट में छाप और करियर के आँकड़े

मैदान पर अपनी आक्रामकता और 'दूसरा' गेंद की रहस्यमयी विविधता के लिए मशहूर हरभजन टी20 विश्व कप 2007 और वनडे विश्व कप 2011 की विजेता भारतीय टीम का अभिन्न हिस्सा रहे। भारत के लिए 103 टेस्ट मैचों में उन्होंने 417 विकेट लिए और 18.22 की औसत से 2,224 रन भी बनाए, जिनमें 2 शतक और 9 अर्धशतक शामिल हैं। 236 वनडे में 269 विकेट और 1,237 रन, जबकि 28 टी20 अंतरराष्ट्रीय में 25 विकेट उनके नाम दर्ज हैं।

आईपीएल में भी भज्जी का योगदान उल्लेखनीय रहा। 163 मैचों में 150 विकेट और 833 रन के साथ उन्होंने 4 आईपीएल खिताब जीते। 2008 से 2017 तक मुंबई इंडियंस, फिर 2018-19 में चेन्नई सुपर किंग्स और 2021 में कोलकाता नाइट राइडर्स के लिए खेले।

सम्मान और क्रिकेट के बाद का सफर

क्रिकेट में उत्कृष्ट योगदान के लिए हरभजन को 2003 में अर्जुन अवॉर्ड और 2009 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। फ्रांस की यूनिवर्सिटी इकोल सुपीरियेयूरे रोबर्ट डि सोर्बोन ने उन्हें पीएचडी की मानद उपाधि भी प्रदान की। क्रिकेट के बाद भज्जी ने राजनीति और कमेंट्री के क्षेत्र में भी कदम रखा। जालंधर की गलियों से निकलकर विश्व क्रिकेट के शिखर तक का उनका यह सफर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

उस दौर में न कोई खिलाड़ी कल्याण तंत्र था, न मानसिक स्वास्थ्य सहयोग। यह एक कप्तान के व्यक्तिगत भरोसे — सौरव गांगुली के — ने उन्हें वापस लाया, न कि किसी संस्थागत प्रक्रिया ने। आज जब बीसीसीआई अरबों का कारोबार करता है, तो यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या आज भी कोई 'भज्जी' चुपचाप क्रिकेट छोड़ रहा है क्योंकि सिस्टम उसे थाम नहीं पाया।
RashtraPress
2 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हरभजन सिंह ने ट्रक ड्राइवर बनने का फैसला क्यों किया था?
साल 2000 में पिता के निधन के बाद माँ और 5 बहनों की आर्थिक ज़िम्मेदारी हरभजन पर आ गई और टीम इंडिया में भी जगह नहीं मिल रही थी। इन दोनों दबावों के बीच उन्होंने अमेरिका जाकर ट्रक ड्राइवर बनने का मन बना लिया था। बहनों के प्रोत्साहन ने उन्हें क्रिकेट में बने रहने के लिए मनाया।
2001 की ऑस्ट्रेलिया सीरीज में हरभजन सिंह का प्रदर्शन कैसा रहा?
2001 में ऑस्ट्रेलिया के भारत दौरे के दौरान हरभजन ने 3 टेस्ट मैचों में 32 विकेट लिए। कोलकाता टेस्ट में उन्होंने हैट्रिक भी ली, जो भारतीय टेस्ट इतिहास में एक दुर्लभ उपलब्धि है।
हरभजन सिंह के टेस्ट करियर के आँकड़े क्या हैं?
हरभजन सिंह ने भारत के लिए 103 टेस्ट मैचों में 417 विकेट लिए और 18.22 की औसत से 2,224 रन बनाए, जिनमें 2 शतक और 9 अर्धशतक शामिल हैं। वह टेस्ट क्रिकेट में 400 से अधिक विकेट लेने वाले पहले भारतीय ऑफ स्पिनर हैं।
हरभजन सिंह को कौन-कौन से राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं?
हरभजन सिंह को 2003 में अर्जुन अवॉर्ड और 2009 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। फ्रांस की यूनिवर्सिटी इकोल सुपीरियेयूरे रोबर्ट डि सोर्बोन ने उन्हें पीएचडी की मानद उपाधि भी दी है।
हरभजन सिंह का आईपीएल करियर कैसा रहा?
हरभजन ने आईपीएल के 163 मैचों में 150 विकेट और 833 रन बनाए तथा 4 आईपीएल खिताब जीते। 2008 से 2017 तक मुंबई इंडियंस, 2018-19 में चेन्नई सुपर किंग्स और 2021 में कोलकाता नाइट राइडर्स के लिए खेले।
राष्ट्र प्रेस
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