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क्या अलेक्जेंडर कनिंघम ने एएसआई की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?

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क्या अलेक्जेंडर कनिंघम ने एएसआई की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?

सारांश

क्या आप जानते हैं कि अलेक्जेंडर कनिंघम, जो एक सैन्य इंजीनियर थे, ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई? उनकी यात्रा ने भारतीय इतिहास के कई रहस्यों को उजागर किया। जानिए कैसे उन्होंने प्राचीनता को नया जीवन दिया।

मुख्य बातें

अलेक्जेंडर कनिंघम का जीवन भारतीय पुरातत्व के लिए प्रेरणादायक है।
उन्होंने प्राचीन भारतीय विरासत को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनकी खोजों ने भारतीय इतिहास को नया दृष्टिकोण प्रदान किया।
कनिंघम ने सिंधु घाटी सभ्यता की खोज की और उसका महत्व बताया।
उनके योगदानों को आज भी भारतीय पुरातत्व के क्षेत्र में सराहा जाता है।

नई दिल्ली, 22 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। 23 जनवरी 1814 को लंदन में जन्मे अलेक्जेंडर कनिंघम ने अपने पिता एलन कनिंघम की कवि विरासत को पीछे छोड़ते हुए भारत की मिट्टी के रहस्यों को उजागर करने का कार्य किया। 1833 में, जब यह युवा बंगाल इंजीनियर्स का सेकंड लेफ्टिनेंट बनकर कलकत्ता पहुंचा, तो उसे पता नहीं था कि उसकी यात्रा उसे मेजर जनरल के पद तक और फिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की स्थापना तक ले जाएगी।

कनिंघम का सैन्य करियर एक थ्रिलर फिल्म की तरह था। उन्होंने युद्धों में पुल बनाए, लद्दाख की दुर्गम सीमाओं का निर्धारण किया और ग्वालियर में अपनी इंजीनियरिंग कौशल के चमत्कार दिखाए। लेकिन उनकी एक और गहरी जिज्ञासा थी - प्राचीन सिक्कों और शिलालेखों का अध्ययन।

जब कनिंघम कलकत्ता पहुंचे, तो उनकी मुलाकात महान विद्वान जेम्स प्रिंसेप से हुई, जिन्होंने पहली बार ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों को पढ़ा था। यह जोड़ी भारतीय इतिहास को पौराणिक कथाओं से निकालकर ठोस प्रमाणों पर लाने में सफल रही। कनिंघम ने समझा कि भारत का असली इतिहास कागजों में नहीं, बल्कि मिट्टी के नीचे दबी संरचनाओं और सिक्कों में है।

कनिंघम की कार्यशैली अद्वितीय थी। उन्हें ह्वेनसांग और फाहियान जैसे प्राचीन चीनी यात्रियों के यात्रा वृत्तांतों का संकलन प्राप्त था, जिन्हें वे किसी 'गाइडबुक' की तरह इस्तेमाल करते थे। ह्वेनसांग की निर्देशों का अनुसरण करते हुए उन्होंने नालंदा के महान विश्वविद्यालय के अवशेषों को खोज निकाला, जो कभी ज्ञान का केंद्र था।

कनिंघम का सबसे बड़ा योगदान बौद्ध विरासत का पुनरुद्धार था। जब सारनाथ के धमेख स्तूप को लोग एक राजा के किले के रूप में मानते थे, तब कनिंघम ने वहां खुदाई की और एक शिलालेख खोजा, जिससे यह सिद्ध हुआ कि बुद्ध ने यहीं अपना पहला उपदेश दिया था।

उन्होंने सांची में बुद्ध के शिष्यों सारिपुत्र और महामोग्गलन के अवशेषों को खोजा और भरहुत के पत्थरों पर उकेरी गई जातक कथाओं को पढ़ा, जिससे मौर्य काल की कला के विकास का पता चला। बोधगया

क्या आप जानते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता की पहली झलक भी कनिंघम को मिली थी? 1853 में उन्हें हड़प्पा से एक रहस्यमयी मुहर मिली। हालांकि, उस समय वे बौद्ध इतिहास में बहुत लगे हुए थे, इसलिए उन्होंने इसे विदेशी मुहर समझा। लेकिन उन्होंने पहली बार चेतावनी दी कि रेलवे के ठेकेदार हड़प्पा की प्राचीन ईंटों को ट्रैक के लिए लूट रहे हैं।

1861 में जब लॉर्ड कैनिंग ने उनके प्रस्ताव पर एएसआई की स्थापना की, तो कनिंघम इसके पहले सर्वेक्षक बने और बाद में महानिदेशक बन गए। उन्होंने 23 खंडों की रिपोर्ट तैयार की, जो आज भी भारतीय पुरातत्व की 'बाइबल' मानी जाती है।

1885 में उन्होंने रिटायरमेंट लिया और 28 नवंबर 1893 को सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने इस दुनिया को अलविदा कहा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अलेक्जेंडर कनिंघम कौन थे?
अलेक्जेंडर कनिंघम एक सैन्य इंजीनियर थे, जिन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की स्थापना की।
कनिंघम का सबसे बड़ा योगदान क्या था?
उनका सबसे बड़ा योगदान बौद्ध विरासत का पुनरुद्धार था।
कनिंघम ने कौन सी प्राचीन सभ्यता की खोज की?
उन्होंने सिंधु घाटी सभ्यता की पहली झलक खोजी थी।
कनिंघम की प्रमुख खोजें क्या थीं?
उनकी प्रमुख खोजों में बौद्ध स्तूप, नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष और हड़प्पा की मुहर शामिल हैं।
कब और कैसे एएसआई की स्थापना हुई?
एएसआई की स्थापना 1861 में लॉर्ड कैनिंग के प्रस्ताव पर हुई।
राष्ट्र प्रेस
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