स्टेन वावरिंका का टेनिस से संन्यास, 3 ग्रैंड स्लैम और ओलंपिक गोल्ड जीतने वाले दिग्गज ने कहा अलविदा
सारांश
मुख्य बातें
स्टेन वावरिंका ने 28 अक्टूबर 2026 को पेशेवर टेनिस से संन्यास की घोषणा की — स्विस इंडोर्स बेसल टूर्नामेंट में चेक खिलाड़ी जिरी लेहेका से हार के बाद 41 वर्षीय इस दिग्गज ने अपने करियर पर पर्दा गिरा दिया। अपने अनूठे सिंगल-हैंडेड बैकहैंड और 'बिग थ्री' के दबदबे वाले युग में उपस्थिति के लिए विख्यात वावरिंका ने तीन ग्रैंड स्लैम सिंगल खिताब, एक ओलंपिक स्वर्ण पदक और एक डेविस कप खिताब समेत 590 टूर-लेवल जीत के साथ अपना सफर समाप्त किया।
करियर की ऊँचाइयाँ
वावरिंका ने 2014 में एटीपी रैंकिंग में करियर की सर्वश्रेष्ठ नंबर 3 की पोज़िशन हासिल की और अपने करियर में कुल 16 टूर-लेवल खिताब जीते। उनकी खासियत यह रही कि उन्होंने अपने सभी तीनों ग्रैंड स्लैम खिताब उस समय के विश्व के नंबर एक खिलाड़ियों को फाइनल में हराकर जीते — एक उपलब्धि जो उन्हें टेनिस इतिहास में अलग पहचान देती है।
2014 में ऑस्ट्रेलियन ओपन में राफेल नडाल को हराकर उन्होंने अपना पहला ग्रैंड स्लैम जीता। इसके बाद 2015 में फ्रेंच ओपन और 2016 में यूएस ओपन — दोनों बार नोवाक जोकोविच को फाइनल में परास्त कर खिताब अपने नाम किए।
एटीपी मास्टर्स और डेविस कप की विरासत
2014 में मोंटे-कार्लो में खेले गए एटीपी मास्टर्स 1000 टूर्नामेंट में वावरिंका ने अपने हमवतन और महान खिलाड़ी रोजर फेडरर को हराकर एकमात्र मास्टर्स 1000 खिताब जीता। यह जीत इसलिए भी खास थी क्योंकि इसमें उन्होंने स्विट्जरलैंड के सबसे बड़े टेनिस नायक को मात दी।
ओलंपिक मंच पर भी वावरिंका ने देश के लिए गौरव अर्जित किया। 2008 बीजिंग ओलंपिक में उन्होंने रोजर फेडरर के साथ जोड़ी बनाकर पुरुष डबल्स में स्वर्ण पदक जीता। इसके पश्चात 2014 में उन्होंने फेडरर के साथ मिलकर स्विट्जरलैंड को पहली बार डेविस कप दिलाया।
'बिग थ्री' युग में एक अलग पहचान
फेडरर, नडाल और जोकोविच के वर्चस्व वाले दौर में वावरिंका ने खुद की एक विशिष्ट जगह बनाई। आलोचक और प्रशंसक समान रूप से मानते हैं कि उनका एकल-हाथ वाला बैकहैंड आधुनिक टेनिस के सबसे सुंदर शॉट्स में से एक था। 590 टूर-लेवल जीत के साथ उनका करियर न केवल संख्याओं में, बल्कि प्रतिस्पर्धी साहस में भी असाधारण रहा।
गौरतलब है कि वावरिंका ने अपने करियर के अंतिम वर्षों में कई गंभीर चोटों से संघर्ष किया, फिर भी वे कोर्ट पर डटे रहे — यह उनके संघर्षशील स्वभाव का प्रमाण है।
विदाई संदेश
वावरिंका ने एटीपी टूर को दिए एक बयान में कहा, 'पिछले 20 सालों में एक खिलाड़ी के तौर पर मेरे बारे में अलग-अलग सोच रही है। मैं अपने करियर में बस इतना चाहता था कि अपना शत प्रतिशत दूं, हमेशा लड़ूं, कोई पछतावा न हो। अपने लिए, विरोधी के लिए, टूर्नामेंट के लिए, फैंस के लिए, सबके लिए सम्मान के साथ रहूं। 20 से ज़्यादा वर्षों तक यही हमेशा सबसे ज़रूरी चीज़ रही है, और यही एकमात्र तरीका है जिससे आप खेल बिना किसी पछतावे के छोड़ सकते हैं।'
टेनिस जगत वावरिंका की इस विदाई के साथ एक ऐसे योद्धा को अलविदा कह रहा है जिसने सबसे कठिन परिस्थितियों में महानों को धूल चटाई। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों के खिलाड़ियों को प्रेरित करती रहेगी।