क्या बाला साहेब ठाकरे ने चुनाव नहीं लड़ा, फिर भी सरकारें बनाई और गिराईं?
सारांश
Key Takeaways
- बाला साहेब ठाकरे का जन्म 23 जनवरी को हुआ।
- उन्होंने शिवसेना की स्थापना की और सत्ता की दिशा को प्रभावित किया।
- उनका व्यक्तित्व बेबाक और टकराव से भरा था।
- वे कभी चुनाव नहीं लड़े, फिर भी उन्हें महाराष्ट्र का सबसे ताकतवर व्यक्ति माना गया।
- उनकी राजनीति में विवादों का महत्वपूर्ण स्थान था।
नई दिल्ली, 22 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। 23 जनवरी... यह एक ऐसी तारीख है, जिसने केवल महाराष्ट्र नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति को एक महत्वपूर्ण पहचान दी है, जिसे नजरअंदाज करना अनुचित होगा। यही वह दिन है, जब पुणे में बाला साहेब ठाकरे का जन्म हुआ। बाला साहेब ठाकरे एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने सत्ता में ना रहते हुए भी सत्ता की दिशा को प्रभावित किया। उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा, फिर भी सरकारें बनाईं और गिराईं।
बाला साहेब ठाकरे नौ भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उनके पिता केशव ठाकरे एक सामाजिक कार्यकर्ता थे और आजादी के बाद मराठी राज्य की मांग के लिए चले आंदोलनों में सक्रिय रहे। यही वैचारिक विरासत बाला साहेब को मिली। मीनाताई ठाकरे से विवाह के बाद उनके तीन पुत्र हुए: बिंदुमाधव ठाकरे, जयदेव ठाकरे और उद्धव ठाकरे। उनका सार्वजनिक जीवन राजनीति से नहीं, बल्कि कला और पत्रकारिता से शुरू हुआ।
1950 के दशक की शुरुआत में, वे मुंबई के फ्री प्रेस जर्नल में एक कार्टूनिस्ट बने। उनकी रचनाएँ केवल अखबारों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि वे जापान के असाही शिंबुन और न्यूयॉर्क टाइम्स के संडे संस्करण तक पहुँचीं। लेकिन, जल्द ही उनकी कलम में राजनीति का समावेश हो गया। 1960 के दशक में उन्होंने अपने भाई के साथ मराठी साप्ताहिक 'मार्मिक' की शुरुआत की। यहीं से 'मराठी माणुस' के मुद्दे और बाहरी लोगों का विरोध शुरू हुआ।
19 जून 1966 को इसी विचारधारा ने शिवसेना का गठन किया। इसका उद्देश्य स्पष्ट था- 'महाराष्ट्र फॉर महाराष्ट्रीयन्स'। शुरुआत मराठी भाषा, संस्कृति और स्थानीय अधिकारों की मांग से हुई, लेकिन इसके बाद यह राजनीति में आक्रामक हिंदुत्व की दिशा में बढ़ी। बाला साहेब ठाकरे का व्यक्तित्व भी इसी तरह से था। वे बेबाक और टकराव से बेखौफ थे।
उन्होंने कभी कोई सरकारी पद नहीं संभाला, न ही चुनाव लड़ा, लेकिन वे दशकों तक महाराष्ट्र के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति माने गए। उन्हें 'हिंदू हृदयसम्राट' के नाम से जाना जाता है। उनके आलोचक भी उन्हें 'महाराष्ट्र का गॉडफादर' मानते थे। उनकी ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1990 के दशक में जब शिवसेना सत्ता में आई, तो बॉम्बे का नाम बदलकर मुंबई कर दिया गया।
विवाद बाला साहेब ठाकरे की राजनीति का स्थायी हिस्सा रहे। 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचे के गिराए जाने के बाद जब अन्य नेता बचते दिखे, तब बाला साहेब ठाकरे ने कहा- मस्जिद शिवसैनिकों ने गिराई है। यह हमारे लिए गर्व की बात है। उस समय मुंबई में 1992-93 के सांप्रदायिक दंगों ने शहर को हिलाकर रख दिया, जिनमें लगभग एक हजार लोगों की मृत्यु हुई। उन पर हिंसा भड़काने के आरोप लगे, लेकिन उन्होंने कभी इन आरोपों से दूरी नहीं बनाई।
उनकी राजनीति में विरोधाभास भी कम नहीं थे। इमरजेंसी के दौरान विपक्ष में रहते हुए भी उन्होंने इंदिरा गांधी का समर्थन किया। बाद के वर्षों में उन्होंने प्रतिभा पाटिल और प्रणब मुखर्जी जैसे राष्ट्रपति उम्मीदवारों का भी समर्थन किया। 1987 में उन्होंने नारा दिया- 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं।' 2002 में उनका यह बयान कि हिंदुओं को आत्मघाती दस्ते बनाने चाहिए, उनकी उग्र हिंदुत्व राजनीति का उदाहरण माना गया। इसके चलते चुनाव आयोग ने उन पर दिसंबर 1999 से दिसंबर 2005 तक छह साल का प्रतिबंध लगाया।
राजनीतिक संगठन के तौर पर शिवसेना का विस्तार तेजी से हुआ। 1989 में 'सामना' का प्रकाशन शुरू हुआ। 1995 में भाजपा के साथ गठबंधन कर शिवसेना सत्ता में आई। कहा गया कि सरकार का रिमोट कंट्रोल मातोश्री से चलता है। बाला साहेब ठाकरे ने कई विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री और सांसद बनाए, लेकिन खुद हमेशा पर्दे के पीछे रहे। उत्तराधिकार का मुद्दा उनके जीवन के अंतिम वर्षों में सबसे पीड़ादायक रहा। 2004 में उद्धव ठाकरे को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया और 2006 में उन्हें पार्टी की कमान सौंपी गई। इसके बाद राज ठाकरे ने अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाई। यह विभाजन बाला साहेब को अंतिम समय तक दुख देता रहा।
एक इंटरव्यू में हिटलर की प्रशंसा को लेकर वे फिर विवादों में आए। उन्होंने कहा था कि हिटलर क्रूर थे और गलतियाँ कीं, लेकिन वे कलाकार थे और भीड़ को अपने साथ ले जाने की क्षमता रखते थे। ऐसी बेलौस बातें, तीखे व्यंग्य और आक्रामक राजनीति ने उन्हें समर्थकों में नायक और विरोधियों में विवाद का केंद्र बना दिया।
17 नवंबर 2012 को मुंबई में उनका निधन हो गया। ठाकरे अक्सर कहते थे कि शिवसेना केवल एक संगठन नहीं, बल्कि छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना है।