दिल्ली हाईकोर्ट ने आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा, शुक्रवार को आएगा आदेश
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली हाईकोर्ट ने 22 अक्टूबर 2026 को आइसा (All India Students Association) की अध्यक्ष नेहा बोरा की उस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें उन्होंने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (एसईएम) द्वारा जारी नोटिस को चुनौती दी है। अदालत शुक्रवार को इस मामले में अपना आदेश सुनाएगी। इस नोटिस के तहत नेहा बोरा को ₹10,000 का बॉन्ड भरने और शांति बनाए रखने का निर्देश दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
नेहा बोरा की याचिका में मुख्य तर्क यह था कि बीएनएसएस की धारा 163 उस समय कनॉट प्लेस क्षेत्र में लागू नहीं थी, बल्कि केवल मंडी हाउस क्षेत्र में प्रभावी थी। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायण ने यह भी दलील दी कि लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की माँग करना कोई अपराध नहीं है।
यह ऐसे समय में आया है जब छात्र संगठनों और नागरिक समाज की राजनीतिक गतिविधियों पर कानूनी कार्रवाई को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज़ हो रही है। गौरतलब है कि नेहा बोरा के विरुद्ध अब तक 6 एफआईआर दर्ज हैं।
दिल्ली पुलिस का पक्ष
दिल्ली पुलिस की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) चेतन शर्मा ने याचिका को सुनवाई योग्य नहीं बताते हुए इसका विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि धारा 163 उस समय प्रभावी थी, पुलिस बल सीमित था, और नेहा बोरा पुलिस को चकमा देते हुए कनॉट प्लेस की ओर बढ़ती रहीं।
एएसजी ने यह भी कहा कि नेहा बोरा ने कुल 12 बार नियमों का उल्लंघन किया है। उन्होंने अधिवक्ता प्रशांत भूषण की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का उल्लेख करते हुए कहा कि उस कार्यक्रम में नेहा बोरा भी मौजूद थीं, जहाँ 'रिजीम चेंज' यानी सत्ता परिवर्तन की बात कही गई थी।
एएसजी ने यह भी स्पष्ट किया कि सत्ता परिवर्तन केवल चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से संभव है, न कि राजधानी के मध्य में जमा होकर विरोध-प्रदर्शन के ज़रिए।
अदालत की अहम टिप्पणियाँ
सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने कई महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं। अदालत ने कहा कि जाँच पूरी होने तक किसी व्यक्ति से अच्छे व्यवहार का बॉन्ड भरवाना उसे जाँच की अवधि तक निलंबित रखने के समान है। अदालत ने यह भी कहा कि जब कोई व्यक्ति अदालत में आकर भविष्य में सही आचरण का वादा करता है, तो इसका निहितार्थ यह है कि वह अब तक सही आचरण नहीं कर रहा था।
अदालत ने दिल्ली पुलिस से यह भी पूछा कि धारा 126 और धारा 130 बीएनएसएस को एक साथ पढ़कर नोटिस जारी करने से क्या यह संकेत नहीं मिलता कि मजिस्ट्रेट ने पहले से ही अपना मन बना लिया था। इस सवाल पर एएसजी ने कहा कि दोनों धाराओं को साथ पढ़ना ज़रूरी है, अन्यथा सार्वजनिक शांति बनाए रखने का उद्देश्य प्रभावित होगा।
कानूनी दांव-पेंच
एएसजी चेतन शर्मा ने स्पष्ट किया कि 'अपराध करने की संभावना' संबंधी सूचना किसी विशेष अपराध से जुड़ी हो, यह अनिवार्य नहीं है — यह शांति भंग होने की आशंका या संभावित बड़े उपद्रव की संभावना से भी संबंधित हो सकती है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में निर्णय काफी हद तक संबंधित अधिकारी के विवेक पर निर्भर करता है।
नेहा बोरा की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता की प्रमुख चिंता यह है कि उन्हें पहले से ही गलत आचरण करने वाला व्यक्ति मान लिया गया है और अब उनसे अच्छे व्यवहार का आश्वासन माँगा जा रहा है।
आगे क्या होगा
मामले में सभी पक्षों की दलीलें पूरी हो चुकी हैं। दिल्ली हाईकोर्ट अपना फैसला शुक्रवार को सुनाएगा। यह आदेश न केवल नेहा बोरा के मामले में निर्णायक होगा, बल्कि एसईएम नोटिस की वैधता और बीएनएसएस की संबंधित धाराओं की व्याख्या को लेकर एक महत्त्वपूर्ण मिसाल भी स्थापित कर सकता है।