क्या रूपिंदर पाल सिंह ओलंपिक मेडलिस्ट हैं, जिन्होंने बचपन में हॉकी स्टिक और जूतों के लिए संघर्ष किया?
सारांश
Key Takeaways
- रूपिंदर पाल सिंह ने अपने संघर्ष के माध्यम से हॉकी में सफलता पाई।
- फिटनेस और मेहनत के महत्व को समझते हैं।
- पदक जीतने से उनकी जिंदगी में बदलाव आया।
- टीम भावना का महत्व समझते हैं।
- हॉकी के प्रति प्रेम और समर्पण से ही सफलता मिलती है।
नई दिल्ली, 7 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। 2020 टोक्यो ओलंपिक के पदक विजेता रूपिंदर पाल सिंह ने राष्ट्रीय टीम से संन्यास लेने के बाद हॉकी इंडिया लीग (एचआईएल) 2025-26 में एसजी पाइपर्स की ओर से खेलना शुरू किया है। उनका जन्म 11 नवंबर 1990 को पंजाब के फरीदकोट में हुआ, और वे एक मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते हैं, जिन्हें यह खेल विरासत में मिला।
रूपिंदर के पिता स्कूल में हॉकी खेलते थे, और उनके भाई भी इस खेल में सक्रिय थे। उनके चचेरे भाई भी इसी खेल से जुड़े हुए थे, जिससे रूपिंदर का हॉकी के प्रति झुकाव बढ़ा।
सिर्फ 10 साल की उम्र में, रूपिंदर ने हॉकी स्टिक थामी। जब उन्होंने खेलना शुरू किया, तब उन्हें कच्चे मैदान पर प्रैक्टिस करनी पड़ती थी। जिस स्टेडियम में वह खेलते थे, वहां अंतरराष्ट्रीय स्तर का टर्फ नहीं था। हॉकी स्टिक और जूते की कीमतें काफी अधिक थीं, और उन्हें इनकी व्यवस्था करने में कठिनाई होती थी। उनके शानदार प्रदर्शन ने उन्हें भारतीय टीम में जगह दिलाई।
वर्ष 2011 में, उन्होंने सुल्तान अजलन शाह कप में ग्रेट ब्रिटेन के खिलाफ हैट्रिक लगाकर सबका ध्यान आकर्षित किया।
रूपिंदर को पेनाल्टी कॉर्नर का विशेषज्ञ माना जाता है, लेकिन उनके लिए यह प्राथमिकता नहीं थी। उनका मुख्य फोकस टीम में खेलना था। जब भी वह पेनाल्टी कॉर्नर लेते, तो ड्रैग फ्लिक के मूल तत्वों पर ध्यान देते।
भारतीय टीम के लिए खेलने का उनका अनुभव अद्वितीय रहा है। उन्होंने वरिष्ठ खिलाड़ियों से बहुत कुछ सीखा है।
रूपिंदर का मानना है कि फिटनेस का अच्छा होना आवश्यक है, तभी आप मैदान पर अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं। अनफिट होने पर विपक्षी टीम दबाव बना सकती है। मैच के दिन, खिलाड़ियों को तरोताजा रहना चाहिए और कठिन परिश्रम जारी रखना चाहिए।
उन्होंने 2011 और 2016 में एशियन चैंपियंस ट्रॉफी की गोल्ड मेडलिस्ट टीम का हिस्सा बने। 2013 में एशिया कप में सिल्वर जीता, और 2014-15 और 2016-17 में हॉकी वर्ल्ड लीग में ब्रॉन्ज मेडल प्राप्त किया।
कॉमनवेल्थ गेम्स 2014 में सिल्वर मेडल जीतने वाले रूपिंदर ने उसी वर्ष एशियन गेम्स में गोल्ड भी जीता। 2018 में एशियन ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया, लेकिन 2020 का टोक्यो ओलंपिक उनके लिए विशेष था, जहां भारतीय टीम ने 41 सालों का सूखा खत्म करते हुए ब्रॉन्ज मेडल जीता।
यह उनके करियर का सबसे यादगार पल था। उन्होंने राष्ट्र प्रेस को बताया, "यह पल हमारे लिए बहुत खास था, क्योंकि ओलंपिक खेलना हर एथलीट का सपना होता है। हमें मेडल भी मिला। हॉकी में कई वर्षों बाद हमें मेडल मिला था। इस मेडल ने हमारी जिंदगी बदल दी। हमें अच्छे नौकरी के अवसर मिले। मैं पंजाब सिविल सर्विसेज में हूं। हमारी टीम के अन्य खिलाड़ियों को भी प्रमोशन मिला।"
रूपिंदर मानते हैं कि हर मैच में प्रदर्शन का दबाव होता है, लेकिन अगर खिलाड़ी टीम के साथ खेल का आनंद लेते हैं, तो यह उतना मुश्किल नहीं होता। वह हमेशा मैदान पर अपना शत प्रतिशत देने की कोशिश करते हैं।
हालांकि, एसजी पाइपर्स को एचआईएल 2025-26 के पहले मैच में हार का सामना करना पड़ा, लेकिन रूपिंदर को विश्वास है कि उनकी टीम आने वाले मुकाबलों में अच्छा प्रदर्शन करेगी। टीम में जूनियर, सीनियर और विदेशी खिलाड़ियों का मिश्रण है। उनका उद्देश्य प्लेऑफ के लिए क्वालीफाई करना है।
उन्होंने कहा, "मैं एसजी पाइपर्स के साथ खेलने के लिए उत्सुक हूं। यह मेरी इस टीम के साथ पहली बार है। यहां नए खिलाड़ी हैं और अर्जेंटीना, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और हॉलैंड के दिग्गज भी हैं। मैं खेल का आनंद लेते हुए युवाओं को प्रेरित करना चाहता हूं।"
रूपिंदर मानते हैं कि भारत में हॉकी को और अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए इसका प्रचार बढ़ाना चाहिए। भारतीय टीम ने लगातार दो ओलंपिक में मेडल जीते, लेकिन शायद लोग इसे भुला गए हैं।
पूर्व ओलंपियन ने कहा, "किसी भी खेल में राजनीति नहीं होनी चाहिए। खिलाड़ी का काम खेलना है। वह कड़ी मेहनत करता है। जब राजनीति के कारण उसे टीम में मौका नहीं मिलता, तो बहुत दुख होता है। जब कोई खिलाड़ी पदक जीतता है, तो उसे वह सम्मान मिलना चाहिए, जिसका वह हकदार है। खिलाड़ियों को जितना प्रोत्साहित करेंगे, उतना ही वे मैदान पर बेहतर प्रदर्शन कर सकेंगे।"