असम विधानसभा चुनाव: भाजपा की पहली बार बहुमत पाने की कोशिश
सारांश
Key Takeaways
- भाजपा का लक्ष्य पहली बार अपने दम पर बहुमत हासिल करना।
- कांग्रेस का प्रदर्शन पिछले चुनावों में गिरा।
- मुस्लिम मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- क्षेत्रीय दल अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
- असम का चुनाव एक दिलचस्प मुकाबला है।
नई दिल्ली, 26 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। असम में 9 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) लगातार तीसरी बार जीत के साथ-साथ अपने बलबूते पर बहुमत हासिल करने का लक्ष्य लेकर मैदान में है।
2016 में सत्ता में आने के बाद से भाजपा ने 126 सदस्यीय विधानसभा में लगभग 60 सीटों पर ही अपने को सीमित रखा है और सहयोगियों के माध्यम से सरकार बनाती रही है। उस वर्ष, पार्टी ने 15 साल से सत्ता में रही कांग्रेस को हराकर असम गण परिषद (एजीपी) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) के समर्थन से सरकार बनाई थी।
भाजपा को अपर असम, उत्तर असम और पहाड़ी जिलों में मजबूती मिली, लेकिन निचले असम के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में वह अपना प्रभाव नहीं बना सकी। इस कारण से, भाजपा को सहयोगी दलों पर निर्भर रहना पड़ा।
2021 में भी भाजपा ने 60 सीटों पर ही सीमित रहकर चुनाव लड़ा। हालाँकि, असमिया बहुल क्षेत्रों में उसका प्रदर्शन मजबूत रहा, लेकिन मुस्लिम बहुल और जातीय रूप से विभिन्न क्षेत्रों में भाजपा को खास बढ़त नहीं मिली। इस बार बीपीएफ की जगह यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) ने गठबंधन में शामिल हो गया है।
जनसांख्यिकीय समीकरण भी भाजपा के लिए चुनौती बने हुए हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, असम में मुस्लिम आबादी लगभग 34.2 प्रतिशत है, जो कई जिलों में निर्णायक भूमिका निभाती है। वहीं, हिंदू आबादी 61.5 प्रतिशत और ईसाई समुदाय 3.7 प्रतिशत है।
मुस्लिम मतदाता लगभग 35 से 40 सीटों पर चुनाव परिणाम को प्रभावित करते हैं। उनका वोट परंपरागत रूप से कांग्रेस के पक्ष में रहता है, लेकिन बदरुद्दीन अजमल की ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के उभरने से इस वोट बैंक में कुछ बंटवारा हुआ है।
2021 में कांग्रेस-एआईयूडीएफ गठबंधन ने इस वोट को काफी हद तक एकजुट कर भाजपा को इन क्षेत्रों में रोक दिया था, लेकिन अब दोनों दल अलग हो चुके हैं।
2023 में परिसीमन के बाद मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों की संख्या लगभग 41 से घटकर 26 रह गई है, लेकिन भाजपा के लिए इन क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करना अब भी चुनौती बना हुआ है।
कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव महत्वपूर्ण है। 2011 में 78 सीटें2016 में 26 सीटों पर सिमट गई थी और 2021 में मामूली सुधार के साथ 29 सीटें हासिल की थीं। अब गौरव गोगोई के नेतृत्व में पार्टी अल्पसंख्यकों, चाय जनजातियों और मध्यम वर्ग के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
एआईयूडीएफ का प्रभाव भी कमजोर होता दिख रहा है, जबकि रायजोर दल और आंचलिक गण मोर्चा जैसे क्षेत्रीय दल अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
कुल मिलाकर, असम का यह चुनाव दिलचस्प मुकाबले की ओर बढ़ रहा है, जहां भाजपा पहली बार अपने बलबूते पर बहुमत पाने की कोशिश कर रही है, वहीं कांग्रेस और अन्य दल उसे चुनौती देने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं।