निजी भूमि पर नमाज का विवाद: असदुद्दीन ओवैसी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय का किया स्वागत
सारांश
Key Takeaways
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नमाज पर प्रतिबंध को खारिज किया।
- असदुद्दीन ओवैसी ने इस फैसले का स्वागत किया।
- कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है।
- मामला 16 मार्च 2026 को फिर से सुना जाएगा।
नई दिल्ली, 14 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के संभल जिले में नमाज पढ़ने वाले लोगों की संख्या पर लगाए गए प्रशासनिक प्रतिबंध को खारिज कर दिया है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिममीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने इस निर्णय का स्वागत किया।
ओवैसी ने इस फैसले को शेयर करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा, "इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह निर्णय सराहनीय है, जिसमें संभल पुलिस के अजीब आदेशों को खारिज किया गया है — निजी भूमि पर नमाज पढ़ने पर रोक लगाई गई थी। कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य की होती है। यूपी में ऐसे मामले बढ़ते जा रहे हैं: एक घटना में घर के भीतर नमाज के लिए हिरासत, संभल में 20 से अधिक नहीं। उम्मीद है कि यूपी पुलिस इससे कुछ सीखेगी।"
यह निर्णायक फैसला रमजान के दौरान एक निजी भूमि (जिसे याचिकाकर्ता मस्जिद बताता है) पर नमाज अदा करने की अनुमति न देने के खिलाफ आया है। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने सुनवाई के दौरान प्रशासन को गंभीर फटकार लगाई। याचिकाकर्ता ने बताया कि गाटा संख्या 291 पर मस्जिद है, जहां रमजान में बड़ी संख्या में लोग नमाज पढ़ना चाहते थे, लेकिन स्थानीय पुलिस और प्रशासन ने केवल 20 लोगों को अनुमति दी थी।
राज्य सरकार ने मालिकाना हक का मुद्दा उठाया और कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में यह भूमि मोहन सिंह और भूरज सिंह के नाम पर दर्ज है। प्रशासन का तर्क था कि कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका के कारण संख्या सीमित की गई। अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया।
बेंच ने कहा, "कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य का कर्तव्य है, आम नागरिकों का नहीं। यदि एसपी और कलेक्टर को लगता है कि वे कानून का पालन नहीं कर सकते, तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए या संभल से तबादला करवा लेना चाहिए।" अदालत ने यह भी कहा कि निजी संपत्ति पर पूजा-अर्चना के लिए राज्य से अनुमति की आवश्यकता नहीं है। हस्तक्षेप केवल तब आवश्यक है जब धार्मिक गतिविधि सार्वजनिक भूमि पर हो या सार्वजनिक संपत्ति में फैली हो।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को पूरक हलफनामा दाखिल करने का अवसर दिया, जिसमें मस्जिद की तस्वीरें और राजस्व रिकॉर्ड प्रस्तुत किए जाएंगे। इस मामले को 16 मार्च 2026 को सूचीबद्ध किया गया है।